Short Teaser ऑक्शन की वो स्क्रीन सिर्फ बोली नहीं दिखा रही थी ,वो मीरा और राजीव के बीच दबी हुई चाहतों की नब्ज़ भी पढ़ रही थी।हर नई बोली के साथ हवा और भी भारी होती जा रही थी ,जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके दिलों पर नटखट दबाव बना रहा हो।
Character Detail मीरा (28):पतली काया ,नटखट नखरे ,हल्की गुलाबी cheeks,आंखों में छुपी वासना की चमक और होंठों पर शरारती खिंचाव।दिखने में मासूम ,पर भीतर आग जैसी गर्माहट।राजीव (30):मजबूत कद – काठी ,संयमी चेहरा लेकिन नज़रों में खुरदुरी teasing की आदत।हाथों का स्पर्श हमेशा हल्का ,पर असर दिल तक उतर जाने वाला।
Plot / Setting रात के करीब ग्यारह बजे ,शहर की ऊँची इमारत का बंद कमरा।पर्दे आधे गिरे हुए ,लैपटॉप की नीली रोशनी और स्लो म्यूज़िक की हल्की गूंज।डार्क वेब पर चल रहा एक सीक्रेट ऑक्शन शो ,जहां सिर्फ रईस और खतरे पसंद करने वाले चेहरे ही मेहमान थे।माहौल में रहस्यमय उत्तेजना और चुपचाप फिसलती वासना की लहरें तैर रही थीं।
मीरा कुर्सी पर बैठी थी ,घुटनों को हल्का मोड़ते हुए ,उसके अंगों में बेचैनी की लहर दौड़ रही थी।स्क्रीन पर चमकती इमेजें और रहस्यमय आवाज़ें उसकी सांसों की रफ्तार तेज कर रही थीं।राजीव पीछे खड़ा ,उसकी हर प्रतिक्रिया को गौर से देख रहा था।
" इतनी टेंशन क्यों ले रही हो ?" उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा ,उसकी आवाज़ में एक नशे जैसी मुलायमियत थी।
" ये सब थोड़ा ज्यादा नहीं हो रहा ?" मीरा ने धीरे से कहा ,पर उसकी आंखें स्क्रीन से हट नहीं रही थीं।
राजीव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।ये स्पर्श साधारण था ,पर उसमें subtle मालिश जैसा सुकून और tease का स्वाद था।मीरा की पलकों में हल्का सा कंपन आया , cheeks और भी गुलाबी हो गईं।
" बस देखो एंजॉय करो ," राजीव ने फुसफुसाते हुए कहा।उसकी उंगलियां हल्के से गर्दन की ओर फिसल गईं ,जैसे अनजाने में होंठों के पास तक पहुंचने की चाह हो।मीरा ने सांस रोक ली ,उसके अंदर एक नटखट लहर उठी ,जो वासना और अपराधबोध के बीच झूल रही थी।
स्क्रीन पर बोली बढ़ती रही ,अंक चढ़ते रहे ,और हर नई घोषणा के साथ मीरा का दिल भी तेज़ धड़कने लगा।वह जानती थी कि ये सब सिर्फ एक शो नहीं ,बल्कि उनके रिश्ते की दबी परतों को उजागर करने वाला खेल बन चुका है।
" राजीव " उसने धीमे से पुकारा ,जैसे खुद को सम्हाल रही हो।
" हाँ ?" वह थोड़ा झुका ,उसकी गर्म सांस गालों को छू गई।
" अगर किसी ने हमें देख लिया तो ?"
एक हल्की हंसी।" डर और चाहत का यही खेल तो मज़ा देता है ," उसने कहा और अपनी उंगलियों से उसके हाथ की कलाई को सहलाया।वो स्पर्श धीरे – धीरे एक intimate एहसास बनाता जा रहा था ,जिसमें मोह और खिंचाव दोनों शामिल थे।
मीरा की आंखों में चमक और बेचैनी साथ – साथ नाच रही थी।वह चाहती थी कि ये पल थम जाए ,पर भीतर कहीं वो चाह भी रही थी कि ये और गहराए।
ऑक्शन की आवाज़ अचानक तेज़ हुई ,जैसे कोई नया राउंड शुरू हो रहा हो।मीरा ने अनजाने में होंठों को दांतों से दबाया ,उसके चेहरे पर शरारती blush साफ झलकने लगा।
राजीव ने उसकी प्रतिक्रिया नोटिस की।" तुम्हें अच्छा लग रहा है ,है ना ?" उसने धीमे , almost teasing अंदाज़ में पूछा।
" शायद " मीरा ने जवाब दिया ,मगर वो जवाब अधूरा था ,जैसे उसकी वासना खुद को शब्दों में ढालने से डर रही हो।
उसने कुर्सी की पीठ से सटे हुए थोड़ा पीछे झुककर आंखें बंद कीं ,और जैसे ही राजीव की उंगलियां फिर से उसके कंधे पर फिसलीं ,एक सिहरन उसके शरीर से गुजर गई।ये सिर्फ स्पर्श नहीं था ,ये एक silent confession था – कि दोनों उस अंधेरे रोमांच में खोते जा रहे थे।
उस रात का ऑक्शन सिर्फ बोली का खेल नहीं रहा ,बल्कि उनके रिश्ते की सीमा को परखने का एक साहसिक कदम बन चुका था।और मीरा के भीतर उठता हुआ ये नया खिंचाव उसे खुद से सवाल पूछने पर मजबूर कर रहा था – क्या वो इस रास्ते पर और आगे बढ़ना चाहती है ?
लैपटॉप की रोशनी अभी भी चमक रही थी ,और राजीव की नज़र अब सिर्फ स्क्रीन पर नहीं ,बल्कि मीरा के हर बदलते भाव पर टिकी थी।कहीं ये सिर्फ एक खेल था ,या किसी गहरी चाहत की शुरुआत उसका जवाब अगली रात में था।
नीली रोशनी अब भी कमरे की दीवारों पर थरथरा रही थी और मीरा की सांसों की लय पहले से कहीं ज़्यादा गहरी हो चुकी थी।राजीव की नज़रें उसके चेहरे पर टिक गई थीं ,जैसे वह हर पल उसके बदलते भावों को पढ़ लेना चाहता हो।उसकी उंगलियाँ धीरे से मीरा की कलाई से फिसलती हुई उसकी हथेली तक आ पहुँचीं ,और वहीँ ठहरकर एक हल्की गर्माहट छोड़ गईं।
" तुम्हारी धड़कन तेज़ हो गई है ," उसने धीमे स्वर में कहा ,मानो कोई राज़ खोल रहा हो।
मीरा ने नजरें झुका लीं ,लेकिन होंठों पर जो मुस्कान आई ,उसमें डर कम और आकर्षण ज़्यादा था।" शायद ये सब मेरे लिए नया है ," उसने धीरे से जवाब दिया।
राजीव हल्का सा झुका ,उसकी खुशबू उसके पास आकर घुलने लगी।" या शायद तुम्हें यही पसंद आ रहा है ," उसकी आवाज़ में शरारती मुलायमियत थी ,जो सीधे उसके दिल तक उतर रही थी।
मीरा ने कुछ कहना चाहा ,पर शब्द जैसे उसके गले में अटक गए।उसने बस एक गहरी सांस ली और स्क्रीन की ओर देखा ,जहाँ ऑक्शन की हलचल थमने का नाम नहीं ले रही थी।पर अब उसका ध्यान वहाँ नहीं था ,उसकी दुनिया बस उस कमरे और उस स्पर्श तक सिमट आई थी।
राजीव ने उँगलियों से उसके बालों की एक लट को छुआ ,हल्के से पीछे की ओर सरकाया।वह स्पर्श इतना कोमल था कि मीरा की पलकों पर अपने आप एक कंपन दौड़ गया।" तुम्हारी आँखों में आज कुछ अलग चमक है ," उसने कहते हुए उसके गाल के पास हाथ रोका ,जैसे इजाज़त मांग रहा हो।
" ऐसी ही तो हूँ मैं ," मीरा ने हल्के तंज के साथ कहा ,मगर उसकी आवाज़ में नटखट लहर साफ झलक रही थी।
" नहीं ," राजीव ने मुस्कराते हुए कहा , " आज तुम्हारे भीतर कोई नई आग जल रही है।"
उसकी उंगलियाँ धीरे से उसके गालों को छूकर ठहर गईं।मीरा ने आँखें बंद कर लीं ,जैसे उस एहसास को पूरी तरह महसूस करना चाहती हो।उस पल में न कोई डर था ,न सवाल – सिर्फ एक धीमी ,मीठी गर्माहट जो दोनों के बीच फैलती जा रही थी।
राजीव का हाथ अब उसके कंधे पर आ गया था।उसने हल्का सा झुककर उसके कान के पास फुसफुसाया , " अगर ज़्यादा हो रहा है तो बता दो।"
मीरा ने आँखें खोलीं और उसे देखा।उस नज़र में चुनौती भी थी और आमंत्रण भी।" अभी तो मुझे रुकने का मन नहीं है ," उसने साफ कहा।
ये सुनते ही राजीव की मुस्कान और गहरी हो गई।उसने हाथ पीछे खींच लिया ,लेकिन आँखों में वही नरमी बनी रही।" तो चलो ,इस पल को जीते हैं ," उसने कहा ,और कुर्सी के पास आकर बैठ गया ताकि दोनों के बीच की दूरी और कम हो जाए।
मीरा ने अनजाने में अपनी उंगलियाँ उसकी बाजू पर रख दीं।वो स्पर्श हल्का था ,मगर उसमें भी वही झिझक और चाहत घुली हुई थी।" ये सब अजीब लग रहा है ," वह बोली , " पर अच्छा भी।"
" अजीब ही तो आकर्षक होता है ," राजीव ने जवाब दिया ,और उसकी उंगलियों को धीरे से थाम लिया।उसकी हथेली की गर्मी मीरा की त्वचा में उतरती गई ,जैसे कोई अदृश्य रेखा उनके बीच खिंचती जा रही हो।
स्क्रीन पर चलती हलचल अब बस एक बैकग्राउंड बन चुकी थी ,असली हलचल तो इन दोनों के दिलों के भीतर थी।मीरा ने धीरे से सिर पीछे टिकाया ,उसकी सांसों की आवाज़ में वही बेचैन सुकून था ,जो किसी नए एहसास की शुरुआत का संकेत देता है।
राजीव ने उसकी प्रतिक्रिया महसूस की और बिना कुछ कहे ,बस उसके हाथ को हल्के से दबा दिया।ये एक शब्दहीन संवाद था ,जिसमें भरोसा ,चाहत और थोड़ी सी शरारत सब शामिल थी।
" मुझे नहीं पता ये कहाँ तक जाएगा ," मीरा ने धीरे से कहा।
" जहाँ तक तुम चाहो ," राजीव का जवाब सीधा और सच्चा था।
कमरे का माहौल अब और भी गाढ़ा हो चुका था ,जैसे हवा तक इस चुपचाप पनपती नज़दीकी की गवाह बन चुकी हो।मीरा की हल्की मुस्कान और राजीव की शांत निगाहें एक – दूसरे में कुछ ऐसा ढूँढ रही थीं ,जो शायद शब्दों से परे था।
उस पल में न समय का होश था ,न बाहर की दुनिया का।सिर्फ वही बंद कमरा ,नीली रोशनी ,और दो दिल जो धीरे – धीरे एक अनजाने ,लेकिन बेहद मोहक रास्ते पर कदम बढ़ा रहे थे।
हवा में घुली वही गहरी नज़दीकी अब और भी सघन होती जा रही थी।मीरा ने धीरे से अपनी उंगलियाँ राजीव की हथेली से खींचते हुए उसके कॉलर को हल्का सा छुआ ,मानो खुद को परख रही हो कि वह कितनी हिम्मत जुटा सकती है।उस पल में उसके चेहरे पर जो शरारती चमक थी ,वो किसी भी शब्द से ज़्यादा बोल रही थी।
" इतना पास आकर भी तुम शांत कैसे हो ?" मीरा ने मुस्कराते हुए पूछा ,उसकी आवाज़ में नटखट झंकार थी।
राजीव ने सिर थोड़ा झुकाया।" शांत नहीं हूँ ,बस खुद को संभाल रहा हूँ ," उसकी आँखों में वही हल्की आग थी जो पहले से बुझने के बजाय और भड़कती जा रही थी।
मीरा ने हल्की हंसी छेड़ी ,पर उसकी साँसों की गर्माहट बढ़ चुकी थी।उसने पीछे की ओर झुककर कुर्सी से टेक ली ,फिर धीमे से कहा , " तो क्या तुम हमेशा ऐसे ही कंट्रोल में रहते हो ?"
राजीव ने मुस्कुराकर उसका जवाब दिया , " जब सामने तुम जैसी चुनौती हो ,तो कंट्रोल भी एक खेल बन जाता है।"
उसके कहते ही मीरा की गर्दन पर हल्की सिहरन दौड़ गई।उसने नज़रें उसके चेहरे पर टिकाईं ,जैसे उसकी आँखों में कुछ ढूँढ रही हो।" और अगर मैं वो खेल और बढ़ा दूँ ?" उसकी आवाज़ में छुपी शरारत साफ झलक रही थी।
" तब मैं भी पीछे नहीं हटूँगा ," राजीव ने आत्मविश्वास के साथ कहा।
मीरा ने धीरे से अपनी अंगुलियों से उसकी बाजू पर एक कोमल रेखा खींची।उसकी त्वचा की गर्माहट दोनों के बीच एक नई तरंग पैदा कर रही थी।" ये सब मुझे डराता भी है और खींचता भी ," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
" डर और चाहत का यही मेल तो सबसे ज़्यादा असर करता है ," राजीव की आवाज़ में गहराई थी ,जो सीधे उसके दिल के भीतर उतर रही थी।
मीरा ने पल भर के लिए आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।उसके होंठ थोड़े खुले थे ,जैसे वह किसी अनजाने एहसास को महसूस कर रही हो।जब उसने आँखें खोलीं ,तो उसकी नज़र फिर से राजीव से टकराई ,और दोनों के बीच एक खामोश समझदारी तैर गई।
" आज तुम अलग लग रहे हो ," मीरा ने हल्के स्वर में कहा , " जैसे कुछ छुपा रहे हो।"
" कुछ नहीं छुपा रहा ," राजीव बोला , " बस तुम्हारी हर प्रतिक्रिया को महसूस कर रहा हूँ।"
उसने अपनी उंगलियाँ फिर से उसके कंधे पर रखीं ,इस बार थोड़ा ज़्यादा ठहराव के साथ।मीरा का शरीर ना चाहते हुए भी उस स्पर्श के अनुसार ढलने लगा।उसकी साँसें हल्की तेज़ हो गईं ,और गालों की लालिमा और गहरी हो उठी।
" तुम्हें पता है ," मीरा ने धीमे से कहा , " ये सब मुझे मेरी सीमाएँ भूलने पर मजबूर कर रहा है।"
" और मुझे तुम्हारे करीब आने के लिए ," राजीव ने जवाब दिया।
उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी ,बस एक धीमा ,मोहक भरोसा था।मीरा ने हल्का सा सिर घुमाया ,ताकि उसकी गर्दन पर पड़ती हल्की छाया और साफ नजर आए।राजीव की नज़रें वहीँ ठहर गईं ,और उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान फैल गई।
" तुम जानबूझकर ऐसा कर रही हो ,है ना ?" उसने पूछा।
" शायद ," मीरा ने मुस्कुराकर कहा , " या शायद बस खुद को आज़ाद महसूस कर रही हूँ।"
कमरे में अब सन्नाटा नहीं ,बल्कि एक नर्म सी बेचैनी तैर रही थी।वो बेचैनी जो किसी गहरे आकर्षण की शुरुआत होती है।मीरा ने अपने बालों को पीछे सरकाया ,और उसकी आँखों में वही नटखट चमक लौट आई।
" राजीव ," उसने धीमे स्वर में पुकारा , " अगर मैं एक कदम और बढ़ाऊँ तो ?"
" तो मैं भी साथ चलूँगा ," उसने बिना हिचक जवाब दिया।
मीरा की मुस्कान और चौड़ी हो गई।उसकी नजरों में अब डर कम और जिज्ञासा ज़्यादा थी।दोनों के बीच की दूरी अब नाममात्र रह गई थी ,और हवा में फैली गर्माहट उनके हर शब्द और हर साँस को और गहरा बना रही थी।
वो पल किसी तेज़ तूफान की तरह नहीं ,बल्कि एक धीमे बहते जज़्बात की तरह था ,जो धीरे – धीरे अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा था।मीरा और राजीव ,दोनों जान रहे थे कि ये सिर्फ एक खेल नहीं ,बल्कि एक ऐसी नज़दीकी है जो उन्हें अंदर से बदल रही है।
और उस बदलती हुई खामोशी में ,उनके दिलों की धड़कनें एक नई लय में बहने लगीं।
उन धड़कनों की नई लय ने जैसे पूरे कमरे को अपने वश में ले लिया था।मीरा थोड़ा और आगे झुकी ,उसके कंधे की हल्की झलक अब नीली रोशनी में और भी मुलायम दिख रही थी।राजीव की नज़रें वहीं ठहर गईं ,लेकिन इस बार नजरों में सिर्फ चाहत नहीं ,एक गहरी प्रशंसा भी थी।
" तुम्हें ऐसे देखना किसी जादू जैसा लगता है ," उसने धीमे से कहा।
मीरा ने पल भर के लिए उसकी आँखों में देखा ,फिर मुस्कुरा दी।" और तुम्हें यूँ घूरते पकड़ना ?" उसकी आवाज़ में वही नटखट छेड़छाड़ थी जो उसे और भी आकर्षक बना रही थी।
राजीव ने हल्के से सिर झुका लिया।" घूर नहीं रहा ,महसूस कर रहा हूँ।"
" तो महसूस करो ," मीरा ने चुनौती भरे अंदाज़ में कहा ,और अपनी उंगलियाँ उसके कंधे के पास ले जाकर धीरे से रख दीं।उसका स्पर्श अब पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास से भरा था ,जैसे हर पल के साथ उसकी झिझक पिघलती जा रही हो।
राजीव की सांसें भी अब पहले जैसी स्थिर नहीं रहीं।उसने हाथ धीरे से उठाकर मीरा की कलाई को छुआ ,इस बार बिना किसी हिचक के।" तुम्हें पता है ,तुम्हारी ये हरकतें मुझे कमजोर बना रही हैं ," उसने स्वीकार किया।
" और तुम्हारी ये ईमानदारी मुझे और साहसी ," मीरा ने मुस्कराकर कहा।
वो दोनों एक – दूसरे के इतने करीब थे कि उनकी साँसों की गर्माहट साफ महसूस हो रही थी।मीरा ने अनायास अपनी नज़र राजीव के होंठों पर डाल दी ,फिर तुरंत हटा ली ,जैसे खुद को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही हो।
" अगर मैं ज़्यादा कर बैठी तो ?" उसने धीमे से पूछा।
" तब भी मैं यहीं रहूँगा ," राजीव का जवाब नर्म लेकिन पक्का था।
मीरा ने हल्की हंसी के साथ कहा , " तुम बहुत खतरनाक हो ,पता है ?"
" खतरनाक नहीं ," उसने मुस्कुराकर सुधार किया , " बस तुम्हारे लिए ईमानदार।"
उस ईमानदारी में कुछ ऐसा था जो मीरा के दिल को और तेजी से धड़काने लगा।उसने सिर हल्का सा एक ओर झुकाया ,और अपने बालों की लट को कंधे के पार गिरने दिया।उसकी यह हरकत जानबूझकर की गई थी ,और वह ये बात खुद भी जानती थी।
राजीव ने उसकी उस अदा को नोटिस किया ,मगर कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई।उसने बस अपनी उंगलियाँ उसकी उंगलियों से हल्के से जोड़ दीं।" तुम्हारे साथ ये सब सही सा लगता है ," उसने कहा।
" शायद क्योंकि यही पल सच्चा है ," मीरा ने जवाब दिया।
दोनों के बीच अब कोई दिखावा नहीं था।सिर्फ एक नंगी सच्चाई थी ,जो हर साँस के साथ और गहरी होती जा रही थी।मीरा ने धीरे से उसकी उंगलियों को दबाया ,जैसे कोई खामोश भरोसा जताया जा रहा हो।
" इतनी चुप्पी भी खतरनाक हो सकती है ," उसने धीरे से कहा।
" पर यही तो वो खामोशी है ,जिसमें सब कुछ कहा जाता है ," राजीव ने उसकी बात पकड़ते हुए जवाब दिया।
मीरा ने आँखें झुकाईं ,फिर हल्की मुस्कान के साथ सिर उठाया।" तुम हर बात को इतना गहरा कैसे बना देते हो ?"
" क्योंकि सामने तुम हो ," उसने बिना झिझक कहा।
वक़्त जैसे थम सा गया था।स्क्रीन पर चल रहा ऑक्शन अब सिर्फ दूर की आवाज़ बन चुका था।असली खेल तो यहाँ ,इनके दिलों और भावनाओं के बीच चल रहा था।
मीरा ने अचानक हल्की सी शरारत के साथ कहा , " अगर मैं अब पीछे हट जाऊँ तो ?"
राजीव ने उसकी आँखों में देखा ,बिना मुस्कुराए।" तुम ऐसा नहीं करोगी।"
" इतना भरोसा ?" उसने भौंहें हल्की उठाईं।
" हाँ ," उसने सादगी से कहा , " क्योंकि तुम्हारी आँखें वो नहीं चाहतीं।"
मीरा कुछ पल चुप रही ,जैसे उस बात को भीतर तक महसूस कर रही हो।फिर उसने धीरे से सिर हिलाया ,मानो मान गई हो।" शायद तुम सही हो ," उसने धीमे स्वर में कहा।
उन दोनों के बीच की हवा अब और भी भारी हो चुकी थी ,लेकिन उसमें कोई असहजता नहीं थी।सिर्फ वो मीठी सी लहर थी ,जो धीरे – धीरे उन्हें और करीब ला रही थी।
मीरा और राजीव दोनों ही जानते थे कि ये पल सिर्फ एक क्षण नहीं ,बल्कि किसी गहरी यात्रा की शुरुआत है।लेकिन फिलहाल ,वो उस शुरुआत का पूरा लुत्फ उठा रहे थे बिना किसी जल्दबाज़ी के ,बिना किसी डर के।
कमरे में हल्की पीली रोशनी थी ,और बाहर बारिश की आवाज़ खामोशी को और गहरा बना रही थी।वो मेरे सामने खड़ी थी – आँखों में वही सवाल ,वही आग ,जो शब्दों की मोहताज नहीं होती।
मैंने धीरे से कहा ," आप आज कुछ अलग लग रही हैं "
वो हल्की मुस्कान के साथ बोली ," या शायद आप आज ज़्यादा देखने लगे हैं ?"
उसकी आवाज़ में वो नर्म झनकार थी ,जो सीधे दिल के तार छू जाती है।उसने एक क़दम आगे बढ़ाया ,फिर दूसरा और अचानक हवा में उसकी खुशबू घुल गई।वही पुरानी ,जो किसी अपने की याद दिला दे।
मैंने नज़रें चुरा लीं ,मगर वो हँस पड़ी।" डर क्यों रहे हैं ?मैंने तो आपको कभी अजनबी माना ही नहीं "
उसके शब्द नहीं ,उसका लहजा ख़तरनाक था – मीठा ज़हर जैसा।
मैंने हिम्मत करके उसकी ओर देखा।हमारी आँखें मिलीं ,और कुछ पल ऐसे गुज़रे जैसे वक़्त ने साँस लेना ही छोड़ दिया हो।उसकी उँगलियाँ हल्के से मेरी कलाई को छू गईं ,एक ऐसी छुअन जो बदन नहीं ,रूह को जगा दे।
" आप हमेशा ऐसे ही पास रहेंगे ?" मैंने धीमे स्वर में पूछा।
वो झुकी ,इतनी करीब कि उसकी साँस मेरी गर्दन पर महसूस होने लगी।" अगर आप चाहें तो बहुत पास।"
कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।हर धड़कन अब साफ़ सुनाई दे रही थी।उसने मेरे कॉलर को सीधा किया ,और उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी – जैसे वो जानती हो कि ये खेल अब किसके बस में है।
" इतनी चुप्पी क्यों ?कुछ कहिए " वो फुसफुसाई।
मैं मुस्कुरा दिया।" कुछ लम्हे बोलते नहीं बस महसूस किए जाते हैं।"
उसने सिर हल्का सा टेढ़ा किया ,और उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।वो पल ऐसा था जहाँ न कोई जल्दबाज़ी थी ,न कोई हड़बड़ी – बस तनाव ,चाहत और वो मीठा सा इंतज़ार जो हर एहसास को और गाढ़ा कर देता है।
उसने धीरे से पीछे कदम लिया ,फिर पलटकर खिड़की के पास जा खड़ी हुई।बाहर बारिश की बूंदें शीशे से टकरा रही थीं ,और उसकी परछाईं उन बूँदों के बीच और भी रहस्यमयी लग रही थी।
" आप जानते हैं " वो बिना मेरी ओर देखे बोली ," कुछ खामोशियाँ सबसे ज़्यादा शोर मचाती हैं।"
मैं उसकी ओर बढ़ा ,मगर उसने हाथ उठाकर मुझे वहीं रोक दिया।उसकी आँखों में अब चुनौती थी ,खेल था – एक मीठी जंग ,जिसमें हारना भी जीत जैसा लगे।
" इतने भी आसान नहीं हैं हम " उसने हँसते हुए कहा।
मैंने गहरी साँस ली।" और मैंने कब कहा कि मैं आसान रास्ता चाहता हूँ ?"
वो मुड़ी ,उसकी नज़रें अब और ज़्यादा गहरी थीं।कुछ ऐसा था उनमें जो सीधे सोच को जला दे।उसने धीरे से पास आकर कहा ," तो फिर तैयार रहिए क्योंकि ये रात लंबी है।"
कमरे में फिर वही नज़दीकी लौट आई – मगर इस बार और गहरी ,और ज़्यादा सुलगती हुई।शब्द कम थे ,मगर लम्हे बोल रहे थे।हर हरकत ,हर निगाह एक नई कहानी लिख रही थी बिना किसी जल्दबाज़ी के ,बिना किसी सीमा को तोड़े हुए।
बस एक धीमी ,खतरनाक गर्माहट जो अभी अपने चरम पर पहुँचने से सिर्फ़ एक सांस दूर थी।
" वो पल जहाँ साँसें टकराईं और ख़ामोशी जलने लगी "
कमरे में फैली वो धीमी गर्माहट अब किसी धीमी आग की तरह सुलग रही थी।उसकी आँखों में चमक थी ,मगर चेहरे पर एक संयमित मुस्कान – जैसे वो हर पल को जानबूझकर लंबा खींच रही हो।
वो एक कदम और करीब आई ,इतनी कि उसके दुपट्टे का सिरा मेरी उँगलियों को छू गया।मैंने नज़रें उठाईं ,और वो बिना पलक झपकाए मुझे देखती रही।
" इतना शांत क्यों हो गए आप ?" उसकी आवाज़ में नर्मी के साथ चुभन भी थी ," अभी तो आपने कहा था आप आसान रास्ते नहीं चाहते।"
मैं हल्का सा मुस्कुराया ," शांति कभी – कभी तूफ़ान का इशारा होती है।"
उसकी हँसी धीमी थी ,मगर बेहद असरदार।उसने अपनी उँगलियों से मेज़ पर रखे लैंप का स्विच घुमा दिया ,रोशनी और मंद हो गई।परछाइयाँ अब और गहरी दिखने लगीं ,और माहौल किसी पुराने ,भूले – बिसरे राज़ जैसा महसूस होने लगा।
" आपको अंदाज़ा भी है " वो धीरे से बोली ," आपकी ये गंभीरता कितनी ख़तरनाक लगती है ?"
मैंने थोड़ा झुककर कहा ," और आपको अंदाज़ा है आपकी ये नज़दीकी कितनी उलझन पैदा करती है ?"
वो पल भर के लिए रुकी ,फिर बहुत धीमे से मेरी ओर झुकी।उसकी साँसें अब साफ़ महसूस होने लगी थीं।मगर उसने खुद को छुआ नहीं ,बस वही फासला रखा जो दिल की धड़कन तेज़ कर दे।
" उलझन होना भी ज़रूरी है " उसने फुसफुसाकर कहा ," वरना एहसासों की कीमत क्या ?"
उसका चेहरा अब इतना पास था कि समय जैसे रुक गया हो।लेकिन वो अचानक पीछे हटी ,और मुस्कुराती हुई खिड़की के पास जा खड़ी हुई।उसके इस खेल में एक अजीब सा नशा था – पास आकर दूर जाना ,उम्मीद देकर उसे और गहरा करना।
" आपको क्या लगता है " उसने बिना मुड़े पूछा ," कौन ज़्यादा काबू में है यहाँ ?"
मैंने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया ," जो सवाल पूछ रहा है वही शायद जवाब से डर रहा है।"
वो मुड़ी ,और उसकी आँखों में अब शरारत साफ़ दिख रही थी।उसने अपने बालों को पीछे किया ,और धीमे क़दमों से मेरी तरफ़ बढ़ने लगी।हर कदम के साथ माहौल और घना होता गया ,जैसे हवा भी साँस लेने में हिचक रही हो।
" डर ?" वो मुस्कुराई ," डर तो सिर्फ़ उन्हें लगता है जो खोने से डरते हैं।"
उसने मेरे बहुत करीब आकर कहा ," और मैं सिर्फ़ महसूस करना चाहती हूँ।"
ये शब्द किसी आग की तरह अंदर उतर गए।मैं कुछ बोलता ,उससे पहले ही उसने अपनी हथेली हल्के से मेरी छाती पर रख दी – एक ऐसा स्पर्श जो सीमा में रहकर भी बेचैनी बढ़ा दे।
" दिल की धड़कन तेज़ है " वो धीमी आवाज़ में बोली ," या माहौल का असर है ?"
मैंने उसकी आँखों में देखकर कहा ," सच तो ये है ये लम्हा खुद को कंट्रोल नहीं कर पा रहा।"
उसने हथेली हटा ली ,मगर उसकी उँगलियाँ जाते – जाते जैसे एक सवाल छोड़ गईं।फिर वो धीरे से घूमकर कुर्सी पर बैठ गई ,नजरें अब भी मुझ पर टिकी थीं।
" इतनी आसानी से खत्म नहीं होगा ये " उसने मुस्कुराकर कहा ," कुछ लम्हों को अधूरा छोड़ना भी एक कला होती है।"
मैंने दो क़दम आगे बढ़ाए ,मगर फिर खुद रुक गया।इस खेल में जल्दबाज़ी की कोई जगह नहीं थी।हर सेकंड एक नई बेचैनी ,एक नई खामोशी पैदा कर रहा था।
कमरा अब शब्दों से नहीं ,निगाहों से बात कर रहा था।हवा में वो अनकही चाहत तैर रही थी जो छुई नहीं जाती – बस महसूस की जाती है।
उसने सिर हल्का सा झुकाकर कहा ," अगर ये रात यूँ ही चलती रही तो नींद किसे आएगी ?"
मैंने गहरी साँस ली ," शायद नींद उन लोगों के लिए होती है जिन्हें इंतज़ार करना नहीं आता।"
वो मुस्कुरा दी।और उसी मुस्कान में एक ऐसा वादा छुपा था – जो अभी पूरा नहीं हुआ ,मगर उसकी आहट साफ़ महसूस हो रही थी।
कमरा फिर से शांत हो गया लेकिन उस शांति के नीचे ,कुछ और ही जल रहा था।
मौन की उस परत के नीचे कुछ गहराई से सुलग रहा था ,जैसे मद्धिम आँच पर रखा चाँदनी जैसा ख्वाब।उसकी मुस्कान अब भी हवा में तैर रही थी ,और मेरी साँसें जैसे उसी लय में खुद को ढाल रही थीं।
वो धीरे से उठी ,उसकी चाल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी – बस एक नज़ाकत थी ,एक एहसास को और गाढ़ा करने की कला।उसने मेरी ओर देखा ,फिर यूँ नजरें झुका लीं जैसे अपनी ही शरारत से खेल रही हो।
" आप ऐसे देख रहे हैं जैसे मैं कोई रहस्य हूँ ," उसने हल्की आवाज़ में कहा ," या शायद कोई अधूरी चाहत।"
मैंने कदम आगे बढ़ाए ,उसकी आँखों का सामना करते हुए बोला ," कुछ रहस्य होते ही इसलिए हैं ताकि उन्हें सुलझाया न जाए ,बस महसूस किया जाए।"
उसकी भौंहों में हल्की सी कशिश आई।उसने अपना दुपट्टा सँभालते हुए धीरे से कहा ," और महसूस करने की भी कोई सीमा होती है या आप सिर्फ़ आज़ाद होना चाहते हैं ?"
हवा में सवाल नहीं ,एक चुनौती तैर रही थी।उसने मेरी ओर बहुत धीरे से हाथ बढ़ाया ,मगर सिर्फ़ मेरी कलाई के पास आकर रुक गई।वो स्पर्श नहीं था ,पर उसकी नज़दीकी ने सोच को भी बेचैन कर दिया।
" इतनी सावधानी क्यों ?" मैंने कहा ," जब माहौल खुद ही बोल रहा है।"
वो मुस्कुराई ,और ज़रा झुककर बोली ," क्योंकि असली मज़ा इंतज़ार में है ,और आप इंतज़ार के ही तो आदी नहीं लगते।"
उसकी आँखों की चमक अब गहरी हो चुकी थी।वो मेरे बेहद क़रीब आई ,मगर फिर भी फासला बचाए रखा – वही फासला जो दिल की धड़कन को और तेज़ कर दे।
" शायद " मैंने धीमे स्वर में कहा ," पर आज कुछ रुकना मुश्किल लग रहा है।"
उसने हल्की हँसी के साथ सिर थोड़ा झुकाया ," मुश्किल चीज़ें ही तो यादगार बनती हैं।"
वो पीछे हटी ,पर उसकी नज़रें अब भी मेरी आँखों में थीं।उसने खिड़की की ओर मुड़ते हुए कहा ," बाहर की हवा ठंडी है मगर यहाँ माहौल कुछ और ही कहानी कह रहा है।"
मैंने भी खिड़की की ओर देखते हुए कहा ," कहानी वही बनती है जो लिखी नहीं जाती ,बस जिया जाता है।"
वो मेरी ओर फिर मुड़ी।इस बार उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी ,जैसे कोई अधूरा ख्वाब पूरा होने की तरफ़ बढ़ रहा हो।उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरी उँगलियों को हल्के से छू लिया – बस एक पल के लिए।
" ये छुअन " उसने फुसफुसाकर कहा ," सिर्फ़ एहसास है पर इसका असर कहीं गहरा है।"
मैंने उसकी उँगलियों को हल्के से थामते हुए कहा ," कुछ एहसास शब्दों से नहीं धड़कनों से समझे जाते हैं।"
वो पल भर के लिए ठिठकी ,फिर अपनी उँगलियाँ छुड़ाकर मुस्कुरा दी।उसकी आँखों में अब एक धीमी सी गर्माहट थी ,जो सीधे दिल तक उतर रही थी।
" आज आप कुछ ज़्यादा ही बोल रहे हैं ," उसने शरारती लहजे में कहा ," या माहौल ने आपको भी बदल दिया ?"
मैंने सिर हल्का सा झुकाकर जवाब दिया ," शायद आप की मौजूदगी ने।"
उसने गहरी साँस ली ,जैसे खुद को संभाल रही हो।फिर धीरे से कुर्सी के सहारे खड़ी हो गई ,और बिना पलटे कहा ," कुछ पल ऐसे होते हैं जो बार – बार नहीं आते "
मैंने कहा ," और कुछ लोग जिन्हें भूलना मुमकिन नहीं होता।"
वो पलटकर मेरी तरफ़ देखी।उसकी निगाहों में अब कोई सवाल नहीं था ,सिर्फ़ एक मौन स्वीकार – एक ऐसा इशारा जो बिना बोले सब कह जाए।
उसने फिर से एक क़दम आगे बढ़ाया ,और इस बार उसकी आवाज़ पहले से भी धीमी थी ," अगर आज की रात को याद बनाना है तो उसे जल्दबाज़ी से नहीं ,एहसास से जिया जाता है।"
मैंने उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए बस इतना कहा ," और मैं हर लम्हा जीना चाहता हूँ।"
उसकी मुस्कान फिर उभरी ,मगर अब उसमें एक अनकहा वादा था।कमरा फिर से शांत था ,पर उस खामोशी के भीतर दिलों की बातचीत तेज़ हो चुकी थी।
और वही धीरे – धीरे ,बिना किसी शोर के ,एक नए एहसास की ओर बढ़ रही थी।
उसकी साँसें अब पहले से भारी थीं ,और कमरे की खामोशी किसी तूफान से पहले की शांति जैसी लग रही थी।दोनों के बीच की दूरी अब सिर्फ़ हवा की थी ,मगर वही हवा जैसे काँप रही हो।
वो धीरे से मेरी ओर आई ,इतनी क़रीब कि उसकी साँसों की गर्माहट मेरे गालों को छूने लगी।उसकी आँखें झुकी हुई थीं ,पर उनमें छिपी आग साफ़ महसूस हो रही थी।
" अब भी कहोगे कि ये बस एक एहसास है ?" उसकी आवाज़ काँपती हुई थी ,पर उसमें डर नहीं था – सिर्फ़ स्वीकार था।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।बस मेरी उँगलियाँ अनायास ही उसकी हथेली को थामने लगीं।वो पल कोई शब्द नहीं चाहता था।उसकी पलकों का झुकना ,दिल की तेज़ धड़कन और कुछ पल की खामोशी – हर कुछ खुद ही बोल रहा था।
उसने धीरे से सिर उठाया ,और हमारी नज़रें टकराईं।वो टकराव नहीं था ,वो एक समझ थी – जो भीतर तक उतरती चली गई।
" आज " उसने धीमे से कहा ," मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगी।"
मैंने उसकी ओर झुकते हुए बस इतना कहा ," और मैं रोकना भी नहीं चाहता।"
उसकी आँखें बंद हो गईं ,और उसी पल सब कुछ जैसे धीमा हो गया।वक्त ,आवाज़ ,सोच – सब पीछे छूट गया।सिर्फ़ वो क्षण बचा ,जिसमें दो धड़कनें एक ही लय में बह रही थीं।
उसकी उँगलियाँ मेरे कंधों पर टिकी थीं ,मानो वो खुद को थामे हुए हो ,और मैं उसे।
सांसें और भी गहरी हो गईं।वो लम्हा अब किसी सीमा में नहीं था – न शब्दों में ,न तर्क में।
बस एक ऐसा एहसास जो हर कोशिका में उतर गया ,और दिल के सबसे गहरे कोने तक पहुँच गया।
कमरे की रौशनी हल्की थी ,पर उस पल की तीव्रता किसी उजाले से कम नहीं थी।दोनों के बीच की खामोशी अब पूर्ण थी – एक ऐसा सन्नाटा जो सब कुछ कह चुका था।
और वहीं ,उसी मौन में वो चरम पर पहुँची भावना धीरे – धीरे एक स्थायी याद में बदल गई।