सावन की फुहारों में छुपी आग






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🔥 आँखों की चोरी, गाँव की जलन

🎭 सावन की फुहारों में छुपी एक ऐसी आग जो पूरे गाँव को जलाकर राख कर सकती है। दो शरीर, एक गुपचुप तालमेल, और वो डर… कि कोई देख न ले।

👤 प्रेम – २४ साल, खेतों में काम करने वाला छरहरा जवान। गहरी काली आँखें जिनमें एक अलसाई हुई वासना तैरती है। उसकी मजबूत बाँहें, चौड़ी छाती और नीचे उभरा हुआ वो अकड़न भरा लंड जो उसकी मोटी धोती में अक्सर निशान छोड़ जाता है।

सीमा – ३८ साल, विधवा, प्रेम की चाची। उम्र के साथ और भरकर उभरे हुए स्तन, कमर का मोटा होना और चूतड़ों का फैलाव उसे और भी भरी-पूरी लगाता है। रातों को अकेले में अपने निप्पल मलती है और सोचती है कि काश कोई जवान मर्द उसे दबोच ले।

📍 सेटिंग – छोटा सा गाँव 'बिरसापुर'। सावन का महीना, शाम ढल रही है और हल्की फुहार पड़ रही है। प्रेम की चाची का घर, जहाँ वह अक्सर काम में हाथ बंटाने आता है। आज चूल्हे के पास बैठे-बैठे उसकी नजर चाची के भीगे कुर्ते पर अटक गई, जहाँ से उसके भारी स्तनों के निप्पल साफ उभर रहे थे।

🔥 कहानी शुरू

"चाची, लकड़ी तो रख दी मैंने भीतर," प्रेम ने कहा, पर उसकी आवाज़ थोड़ी भारी थी। उसकी नज़रें सीमा के स्तनों से हट नहीं रही थीं, जो भीगे कपड़े से चिपककर और भी उभर आए थे।

सीमा ने झुककर चूल्हा सुलगाया। उसका पल्लू सरक गया और पीठ का एक हिस्सा दिखने लगा। "अरे, तू तो पूरा भीग गया। कपड़े बदल ले यहीं," उसने बिना मुड़े कहा, पर उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी।

प्रेम ने अपनी गीली कमीज़ उतारी। उसकी छाती पर पानी की बूंदें लुढ़क रही थीं। सीमा ने एक झलक देखी और जल्दी से नजरें फेर लीं, पर उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। "लो, ये सूखा कपड़ा ले लो," कहते हुए उसने एक गमछा बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ प्रेम की हथेली को छू गईं। एक बिजली सी दौड़ गई दोनों के शरीर में।

"धन्यवाद चाची," प्रेम ने कहा और गमछे से अपना सीना पोंछने लगा। उसकी नज़र सीमा के चूतड़ों पर टिकी थी, जो साड़ी के भीगे पल्लू से साफ उभर रहे थे। वह अन्दर से खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसका लंड अकड़ चुका था।

सीमा उठी और बरसाती से पानी भरने लगी। झुकते वक्त उसकी साड़ी और सिकुड़ी और जांघों का मांसल हिस्सा दिखाई देने लगा। प्रेम का सांस रुक सा गया। वह उठा और पास जाकर बोला, "मैं भर लेता हूँ।"

वह उसके पीछे खड़ा हो गया। उनके शरीरों के बीच बस एक इंच का फासला था। सीमा ने महसूस किया कि उसकी गांड प्रेम के धोती में अकड़े हुए लंड से छू रही है। वह सिहर गई, पर हिली नहीं। एक गहरी सांस ली। उसके स्तनों का खिंचाव और बढ़ गया।

"प्रेम… तू…" वह कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द गले में अटक गए। प्रेम ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी कमर को छू लिया। एक जलन भरी गर्माहट दोनों में फैल गई। बाहर बारिश तेज हो रही थी, और अन्दर दो शरीरों की वासना भी। सीमा ने अपनी आँखें मूंद लीं, यह सोचकर कि कोई देख न ले, पर उसने प्रेम का हाथ हटाया नहीं।

प्रेम का हाथ सीमा की कमर पर टिका रहा, उंगलियाँ हल्की से दबाती हुईं। उसने अपना मुँह सीमा के कान के पास लाया, उसकी साँसों की गर्मी उसकी गर्दन को छूने लगी। "चाची… तुम्हारा शरीर… आग लगा रहा है," उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक खुरदुरापन था।

सीमा ने आँखें खोलीं, पर वह आगे नहीं हिली। उसने अपना हाथ पीछे ले जाकर प्रेम की जाँघ को छुआ, वहाँ उसका लंड कपड़े में कड़ा खड़ा था। एक कराह निकल गई उसके गले से। "ये… ये ठीक नहीं है, प्रेम," उसने कहा, पर उसका हाथ वहीं रुका रहा, उंगलियाँ उसकी धोती के ऊपर से उसके अकड़े हुए अंग के आकार को महसूस कर रही थीं।

प्रेम ने दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और सीमा के पेट के नरम मांस पर रख दिया, उसे ऊपर की ओर सरकाते हुए। उसकी उंगली उसके भीगे कुर्ते के नीचे घुस गई, नाभि के ऊपर वाले हिस्से को छूते हुए। सीमा ने सिर पीछे झुकाया और प्रेम के कंधे पर टिका दिया, उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं। बाहर बारिश की आवाज़ तेज थी, पर अन्दर सन्नाटे में दोनों की हल्की कराहें गूंज रही थीं।

"तुम्हारी चूचियाँ… कितनी कड़ी हैं," प्रेम ने कान में कहा और अपना हाथ और ऊपर सरकाया, अब उसकी हथेली उसके भारी स्तन के नीचे आ गई। उसने हल्का सा दबाया। सीमा का शरीर ऐंठ गया। "अरे… मत…" वह बुदबुदाई, पर उसने अपना सीना आगे की ओर झुका दिया, उसकी हथेली में और ज्यादा देने के लिए।

प्रेम ने धीरे से उसके कुर्ते का बटन खोला। कपड़ा थोड़ा सा खुला और उसके निप्पल का गहरा गुलाबी सिरा दिखाई दिया। उसने उंगली से उस निप्पल के चारों ओर घेरा बनाया। सीमा ने मुँह खोलकर एक लम्बी सांस ली, उसकी पलकें काँप रही थीं। "तुम देख रहे हो… सब," वह फुसफुसाई।

"हाँ… और आज और भी देखूँगा," प्रेम बोला और उसने अपने दोनों हाथों से सीमा के स्तनों को कुर्ते के अंदर से पकड़ लिया, उन्हें भरपूर मसलते हुए। उसके निप्पल उंगलियों के बीच कड़े होकर निकल आए। सीमा का हाथ पीछे मुड़ा और प्रेम के लंड को जोर से दबोच लिया। प्रेम ने एक गहरी कराह निकाली और अपनी धोती में छिपे अंग को उसकी हथेली में धकेल दिया।

वह उसे और पास खींच लाया। अब उनके शरीर पूरी तरह चिपक चुके थे। प्रेम का लंड सीमा की गांड के बीच में दबा हुआ था और सीमा के स्तन उसकी छाती पर। प्रेम ने उसकी गर्दन पर गर्म साँसें छोड़ते हुए, उसके कान का लौं छीला। सीमा ने अपनी आँखें मूँद लीं और अपने सिर को हल्का-हल्का घुमाने लगी, उसके होंठों से बार-बार एक ही शब्द निकल रहा था – "हाँ… हाँ…"

प्रेम का एक हाथ नीचे सरककर उसकी साड़ी के पल्लू को समेटने लगा। उसने उसके जांघों के मांसल हिस्से को टटोला, फिर उसके नितंबों के बीच के गर्म घने स्थान की ओर बढ़ा। सीमा ने अपनी जांघें थोड़ी और खोल दीं, एक मूक आमंत्रण। उसकी साड़ी अब घुटनों के ऊपर सिमट आई थी। प्रेम की उंगली उसके गीले अंदरूनी कपड़े के ऊपर से उसकी चूत की गर्मी महसूस करने लगी। वहाँ पहले से ही नमी फैली हुई थी।

"चाची… तुम तो पूरी तरह तैयार हो," उसने कहा और उंगली से हल्का दबाव दिया। सीमा ने तेजी से सांस भरी और अपना हाथ और तेजी से प्रेम के लंड पर चलाने लगी, उसे धोती के अंदर से बाहर निकालने की कोशिश में। "इसको… बाहर निकालो… मुझे छूने दो," वह हाँफती हुई बोली।

प्रेम ने अपनी धोती का अन्दाज़ खोला और अपना बड़ा, कड़ा लंड बाहर निकाल लिया। उसने सीमा का हाथ लेकर उस पर रख दिया। सीमा की मुट्ठी गर्म और नरम थी। उसने उसे पूरी लम्बाई में पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी, उसकी नसों के उभार को महसूस करते हुए। प्रेम ने सिर पीछे झुकाया और आँखें मूँद लीं, उसके होंठों पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान थी।

प्रेम ने सीमा के हाथ को अपने लंड पर और तेज चलाने के लिए प्रोत्साहित किया, उसकी उंगलियों को अपने ऊपर कसते हुए। उसकी कराह अब खुलकर कमरे में गूंजने लगी। फिर उसने अचानक सीमा का हाथ रोका और खुद घूमकर उसका मुंह अपनी ओर खींच लिया। उनके होंठों के बीच बस एक इंच का फासला रह गया था, उनकी सांसें गर्म और तेज एक-दूसरे के चेहरे पर लग रही थीं।

"पहले तुम्हें देखना है," प्रेम ने कहा और उसने सीमा के कुर्ते के दूसरे बटन को खोल दिया। कपड़ा दोनों ओर खुल गया और उसके भारी, लटकते स्तन पूरी तरह बाहर आ गए। गहरे गुलाबी निप्पल हवा में कड़े होकर खड़े थे। प्रेम ने लालायित निगाहों से देखा, फिर झुककर एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया। उसने जीभ से उसके चारों ओर घेरा बनाया, फिर चूसना शुरू किया।

"आह… प्रेम… वाह रे…" सीमा चीख उठी और उसने प्रेम के सिर को अपने स्तनों में दबा लिया, उसे और गहराई से चूसने के लिए प्रेरित करती हुई। उसकी उंगलियां उसके घने बालों में चिपक गईं। प्रेम का एक हाथ नीचे सरककर उसकी साड़ी के पल्लू को और ऊपर चढ़ाने लगा, जब तक कि उसकी जांघों का मोटा हिस्सा और गीली चूत पूरी तरह से खुल नहीं गई। उसने अपनी उंगलियों से उसके अंदरूनी कपड़े को एक तरफ सरका दिया।

सीमा की चूत गर्म और पहले से ही गीली थी, उसके बालों में नमी चमक रही थी। प्रेम ने अपनी उंगली धीरे से उसके भग के ऊपर फेरी, बिना अंदर घुसे। सीमा का शरीर ऐंठ गया और वह प्रेम के मुंह को अपने दूसरे निप्पल की ओर धकेलने लगी। "दोनों… दोनों को… बराबर प्यार दो," वह हांफती हुई बोली।

प्रेम ने आज्ञा का पालन किया। वह दूसरे स्तन पर गया, उसे जोर से चूसते और निप्पल को दांतों से हल्का सा काटते हुए। इसके साथ ही, उसकी मध्यमा उंगली अब सीमा की चूत के छिद्र के चारों ओर चक्कर लगाने लगी, गर्मी और नमी को और गहराई से महसूस करते हुए। सीमा के घुटने कांपने लगे। वह अपना भार प्रेम पर डालकर खड़ी रही।

"अंदर… उंगली… अब," सीमा ने गुहार लगाई, उसकी आवाज़ एक दर्द भरी कराह में बदल गई। प्रेम ने धीरे से उंगली का दबाव बढ़ाया और उसे उसकी तंग, गर्म गुफा के अंदर धकेल दिया। सीमा ने तेजी से सांस भरी, उसकी चूत ने तुरंत उंगली को चारों ओर से कसकर पकड़ लिया। प्रेम ने उंगली को धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया, जबकि उसका मुंह अब सीमा के होंठों को ढूंढ रहा था।

उनके मुंह मिले। यह कोमल चुंबन नहीं था, बल्कि भूख और वासना से भरा एक गहरा, नम चुंबन था। उनकी जीभें आपस में लड़ने लगीं। प्रेम ने उंगली के साथ-साथ अब अपना अंगूठा भी सीमा के भग के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया, उसकी संवेदनशील कली को दबाते हुए। सीमा की कराहें चुंबन में डूबने लगीं। उसने प्रेम के कंधे पर अपने नाखून गड़ा दिए।

प्रेम ने एक और उंगली जोड़कर उसे अंदर धकेला। सीमा की आंखें चौंधिया गईं। "हां… भर दो… मुझे," उसने उसके मुंह से ही फुसफुसाया। प्रेम ने उंगलियों को तेजी से चलाना शुरू किया, गहरे और तेज, उसकी गीली चूत से चिपचिपी आवाजें निकलने लगीं। बाहर बारिश थम चुकी थी, पर कमरे में उनके शरीरों की गर्मी और पसीने की महक हवा में घुल रही थी।

सीमा का शरीर तनाव से भरने लगा। उसने प्रेम के लंड को फिर से पकड़ लिया, इस बार और जोर से, और उसे अपनी ओर खींचा। "अब… ये… मुझमें…," वह बुदबुदाई, उसकी इच्छा स्पष्ट थी। प्रेम ने अपनी उंगलियां बाहर निकालीं और उन्हें चमकते हुए देखा। फिर उसने सीमा को धीरे से मुड़ने के लिए कहा। उसने चूल्हे के पास जमीन पर पड़ी एक पुरानी चादर को फैला दिया।

सीमा ने चादर की ओर देखा, फिर प्रेम की आँखों में झाँका। उसकी आँखें अब पूरी तरह वासना से धुंधला चुकी थीं। वह बिना कुछ कहे, धीरे से मुड़ी और चादर पर घुटनों के बल बैठ गई। उसकी नंगी पीठ और फैले हुए चूतड़ प्रेम के सामने थे। प्रेम ने उसकी रीढ़ की हड्डी पर अपनी उँगलियाँ फेरी, नीचे की ओर सरकते हुए, उसके नितंबों के बीच की गर्म दरार तक।

"इतनी गर्म… तुम तो सचमुच आग हो चाची," प्रेम ने कहा और अपने घुटनों पर बैठ गया, उसकी गांड के पीछे। उसने अपना बड़ा, गरम लंड सीमा के नितंबों के बीच रखा और हल्का सा दबाया, उसकी चूत के बाहरी होंठों के बीच से रगड़ खाते हुए। सीमा ने सिर घुमाकर देखा, उसके होंठ काँप रहे थे। "सीधे… अंदर… मत रगड़ो बस," वह फुसफुसाई।

प्रेम ने एक हाथ से अपने लंड को सीधा किया और दूसरे हाथ से सीमा की कमर को पकड़ा। उसने लंड का सिरा सीमा की गीली चूत के छिद्र पर टिकाया। वहाँ पहले से ही नमी इतनी थी कि वह आसानी से फिसल गया। प्रेम ने धीरे से जोर लगाया। सीमा की चूत के मांसल होंठ उसके मोटे सिरे को निगलने लगे। सीमा ने एक गहरी, दर्द भरी सांस भरी और अपनी मुट्ठियाँ चादर में भींच लीं।

"आह… रुको… थोड़ा," सीमा कराही, पर उसकी पीठ एक धनुष की तरह और अंदर की ओर झुक गई, उसे और गहराई से लेने के लिए। प्रेम ने रुककर उसे समय दिया, पर उसकी नजरें उसकी पीठ पर बहते पसीने की बूंदों पर टिकी थीं। फिर उसने धीरे से और धकेला। सीमा की तंग गर्मी उसे चारों ओर से लपेटने लगी। वह पूरी तरह अंदर चला गया।

"हाँ… अब… हिलो," सीमा ने मुंह से कपड़ा दबाते हुए कहा। प्रेम ने अपने हाथों से उसके चूतड़ों को कसकर पकड़ा और धीरे-धीरे अंदर-बाहर होना शुरू किया। हर धक्के के साथ सीमा के स्तन हवा में झूमते और उसकी कराह कमरे में गूंजती। प्रेम का रफ्तार बढ़ने लगा। वह अब और तेज, और गहरे धक्के मार रहा था, उसकी जाँघें सीमा के नितंबों से टकरा रही थीं।

सीमा ने अपना एक हाथ पीछे ले जाकर अपनी चूत के ऊपर रख लिया, जहाँ प्रेम का लंड अंदर-बाहर हो रहा था। उसने अपनी उंगलियों से अपनी संवेदनशील कली को दबाना और रगड़ना शुरू किया। "और… जोर से… प्रेम!" उसकी आवाज़ एक लंबी कराह में बदल गई। प्रेम ने उसकी कमर को और कसकर पकड़ा और जमकर धकेलना शुरू कर दिया। उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ चादर के सरसराहट के साथ मिल रही थी।

प्रेम ने आगे झुककर सीमा के कंधे पर दांत गड़ा दिए। सीमा चीख उठी, पर यह दर्द नहीं, आनंद की चीख थी। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ने लगी, गर्मी और भी बढ़ गई। प्रेम को लगा उसका लंड और भी जकड़ रहा है। "मैं… मैं आ रही हूँ…" सीमा हांफने लगी। उसकी उंगलियाँ अपनी कली पर पागलों की तरह नाच रही थीं।

प्रेम ने अपनी गति और तेज कर दी, हर धक्का अब पूरी ताकत से लग रहा था। सीमा का शरीर एकाएक ऐंठ गया। एक लम्बी, कंपकंपाती कराह उसके गले से निकली और उसकी चूत में गर्म झोंके फूट पड़े। उसका सारा शरीर ढीला पड़ गया। प्रेम ने उसकी इस ऐंठन को महसूस किया और अपना सारा संयम खो दिया। उसने दो-तीन आखिरी जोरदार धक्के दिए और खुद भी गहराई से कराह उठा। उसका गर्म तरल सीमा की गहराइयों में उतर गया।

दोनों सांसों से लड़ते हुए, पसीने से तरबतर, चादर पर गिर पड़े। प्रेम अभी भी उसके अंदर था। सीमा ने पलटकर उसका चेहरा देखा और उसे एक कोमल चुंबन दिया। "कितनी देर से… इंतज़ार था," वह फुसफुसाई। प्रेम ने उसके गीले बालों को सहलाया। बाहर से मेंढकों की टर्र-टर्र की आवाज़ आने लगी थी। अंदर, बस दो शरीरों की गर्मी बची थी, और एक ऐसा रहस्य जो अब सावन की फुहारों में हमेशा के लिए दब जाएगा।

प्रेम सीमा के ऊपर से लुढ़ककर बगल में आ गया, पर उसका हाथ उसके पेट के नरम मांस पर फिरा। सीमा की सांसें अभी भी तेज थीं, उसकी छाती लहरा रही थी। प्रेम ने उसके पसीने से तर गाल पर होंठ रखे और एक कोमल चुंबन दिया। "चाची… अब भी तुम्हारा शरीर कांप रहा है," उसने फुसफुसाया।

सीमा ने आँखें खोलीं और उसकी ओर देखा, उसकी नज़रों में एक नटखट चमक थी। "तूने तो मेरी हड्डियाँ तक पिघला दीं," उसने कहा और उसके होंठों को अपनी उंगली से छुआ। फिर वह धीरे से बैठ गई, उसके स्तन अभी भी खुले और चमकदार थे। उसने प्रेम की ओर देखा, उसका नज़रिया बदल चुका था-शर्म गायब थी, अब सिर्फ दावे की भावना थी।

उसने अपना हाथ बढ़ाया और प्रेम के सीने के बालों में उंगलियाँ फेरने लगी, नीचे की ओर सरकती हुईं, उसके पेट की मजबूत मांसपेशियों पर होते हुए। "मेरी बारी है," सीमा ने कहा, उसकी आवाज़ में एक नया साहस था। वह और नीचे झुकी और प्रेम के लंड को देखा, जो अभी भी नम और थोड़ा सख्त था। उसने उसे अपनी हथेली में लिया और हल्के से दबाया।

प्रेम ने आँखें मूंद लीं और एक गहरी सांस ली। सीमा ने अंगूठे से उसके सिरे पर जमी सफ़ेद बूंद को घेरा बनाते हुए साफ किया। फिर वह और नीचे झुकी और अपनी जीभ से उसके लंड के नीचे के नरम हिस्से को चाटने लगी, ऊपर की ओर बढ़ते हुए। प्रेम का शरीर ऐंठ गया। "सीमा…" उसने उसका नाम पुकारा, और यह सुनकर सीमा के होठों पर मुस्कान फैल गई।

उसने प्रेम के लंड का सिरा अपने होंठों के बीच ले लिया, जीभ से घेरा बनाते हुए। फिर धीरे-धीरे उसे अपने मुंह में लेने लगी, गहराई तक जाते हुए। प्रेम ने अपनी उंगलियों से उसके बाल पकड़ लिए और एक कराह निकाली। सीमा की तकनीक अनाड़ी थी, पर जुनून से भरी हुई। वह उसे चूसते हुए ऊपर-नीचे होने लगी, एक हाथ से उसके अंडकोष को हल्का सा दबाते हुए।

थोड़ी देर बाद वह रुकी और ऊपर देखा, उसके होंठ चमक रहे थे। "मुझे ऊपर आना है," उसने कहा और प्रेम के ऊपर चढ़ गई, उसकी जांघें उसके कूल्हों के दोनों ओर। उसने अपने हाथों से अपने स्तनों को दबाया और प्रेम के चेहरे के पास ले आई। "इन्हें फिर से चूसो, जब तक मैं ऊपर-नीचे नहीं होती," उसने आदेश दिया।

प्रेम ने तुरंत एक निप्पल को मुंह में ले लिया और दूसरे को हाथ से मसलने लगा। सीमा ने अपने हाथों से प्रेम के कंधों को पकड़ा और अपनी गीली चूत को उसके लंड के सिरे पर टिकाया। वह धीरे से नीचे बैठी, उसे फिर से अंदर लेते हुए। दोनों ने एक साथ कराह भरी। सीमा ने गति पकड़नी शुरू की, धीरे-धीरे ऊपर-नीचे, उसकी गांड प्रेम की जांघों पर पड़ रही थी।

प्रेम का मुंह उसके स्तन से हटा और उसने उसके होंठों को चूमा, एक हाथ उसकी गांड को कसकर पकड़ते हुए, उसे नीचे की ओर दबाने में मदद कर रहा था। सीमा की सांसें फिर से तेज होने लगीं। उसने अपनी गति बढ़ा दी, अब तेजी से उठना-बैठना, उसके चूतड़ों के टकराने की आवाज़ फिर से गूंजने लगी। प्रेम ने बैठकर उसे गले लगा लिया और उसकी पीठ पर पसीने से गीले हाथ फेरे।

"मैं फिर से आने वाली हूँ… तुम भी… मेरे साथ आना," सीमा हांफती हुई बोली। प्रेम ने सिर हिलाया और उसकी गति के साथ तालमेल बिठाना शुरू किया, ऊपर से धक्के मारते हुए। सीमा ने अपना सिर पीछे झुकाया और चीख निकाली, उसकी चूत फिर से सिकुड़ने लगी। प्रेम ने उसे कसकर पकड़ लिया और कई तेज, गहरे धक्के दिए, जब तक कि वह खुद एक लंबी, कंपकंपाती कराह के साथ नहीं ठहर गया। सीमा उस पर गिर पड़ी, दोनों की धड़कनें एक दूसरे से टकरा रही थीं।

सीमा का सिर प्रेम के सीने पर टिका रहा, दोनों की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। प्रेम का हाथ उसकी पीठ पर बेहोशी से उँगलियाँ फेर रहा था, गीली त्वचा पर नमी के मार्ग बनाते हुए। कमरे में हवा अब ठंडी हो रही थी, पर उनके शरीरों के बीच की गर्मी अभी भी कायम थी। सीमा ने आँखें मूँदे-मूँदे अपना हाथ उठाया और प्रेम के होठों को छुआ, फिर अपनी उँगली उसके मुँह में दाखिल कर दी। प्रेम ने उसे चूसा, उसकी नमकीन त्वचा का स्वाद लेते हुए।

वह धीरे से उसके ऊपर से उतरी और बगल में लेट गई, एक टाँग प्रेम के पेट पर डालकर। उसकी नज़र प्रेम के चेहरे पर थी, जो चाँद की रोशनी में निखर रहा था। "आज रात कोई नहीं आएगा," सीमा ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक निश्चिंतता थी। प्रेम ने मुस्कुराकर उसकी नाक चुटकी में ले ली। "तो क्या हम यहीं सो जाएँगे?" उसने पूछा।

सीमा ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि उठकर बैठ गई और चादर का एक कोना उठाकर प्रेम के पेट के नीचे के हिस्से को पोंछने लगी। उसकी हरकत में एक घरेलू स्नेह था, पर नज़रें जब उसके नरम होते हुए अंग पर पड़ीं, तो उनमें फिर से एक चिंगारी दौड़ गई। उसने धीरे से उसे हथेली में ले लिया और मलने लगी, देखते हुए कि कैसे वह फिर से प्रतिक्रिया देता है। "ये तो अभी भी थकान मानने को तैयार नहीं है," सीमा ने नटखट अंदाज़ में कहा।

प्रेम ने करवट ली और उसे नीचे की ओर खींच लिया। "तुम्हारी वजह से," उसने कहा और उसके कान की लौ चाटते हुए नीचे उतरने लगा। उसके होंठ उसकी गर्दन पर, फिर कॉलरबोन पर गए। सीमा ने अपनी बाँहें फैला दीं और आँखें मूँद लीं, उसकी हर चाट का आनंद लेते हुए। प्रेम का मुँह उसके स्तनों पर वापस आया, पर इस बार उसने दाँतों का इस्तेमाल किया – हल्का सा काटकर, निप्पल के आसपास की नरम त्वचा को चबाते हुए। सीमा ने उसके बालों को जकड़ लिया और अपने सीने को उसकी ओर धकेला।

फिर प्रेम ने नीचे सरकना शुरू किया। उसने अपने होंठों से सीमा के पेट के नरम घेरे को चूमा, नाभि में जीभ घुमाते हुए। सीमा की जाँघें बेचैनी से हिलीं। जब प्रेम का चेहरा उसकी जाँघों के बीच पहुँचा, तो उसने उसे रोक लिया। "रुको… मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे देखो," सीमा ने कहा और अपने घुटने मोड़कर पैर जमीन पर टिका लिए, अपनी चूत को पूरी तरह उसकी नज़रों के सामने प्रस्तुत करते हुए।

प्रेम ने लालायित नज़रों से देखा – उसके बाल अभी भी गीले और उलझे हुए थे, उसके होंठ थोड़े खुले हुए और गहरे गुलाबी, अंदर से एक चमक दिखाई दे रही थी। उसने अपने अंगूठे से दोनों होंठों को अलग किया, और सीमा ने एक कंपकंपी महसूस की। "इतनी सुंदर… तुम्हारी चूत," प्रेम ने कहा और बिना देर किए, अपनी जीभ से एक लंबा, चौड़ा स्ट्रोक दिया, ऊपर से नीचे तक।

सीमा की एक तीखी कराह निकली। उसने अपने हाथों से अपनी जाँघें और खोल दीं। प्रेम ने जीभ से उसकी कली को ढूँढा और उस पर घेरे बनाने लगा, हल्के दबाव के साथ। फिर उसने अपने होंठों से उसे चूसना शुरू किया, एक हाथ से उसके नितंबों को कसकर पकड़ते हुए। सीमा का शरीर ऐंठने लगा, उसकी आवाज़ गुहार में बदल गई। "वहीं… ठीक वहीं… हाँ!"

प्रेम ने अपनी नाक और ठुड्डी से उसके भग के ऊपर दबाव डाला, जबकि जीभ उसके छिद्र के चारों ओर चक्कर लगा रही थी। वह अंदर घुसी, थोड़ी गहराई तक, और फिर बाहर आई। सीमा के हाथ उसके सिर पर कसकर बंध गए, उसे अपनी ओर दबा रहे थे। उसकी सांसें तेज चल रही थीं, और प्रेम को महसूस हुआ कि उसकी जाँघें फिर से काँपने लगी हैं। वह उस पर और मेहनत से जुट गया, जीभ की गति तेज और दबाव बढ़ाते हुए। सीमा का पेट तन गया, उसकी एक लम्बी, कंपकंपाती चीख निकली और उसका शरीर चादर पर गिर गया, ऐंठन भरी सुखद थकावट से भरा हुआ। प्रेम ने ऊपर देखा और उसके पसीने से तर चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान देखी।

प्रेम ने ऊपर सरककर सीमा के शरीर से सट गया, उसकी जाँघें उसकी जाँओं के बीच फंस गईं। उसने उसके होंठों को अपने होंठों से दबाया, उसकी कराह को निगलते हुए। "अब मैं तुम्हें फिर से चोदूंगा," उसने उसके मुँह में फुसफुसाया, "पूरी रात, जब तक हमारी ताकत ख़त्म नहीं हो जाती।"

सीमा ने आँखें खोलीं, उनमें एक नया भूखा जुनून था। उसने प्रेम के कंधों पर अपने नाखून गड़ा दिए। "तो फिर देर किस बात की है?" उसकी आवाज़ में एक चुनौती थी। प्रेम ने उसे पलटा और अपनी पीठ के बल लेट गया, सीमा को अपने ऊपर खींच लिया। "तुम ऊपर रहो, मैं तुम्हारे नीचे देखता हूँ," उसने कहा।

सीमा समझ गई। वह घुटनों के बल उसके पेट पर बैठ गई और हाथ से प्रेम के लंड को सीधा करके, उसे अपनी चूत के नीचे लायी। वह धीरे से नीचे बैठी, उसे अंदर लेते हुए एक लंबी, संतुष्ट कराह के साथ। प्रेम ने उसकी निचली हरकत पर नज़र गड़ा दी, उसकी चूत के फैले हुए होंठ अपने लंड को निगलते देख रहा था। सीमा ने गति पकड़नी शुरू की, धीरे-धीरे ऊपर उठकर और पूरी ताकत से नीचे बैठकर। उसके स्तन हवा में लहरा रहे थे, निप्पल कड़े होकर नाच रहे थे।

प्रेम का एक हाथ उसकी गांड पर गया और दूसरा उसके एक स्तन को दबाने लगा। उसने निप्पल को उंगलियों के बीच लेकर मरोड़ा। सीमा ने सिर पीछे झुकाया और तेजी से ऊपर-नीचे होने लगी, उसकी चूत से चिपचिपी आवाज़ें तेज हो गईं। "और तेज… हाँ… ऐसे ही," प्रेम हाँफता रहा। सीमा ने अपनी गति बढ़ा दी, उसके चूतड़ प्रेम की जाँघों से जोर से टकरा रहे थे, उसके शरीर पर पसीने की चमक दिख रही थी।

थोड़ी देर में वह थक गई और आगे झुककर प्रेम के सीने पर लेट गई, पर उसके नितंब अभी भी घूम रहे थे, गोल-गोल चक्कर काटते हुए। प्रेम ने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से धक्के मारने शुरू किए, ऊपर की ओर उठते हुए। यह नई स्थिति और गहरी थी। सीमा ने मुँह खोलकर प्रेम की गर्दन को चाटना शुरू किया, फिर हल्का सा काटा। "मुझे और चाहिए… पूरा… तुम्हारा सब कुछ," वह उसके कान में गुर्राई।

प्रेम ने उसे फिर से पलटा। अब वह उसके ऊपर था, उसकी बाँहें उसके सिर के दोनों ओर टिकी हुईं। उसने सीमा की टाँगें अपने कंधों पर डाल लीं, उसे और गहराई तक खोल दिया। "देखो, मैं कितना अंदर तक जा सकता हूँ," उसने कहा और एक लम्बे, धीमे धक्के के साथ अंदर गया, जब तक कि उसकी जाँघें सीमा के नितंबों से नहीं मिल गईं। सीमा की आँखें फैल गईं, उसका मुँह खुला रह गया एक गूँजती हुई कराह के लिए।

फिर उसने तेजी से चलाना शुरू किया, छोटे-छोटे, तेज धक्के जो सीमा के शरीर को चादर पर आगे-पीछे धकेल रहे थे। सीमा ने अपनी एड़ियाँ उसकी पीठ पर जकड़ लीं, उसे और अंदर खींचने की कोशिश में। उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ लगातार और तेज होती जा रही थी। प्रेम का सिर पीछे की ओर झुका, उसकी गर्दन की नसें तन गईं। "मैं नहीं रोक पाऊँगा जल्दी…" उसने हाँफते हुए कहा।

"मत रोको… मैं भी तैयार हूँ," सीमा चीखी और उसने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपनी चूत के ऊपर रगड़ना शुरू किया, जहाँ प्रेम का लंड अंदर-बाहेर हो रहा था। उसकी उंगलियाँ गीली और तेज थीं। प्रेम ने अपनी गति और तेज कर दी, अब पागलों की तरह धकेल रहा था, हर धक्के के साथ एक गहरी कराह निकल रही थी। सीमा का शरीर कठोर हो गया, उसकी चूत तेजी से सिकुड़ने लगी, गर्म लहरें उसके भीतर से उठ रही थीं।

"प्रेम… अब… अब!" सीमा चिल्लाई और उसका शरीर एक जोरदार ऐंठन में फँस गया। उसकी चीख कमरे में गूँज उठी। उसी क्षण प्रेम ने भी एक लम्बी, गर्जनापूर्ण कराह निकाली और उसने गहराई से धकेलना बंद कर दिया, अपना सारा तरल उसकी गर्म गहराइयों में उतार दिया। उसका शरीर सीमा पर भारी पड़ गया, दोनों हाँफ रहे थे, धड़कनें एक दूसरे से टकरा रही थीं।

कई मिनट तक वे वैसे ही पड़े रहे, केवल साँसों की आवाज़ और दूर मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई दे रही थी। प्रेम धीरे से बगल में लुढ़का और सीमा को अपनी बाँहों में समेट लिया। सीमा ने अपना सिर उसके सीने पर रखा, उसकी धड़कन सुनते हुए। चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही थी, उनके पसीने से तर शरीरों पर चमक रही थी। सीमा ने एक लम्बी सांस ली। "कल सुबह सब कुछ वैसा ही होगा," उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक उदासी छिपी थी।

प्रेम ने उसके बाल सहलाए। "पर यह रात हमेशा हमारे साथ रहेगी," उसने कहा। वे दोनों जानते थे कि यह गुपचुप संबंध खतरे से खाली नहीं है, पर इस पल की मिठास उन सभी डरों पर भारी पड़ रही थी। धीरे-धीरे, थकान और संतुष्टि के बोझ तले, उनकी आँखें मूँदने लगीं। बाहर सावन की हवा चल रही थी, और अंदर दो आत्माएँ एक दूसरे में समा गई थीं, एक ऐसा रहस्य जो शायद कभी दोहराया नहीं जाएगा, पर हमेशा उनकी यादों में जिंदा रहेगा।


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