पगडंडी पर भीगी चाहत






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🔥 गाँव की पगडंडी और चाची की चोरी छुपी चाहत

🎭 एक नवयुवक और उसकी रसीली विधवा चाची के बीच पगडंडी पर शुरू होती है वह फिसलन भरा खेल, जहाँ हर छूआँ एक सुलगता सवाल बन जाता है। दोपहर की ऊँघती गर्मी में चुपके से फैलती वासना की चिंगारी, पसीने से तर बदन और आँखों के खेल का वह अंजाम जो किसी को नहीं सूझा।

👤 अंकुर (20): गाँव का नटखट नवयुवक, मजबूत बदन, हरकतों में एक छिपी जिद्द। उसकी आँखें हमेशा चाची के भरें हुए स्तनों और उभरी कमर पर टिकी रहती हैं।

सुमन (38): विधवा, ख़ामोश चाहतों से भरी। उसके निप्पल हमेशा कपड़ों के भीतर खड़े रहते हैं, एक अधूरे स्पर्श की भूख लिए। उसकी गोल गांड और चुतड़ों का खिंचाव उसे पागल कर देता है।

📍 सेटिंग: एक सुनसान पगडंडी, जंगल के किनारे, दोपहर की चिलचिलाती धूप। हवा में मदहोश करती गर्मी और पत्तों की सरसराहट के सिवा कोई साक्षी नहीं।

🔥 कहानी शुरू: दोपहर की गर्मी ने गाँव को ऊँघने पर मजबूर कर दिया था। पगडंडी पर सुमन चाची अकेले चल रही थीं, पानी का मटका सिर पर। उनकी साड़ी का पल्लू पसीने से चिपक कर उनके स्तनों का उभार साफ़ दिखा रहा था। अंकुर पेड़ के पीछे से देख रहा था, उसका लंड अकड़न भरा हो उठा। वह आगे बढ़ा। "चाची, मटका भारी लग रहा है, उतारो ना?" उसकी आवाज़ में एक नटखट मिठास थी। सुमन ने पलट कर देखा, उनके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान खेल गई। "तेरी हिम्मत कैसे हुई बेटे, ऐसे बोलने की?" पर उनकी आँखें उसके मजबूत हाथों पर टिक गईं। अंकुर ने हिम्मत बटोरी। उसने मटका उतारने का बहाना बनाया और अपनी उँगलियाँ जानबूझकर उनकी गर्दन से फिसलती हुई पीठ तक ले गई। एक जानिबदार गर्माहट का झटका सुमन के बदन में दौड़ गया। "छोड़ो अंकुर," उनकी आवाज़ काँप गई, पर वह हटी नहीं। अंकुर ने पास आकर कान में फुसफुसाया, "चाची, तुम्हारे निप्पल तो कपड़े फाड़ देंगे आज।" सुमन की साँस थम सी गई। उन्होंने उसे धीरे से धक्का दिया, पर उनके हाथ उसकी छाती पर ही रुक गए, उसकी गर्मी महसूस करते हुए। "तू बहुत बदतमीज हो गया है," वह बुदबुदाईं, पर उनकी उँगलियाँ उसकी शर्ट के बटनों पर बेचैन हो उठीं। दूर से किसी के खाँसने की आवाज़ आई। दोनों एकदम अलग हुए। सुमन का दिल जोरों से धड़क रहा था। अंकुर ने मुस्कुराते हुए कहा, "कल इसी वक्त यहीं मिलेंगे। अकेले।" वह चला गया। सुमन ने अपने स्तनों पर हाथ रखा, जहाँ उनके निप्पल सख्त होकर बाहर निकलने को बेताब थे। पगडंडी अब एक गुप्त वादे की जगह बन गई थी।

अगले दिन की दोपहर आई तो सूरज की किरणें भी जैसे चुभती हुई नटखट थीं। सुमन चाची उसी पगडंडी पर खड़ी थीं, पर आज मटका नहीं था सिर पर। उनकी साड़ी का रंग गहरा नीला था, जो उनकी गोरी काया पर और भी रस भरा लग रहा था। अंकुर ने पेड़ के पीछे से देखा कि वह बेचैन होकर अपने पल्लू को समेट रही हैं, फिर ढीला कर रही हैं। वह धीरे से निकला और उनके पीछे जाकर, अचानक उनकी आँखों पर हाथ रख दिया। सुमन चौंकीं, पर एक क्षण में ही उसकी गर्म हथेली पहचान गईं। उनका शरीर ढीला पड़ गया।

"कितनी देर से देख रहा था तू?" अंकुर ने उनके कान के पास अपने होंठ टिकाए। उसकी सांस की गर्मी उनकी गर्दन पर फैली। "जब से तुम आई हो, चाची। तुम्हारी गर्दन पर पसीने की बूँदें देखकर ही मेरा लंड टनटना उठा।" सुमन ने मुड़ने की कोशिश की, पर उसने अपना दूसरा हाथ उनकी कमर पर कस लिया, उन्हें अपने सीने से चिपका दिया। उनकी पीठ उसके सीने से दब गई। "छोड़ो… कोई आ जाएगा," उनकी आवाज़ दबी हुई, लड़खड़ाई हुई थी।

"आज तो कोई नहीं आएगा," अंकुर ने कहा और अपना हाथ उनकी कमर से सरकाते हुए, उनके नाभि के पास ले गया। उसकी उँगली हल्के से घूमी। सुमन की साँवली त्वचा पर रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने अपना सिर पीछे उसके कंधे पर टिका दिया, एक अजीब सी कराह निकल गई। अंकुर ने इसका फायदा उठाया। उसने अपना मुँह उनकी गर्दन पर रखा और एक कोमल चुंबन दिया, फिर जीभ से हल्का सा लहराया। सुमन का पूरा बदन काँप उठा। "अरे… यह क्या…" वह बुदबुदाईं, पर उनके हाथ उलझकर उसके बालों में चले गए।

अंकुर का हाथ और ऊपर सरककर उनके स्तन के नीचे आ गया। उसने अपनी हथेली से उस भारी, गोल आकार को नीचे से थामा और हल्का सा दबाया। सुमन की साँस तेज हो गई। "तेरी चूची कितनी गर्म है चाची," उसने फुसफुसाते हुए कहा। उसने कपड़े के ऊपर से ही अँगूठे से निप्पल पर घुमावदार दबाव डाला। सुमन ने आँखें मूँद लीं और अपने कूल्हे पीछे की ओर, उसकी जाँघों के बीच धकेल दिए। अंकुर का कड़ा लंड उनकी गांड के बीच में आकर दब गया। दोनों एक साथ कराह उठे।

"ये… ये क्या कर रहा है?" सुमन ने आँखें खोलकर कहा, पर उनकी नजरें उसके होंठों पर टिकी रहीं। अंकुर ने मुस्कुराकर उनकी नाक का पसीना अपनी उँगली से पोंछा। "वही जो तुम चाहती हो।" इतना कहकर उसने अचानक उनका मुँह अपनी ओर घुमाया और उनके होंठों को चूस लिया। सुमन ने विरोध करने का नाटक किया, पर कुछ ही पलों में उनकी जीभ उसकी जीभ से लड़ने लगी। चूमने की आवाज़ हवा में गूँजने लगी। अंकुर का हाथ अब बिना रुके उनके स्तन को मसल रहा था, निप्पल को कपड़े के अंदर ही दबा-दबाकर खड़ा कर रहा था।

जब होंठ अलग हुए तो सुमन के होंठ लाल और सूजे हुए थे। "बस… बस कर," उन्होंने हाँफते हुए कहा, पर उनका एक हाथ उसकी पीठ पर नीचे सरककर उसके नितंबों को कसकर पकड़ चुका था। अंकुर ने उनकी साड़ी के पल्लू को हल्का सा खींचा, कंधा थोड़ा खुल गया। उसने अपना मुँह वहाँ लगाया और काँचुली के किनारे से दाँतों का हल्का सा कसाव दिया। सुमन की चीख निकल गई, पर आवाज गले में ही दबी रही। उनकी उँगलियाँ उसकी शर्ट में घुस गईं, उसके सीने के बालों को मरोड़ने लगीं।

"अंकुर… यहाँ नहीं… और अंदर चलो… जंगल में," सुमन ने एक टूटी हुई सी आवाज़ में कहा, उनकी आँखों में पानी और वासना का एक अनोखा मिश्रण था। अंकुर ने उनकी कलाई पकड़ी और उन्हें घने झाड़ियों की ओर खींच लिया। रास्ते में ही उसने एक हाथ से उनकी गांड को दबोच लिया, उनके मुलायम चुतड़ों को अपनी उँगलियों में कस लिया। सुमन की चाल लड़खड़ा गई, वह उससे टकराई और फिर उसने खुद ही उसके होंठों को फिर से ढूँढ लिया। जंगल की ओर जाते हुए, उनके कदमों की आहट के सिवा सुनने को कुछ नहीं था, सिवा उनकी भारी, गर्म साँसों के और कपड़ों के रगड़ खाने की आवाज़ के।

झाड़ियों के पीछे का छोटा सा साफ़ा धूप की किरणों से छनकर आ रहा था, जमीन नरम घास और सूखे पत्तों की थी। अंकुर ने सुमन को एक बड़े पेड़ के तने से सटाकर खड़ा कर दिया। उनके बीच अब कोई फासला नहीं था, उसका पूरा शरीर उस पर दबाव बनाए हुए था। "यहाँ कोई नहीं देखेगा," उसने उनके होंठों के पास मुँह लाकर कहा, उसकी नज़र उनकी बघराई हुई साँसों पर टिकी थी।

सुमन ने आँखें मूँद लीं, उनकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी। अंकुर ने अपना हाथ उनकी साड़ी के ब्लाउज के बटनों पर रखा। "इस बार कपड़े बीच में नहीं आएंगे, चाची," वह बुदबुदाया और एक-एक कर बटन खोलने लगा। हर बटन खुलने पर सुमन का शरीर एक झटका सा खाता, उनकी उँगलियाँ उसकी बाँहों को और मजबूती से पकड़ लेतीं। आखिरी बटन खुला तो काँचुली का गहरा नीला कपड़ा सामने आ गया, जो उनके भरे हुए स्तनों को कसकर थामे हुए था।

अंकुर ने झुककर अपने होंठों से उस कपड़े के ऊपर से ही एक निप्पल का घेरा महसूस किया। सुमन ने सिर पीछे की ओर पेड़ से टकराया और एक लंबी कराह निकल गई। "अरे राम… ये क्या…" उनके हाथ उसके सिर में उलझ गए, उसे और दबाकर अपनी छाती पर रोके रहे। अंकुर ने दाँतों से हल्का सा कसकर कपड़ा खींचा, गीला निप्पल कपड़े के पार ही उभर आया। उसकी जीभ ने गोलाई का चक्कर लगाया।

फिर उसने अपने हाथ से काँचुली का हुक खोल दिया। कपड़ा ढीला हुआ और भारी, गोल स्तन थोड़ा बाहर झुक आया। अंकुर ने तुरंत अपना मुँह वहाँ गड़ा दिया, निप्पल को अपने गर्म मुँह में ले लिया। सुमन चिल्लाने ही वाली थीं कि उसने अपना हाथ उनके मुँह पर रख लिया। "श्श्श… आवाज़ निकली तो पता चल जाएगा," उसने चूसते हुए कहा। सुमन की आँखों से आँसू बह निकले, एक अजीब सी राहत और उत्तेजना के मिश्रण से। उन्होंने उसके बालों को जकड़ लिया और अपनी कमर आगे की ओर धकेल दी, ताकि वह और गहराई से चूस सके।

दूसरे स्तन पर उसकी उँगलियाँ नाच रही थीं, निप्पल को दबा-मरोड़ रही थीं। सुमन का शरीर पसीने से तरबतर हो गया था, उनकी साड़ी का पल्लू बिल्कुल खिसक चुका था। अंकुर ने मुँह हटाया और गीले, सूजे निप्पल को देखकर एक गहरी साँस भरी। "कितना मीठा दूध है इसमें, चाची," उसने कहा और फिर से चूसने लगा, इस बार ज़ोर से।

उसका हाथ अब नीचे सरककर उनकी साड़ी के पेटिका पर पहुँचा। उसने कमर में बँधी गाँठ को टटोला। सुमन ने अचानक अपनी आँखें खोलीं और उसका हाथ पकड़ लिया। "नहीं… वहाँ मत," वह हाँफती हुई बोलीं, पर उनकी पकड़ में कोई दम नहीं था। "क्यों चाची? तुम्हारी चूत तो पुकार रही है मुझे," अंकुर ने कहा और उनकी हथेली चूम ली। उसने जबरदस्ती नहीं की, बस अपनी उँगली उनकी कमर और नाभि के नीचे के नर्म उभार पर घुमाने लगा।

सुमन ने फिर से आँखें मूँद लीं, उनके होठ काँप रहे थे। उन्होंने धीरे से अपना हाथ हटा लिया। यह अनुमति थी। अंकुर ने तुरंत पेटिका की गाँठ खोल दी। साड़ी ढीली हुई और उसने अपना हाथ अंदर घुसा दिया, उनकी गरम, चिकनी त्वचा पर, नाभि के नीचे उगे नर्म बालों के ऊपर से गुज़रता हुआ। सुमन ने उसके कंधे को दबोच लिया, उनके नाखून उसकी त्वचा में घुस गए।

"तुम… तुम्हारा लंड," सुमन ने टूटी सी आवाज़ में कहा, उनकी नज़र नीचे उसकी जाँघों के बीच अटकी हुई थी, जहाँ उसकी पैंट एक बड़े उभार से तनी हुई थी। अंकुर ने अपनी उँगली उनके अंदरूनी जाँघ पर चलाई, ऊपर से नीचे की ओर, बार-बार। "तुम्हारी गांड के बीच में लगा था ना? वो तैयार है तुम्हारी चूत के लिए," उसने कहा और अपना कमरा उनकी जाँघ से रगड़ा।

सुमन की साँस रुक सी गई जब उसकी उँगलियों ने अंततः उनकी योनि के ऊपर के मुलायम बालों को छुआ। वह गीली और गर्म थी। अंकुर ने अपनी उँगली का पोर वहाँ दबाया और घुमाया। सुमन का सिर पीछे को झटका और एक दमी हुई चीख उनके गले से निकली। "अंकुर… बेटा… ऐसे मत," वह रोने-रोने सी बोलीं, लेकिन उनकी कमर ने खुद-ब-खुद उसकी उँगली की ओर धक्का दिया।

"बस एक उँगली अंदर, चाची," उसने लालच भरी आवाज़ में कहा और अपनी मध्यमा उँगली को उनके संकरे रास्ते के द्वार पर टिका दिया। वहाँ का गर्म तरल पदार्थ उसकी उँगली को चिकनाई दे रहा था। सुमन ने अपनी जाँघें थोड़ी खोल दीं, एक साफ़ इजाज़त। अंकुर ने धीरे से दबाव डाला। उँगली का ऊपरी हिस्सा अंदर घुस गया। सुमन की आँखें फटी की फटी रह गईं, उनका मुँह खुला रह गया, एक लंबी, दबी हुई कराह के साथ। अंदर की गर्मी और तंगी ने अंकुर के लंड को और सख्त कर दिया। उसने उँगली धीरे-धीरे चलानी शुरू की, बाहर-अंदर।

अंकुर की उँगली के हर अंदर-बाहर के साथ सुमन का शरीर एक नई कराह छोड़ देता। उनकी आँखें अब बंद थीं, पलकों के कोनों से आँसू की लकीरें पसीने में मिल रही थीं। "और… और अंदर," वह फुसफुसाईं, उनकी उँगलियाँ उसकी बाँहों को खरोंचती हुई नीचे सरक गईं। अंकुर ने एक और उँगली जोड़ दी, दोनों को धीरे से अंदर घुसाते हुए। सुमन की साँस एकदम रुक गई, फिर एक तीखी हिचकी के साथ छूटी। उनकी चूत की तंग गर्मी उसकी उँगलियों को चूस रही थी।

उसने अपना मुँह फिर से उनके स्तन पर गिराया, दूसरे निप्पल को दाँतों से हल्का काटते हुए चूसने लगा। सुमन ने अपनी एड़ियाँ जमीन में गड़ा दीं और कमर को उसकी उँगलियों की रफ्तार के साथ हिलाना शुरू कर दिया। "तेरी चूत कितनी चिकनी है चाची… गीली हो रही है मेरी उँगलियाँ," अंकुर ने उनके कान में गरमाहट भरी आवाज़ में कहा। उसकी उँगलियों की गति तेज हुई, अब पूरी तरह अंदर-बाहर हो रही थीं, एक गीली, चिपचिपी आवाज़ के साथ।

सुमन का एक हाथ अचानक नीचे गया और उसने अंकुर की पैंट की जिप पर अपनी उँगलियाँ लपेट दीं। "इसको… बाहर निकालो," उनकी आवाज़ लगभग गुहार थी। अंकुर ने मुस्कुराते हुए अपनी उँगलियाँ बाहर खींच लीं, जिस पर सुमन का पूरा बदन एक सिहरन से भर गया। उसने अपनी पैंट खोल दी और अपना कड़ा लंड बाहर निकाला। सुमन की नज़रें उस पर चिपक गईं, उनके होंठ हिले, मानो कोई प्रार्थना कर रही हों।

अंकुर ने उन्हें धीरे से घास पर लिटा दिया, उनकी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह खोल दिया। उनकी नंगी कमर, नाभि और जाँघों का ऊपरी हिस्सा धूप में चमक रहा था। वह उनके बीच में घुस गया, अपने घुटनों पर बैठकर। "देखो तो कैसे पुकार रही है तुम्हारी चूत," उसने कहा और अपने लंड का सिरा उनकी योनि के नम द्वार पर टिका दिया, ऊपर-नीचे रगड़ने लगा। सुमन ने अपनी जाँघें और खोल दीं, उनके पैर उसकी पीठ पर लिपट गए।

"अंदर… पूरा अंदर डालो बेटा," सुमन ने गर्दन पीछे की ओर मोड़ते हुए कहा, उनकी आवाज़ में एक तड़प थी। अंकुर ने कमर आगे की ओर दबाई। लंड का मोटा सिरा धीरे से अंदर घुसा, तंग रास्ते में फैलाव लाता हुआ। सुमन की आँखें फिर से फट गईं, उनका मुँह एक गूँगी चीख के लिए खुला रह गया। उसने रुका, उन्हें अभ्यस्त होने दिया। "कितनी तंग है चाची… किसी ने छुआ भी नहीं है क्या?" उसने कहा और फिर धीरे-धीरे, पूरा लंड अंदर धकेल दिया।

सुमन के होंठों से एक लंबी, दबी हुई कराह निकली। उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं और अपने होंठों को दाँतों से दबा लिया। अंकुर ने पूरी तरह अंदर जाने के बाद एक क्षण रुका, फिर धीरे-धीरे बाहर खींचा और फिर अंदर दबाया। हर धक्के के साथ सुमन का शरीर घास पर खिसकता, उनके स्तन हवा में हिलते। उसकी गति धीरे-धीरे तेज और गहरी होने लगी।

उसने आगे झुककर उनके होंठों को चूमा, उनकी कराहों को अपने मुँह में ले लिया। सुमन के हाथ उसकी पीठ पर दौड़ने लगे, उसे और गहराई से धकेलने के लिए उकसाते हुए। "ज़ोर से… और ज़ोर से," वह उसके होंठों के बीच ही फुसफुसाईं। अंकुर ने उनकी गांड को अपने हाथों से पकड़ा और जमकर धक्का देना शुरू किया। उनके शरीरों के टकराने की आवाज़, घास की सरसराहट और गहरी, गीली साँसों से जंगल की हवा गर्म हो रही थी।

सुमन की आँखों में एक अजीब चमक आ गई, वह उसकी हर गति के साथ तालमेल बिठाती हुई अपनी कमर को उठाने लगीं। उनकी निगाहें उसके चेहरे पर गड़ी थीं, जो अब तनाव और आनंद से तर था। "मैं… मैं जल्दी ही…" सुमन ने हाँफते हुए कहा, उनकी उँगलियाँ उसकी पीठ में और गहरे घुस गईं। अंकुर ने अपनी गति और तेज़ कर दी, उसका लंड उनकी गहराई में जाकर एक नर्म, गर्म जगह को छू रहा था। सुमन का सिर घास पर इधर-उधर हिलने लगा, उनके बाल बिखर गए। अचानक उनका शरीर तन गया, एक लंबा, कंपकंपाता हुआ झटका उनमें से गुज़रा। उनकी चूत सिकुड़ी और अंकुर के लंड को कसकर जकड़ लिया। उनकी कराह जंगल में गूँज उठी, बिना किसी रोक-टोक के।

अंकुर ने सुमन के शरीर के कंपकंपाते झटकों को महसूस किया और अपनी गति रोक दी, उसे पूरी तरह बाहर निकालने के बजाय अंदर ही डेरा डाले रखा। उसने उनकी गर्दन पर पसीने की बूंदों को अपनी जीभ से चाटा। "चाची… तुम तो बिल्कुल फट गई," वह फुसफुसाया, उसकी उँगलियाँ उनके पसीने से तर पेट पर नाचने लगीं।

सुमन की साँसें अब भी तेज थीं, उन्होंने आँखें खोलीं और उसकी ओर देखा, एक धुंधली, तृप्त मुस्कान उनके होंठों पर थी। "तेरा… तेरा काम अभी बाकी है ना?" उन्होंने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा और अपनी एक जाँघ उसकी कमर पर और ऊपर खिसकाई। यह इशारा था।

अंकुर ने फिर से हिलना शुरू किया, लेकिन अब धीरे-धीरे, गहरे धक्के। उसने सुमन के कान का लोलक अपने दाँतों से पकड़ा और हल्का सा खींचा। "मेरा लंड तुम्हारी गर्म चूत में घुल जाना चाहता है," उसने कहा। सुमन ने अपनी एड़ियों से उसकी पीठ को अपनी ओर खींचा, हर धक्के को और गहरा करते हुए। अब उनकी चूत पहले से ज्यादा गीली और आत्मीय लग रही थी, हर आवाज़ चपचपाहट भरी थी।

थोड़ी देर बाद अंकुर का शरीर तन गया। उसने अपना सिर पीछे खींचा और एक गहरी, दबी हुई कराह निकाली। "चाची… निकलने वाला है…" उसने हाँफते हुए कहा। सुमन ने तुरंत अपनी उँगलियाँ उसके नितंबों पर जमा दीं और उसे और जोर से अपने अंदर धकेल दिया। "अंदर ही निकालो… पूरा," उनकी आवाज़ में एक अजीब सा आदेश था, जो वासना से कंप रहा था।

अंकुर ने एक लंबा, कसकर भरा हुआ धक्का दिया और जमकर स्थिर हो गया। उसका लंड सुमन की गहराई में फड़क रहा था, गर्म तरल उसकी चूत की दीवारों पर भर रहा था। सुमन ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए, एक और हल्का झुरमुट उनके अपने शरीर में दौड़ गया जब उसने खाली होने की अनुभूति की।

कुछ पलों तक दोनों स्थिर पड़े रहे, केवल उनकी साँसों की आवाज़ और दिल की धड़कनें हवा में मिल रही थीं। फिर अंकुर धीरे से उनके ऊपर से हटा और उनके बगल में घास पर लेट गया। उसका लंड अब नरम होकर बाहर निकला हुआ था, चिपचिपा। सुमन ने बिना आँखें खोले, अपना हाथ बढ़ाया और उसे हल्के से थाम लिया, उस पर बची हुई नमी को अपनी उँगलियों से फैलाते हुए।

"कितना गर्म था तू," वह बुदबुदाईं। अंकुर ने उनके स्तन पर हाथ रखा, निप्पल को, जो अब भी सख्त था, अपने अंगूठे से दबोचा। "तुम्हारी चूची अभी भी मेरा नाम पुकार रही है।" उसने कहा और झुककर उसे फिर से चूसना शुरू कर दिया, इस बार बहुत कोमलता से।

सुमन ने एक लंबी साँस ली और उसके बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं। "अब उठना चाहिए… कोई आ सकता है," उन्होंने कहा, लेकिन उनका शरीर हिलने को तैयार नहीं था। अंकुर का हाथ फिर से नीचे सरक गया, उनकी जाँघ के भीतरी हिस्से पर, जहाँ उनकी योनि से अभी भी गर्म तरल रिस रहा था। उसने अपनी उँगली वहाँ घुमाई और फिर चाटने के लिए मुँह के पास ले गया।

"मत…" सुमन ने कहा, लेकिन उसने उनकी उँगली चूस ली, उनकी अपनी ही खुशबू और स्वाद का आनंद लेते हुए। यह देखकर सुमन की आँखों में फिर से वही चिंगारी दौड़ गई। उन्होंने उठकर बैठने की कोशिश की, पर अंकुर ने उन्हें दबोच लिया। "एक बार और," उसने कहा, उसकी नजर उनके चेहरे पर गड़ी थी।

"पागल हो गया है तू," सुमन ने कहा, लेकिन उन्होंने उसके कंधों पर हाथ रखकर खुद को ऊपर खींचा और उसके होंठों को चूम लिया। यह चुंबन लंबा और आत्मीय था, जिसमें पसीने और वासना का स्वाद मिला हुआ था। अंकुर का हाथ उनकी गांड के निचले हिस्से पर चला गया, उनके चुतड़ों के बीच के संकरे रास्ते पर उँगली फेरने लगा। सुमन ने कराह भरी और उसकी जीभ को और अंदर ले लिया।

वह धीरे से उन्हें घुमाया, ताकि वह घुटनों के बल आ जाएं और पेड़ के तने की ओर मुंह करके झुक जाएं। उनकी गोल गांड हवा में उभरी हुई थी, अभी भी लालिमा लिए हुए। अंकुर ने अपने घुटनों पर बैठकर उनके चुतड़ों को अपने हाथों से फैलाया और उनकी योनि के भीगे हुए, थोड़े फैले हुए द्वार को देखा। उसने अपना लंड, जो अब फिर से अकड़न भरने लगा था, उनकी गांड के दरार में रगड़ा।

"इधर भी तो डाल सकता हूँ," उसने उनके कान में कहा। सुमन ने सिर हिलाया, "नहीं… वहाँ नहीं… फिर से वहीं… अंदर।" अंकुर ने मुस्कुराकर अपने लंड का सिरा उनकी चूत के द्वार पर फिर से टिका दिया, जो अभी भी गीली थी। उसने बिना किसी रुकावट के आसानी से प्रवेश कर लिया। सुमन ने पेड़ की छाल को मजबूती से पकड़ लिया और एक गहरी साँस छोड़ी जब वह फिर से पूरी तरह अंदर भर गया।

इस बार उसकी गति एक स्थिर, थपथपाती लय में थी। उसने आगे झुककर उनकी पीठ पर पसीने की लकीरें चाटीं, उनके कंधे और गर्दन के जोड़ को चूमा। सुमन की कराहें अब दबी हुई नहीं थीं, बल्कि एक टूटी-फूटी लय में निकल रही थीं। "हाँ… ऐसे ही… बेटा," वह बुदबुदाती रहीं, उनकी उँगलियाँ छाल में खुदने लगीं। अंकुर का एक हाथ आगे बढ़कर उनके स्तन को मसलने लगा, दूसरा उनकी गांड को नियंत्रित करते हुए हर धक्के के साथ उन्हें अपनी ओर खींचता। जंगल की हवा में उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ फिर से गूँजने लगी, धीमी लेकिन लगातार।

अंकुर की गति अब एक लयबद्ध थपथपाहट में बदल गई, हर धक्के पर सुमन की गांड उसके पेट से टकराती, एक चपचपाहट भरी आवाज़ हवा में घुल रही थी। उसने अपना मुँह सुमन के कान के पास लगाया और दाँतों से उनके कान का माँस हल्का सा कसकर पकड़ लिया। "चाची… तुम्हारी चूत तो अब मेरी आवाज़ पहचानने लगी है," वह हाँफता हुआ बोला, उसकी साँसें उनकी गर्दन पर गर्म बौछार छोड़ रही थीं।

सुमन ने पेड़ की छाल को और मजबूती से पकड़ा, उनके नाखून लकड़ी में धंस गए। "चुप कर… बस करते जा," उनकी आवाज़ एक टूटी हुई लय में निकल रही थी, पर उनकी कमर उसकी हर थपकी के साथ एक नई मुद्रा में झुक रही थी। अंकुर का हाथ उनके स्तन से सरककर उनकी नाभि पर आ गया, उंगलियों ने गोल-गोल घुमावदार चक्कर काटे, फिर नीचे उनके जघन के बालों में खो गया। उसने अपनी मध्यमा उंगली उनकी योनि के ऊपर वाले संवेदनशील मांस पर रखी, जहाँ लंड अंदर-बाहर हो रहा था, और हल्के से दबाने लगा।

सुमन का शरीर एकदम अकड़ गया, एक तीखी, दबी हुई चीख उनके गले से फूटी। "अरे! वहाँ… वहाँ मत," वह कराह उठीं, लेकिन उनकी जाँघें और चौड़ी हो गईं, उसके हाथ को और जगह दे दी। अंकुर ने उस नन्हें, सख्त उभार को रगड़ना जारी रखा, अपने लंड के हर धक्के के साथ तालमेल बिठाते हुए। "ये तो तुम्हारी चूत का मुँह है ना? ये भी तरस रहा है मेरी उँगली के लिए," उसने कहा और अपनी उँगली का पोर उसी जगह घुमाया।

सुमन की साँसें अब लड़खड़ा रही थीं, उनकी आँखें भरी हुई और धुंधली सी थीं। उन्होंने पलटने की कोशिश की, पर अंकुर ने उनकी कमर को दबोच कर रोक दिया। "नहीं… ऐसे ही… पीठ ही देखनी है मुझे तुम्हारी," उसने गुर्राते हुए कहा और एक ज़ोरदार, गहरा धक्का दिया। सुमन का मुँह खुला रह गया, आवाज़ गले में ही फंस गई। उनकी उँगलियों ने छाल को छील डाला था।

अंकुर ने अपनी गति थोड़ी धीमी की, लेकिन हर धक्का अब पूरी तरह बाहर निकलने और पूरी तरह अंदर घुस जाने वाला था। वह झुका और अपनी जीभ से सुमन की पीठ की रीढ़ की हड्डी पर बहते पसीने को चाटने लगा, ऊपर से नीचे की ओर, उनके नितंबों के बीच तक जाते हुए। सुमन काँप उठी। "बस… बहुत हुआ… मैं टूट जाऊँगी," उन्होंने गिड़गिड़ाती आवाज़ में कहा।

"अभी नहीं," अंकुर ने कहा और अचानक उन्हें घुमा दिया, उनकी पीठ पेड़ से टिका दी। उनका चेहरा अब सामने था, आँखों में आँसू और होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान। उसने उनके पैरों को उठाकर अपने कंधों पर डाल लिया, उनकी चूत पूरी तरह खुल गई। उसने प्रवेश किया, इस बार और भी गहरा। सुमन की चीख जंगल में गूँज गई, उन्होंने अपनी बाँहें उसकी गर्दन के चारों ओर लपेट लीं।

"देखो मुझे… जब मैं तुम्हारे अंदर जा रहा हूँ," अंकुर ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, उसकी गति अब एक अनियंत्रित, भूखी लय में थी। सुमन ने उसके होंठों को चूसा, उनकी जीभें फिर से लड़ने लगीं। उनकी उँगलियाँ उसके पसीने से तर बालों में चलने लगीं, कभी कोमलता से, कभी ज़ोर से खींचते हुए। अंकुर का हाथ उनके एक पैर को कंधे से नीचे लाया और उनकी जाँघ के पिछले हिस्से को कसकर पकड़ लिया, उन्हें और गहराई तक खींचते हुए।

सुमन की कराहें अब लगातार थीं, एक टूटी हुई प्रार्थना की तरह। "हाँ… हाँ… ऐसे ही… मेरे अंदर… पूरा," वह बुदबुदाती रहीं, उनकी एड़ियाँ उसकी पीठ को खरोंच रही थीं। अंकुर ने महसूस किया कि उसका लंड फिर से फड़कने लगा है, गर्मी एकत्र हो रही है। "मैं… चाची… मैं निकलने वाला हूँ," उसने हाँफते हुए कहा।

"अंदर," सुमन ने आदेश दिया, उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, उन्होंने उसकी गर्दन को जकड़ लिया और अपने होठ उसके कान पर रख दिए। "सारा… मेरे अंदर ही निकाल दो… मैं चाहती हूँ।" यह सुनकर अंकुर का आत्म-नियंत्रण टूट गया। उसने कुछ तेज़, अनियंत्रित धक्के दिए, अपना चेहरा उनकी छाती में दबा लिया और एक गहरी गुर्राहट के साथ स्थिर हो गया। उसका शरीर काँप उठा जब गर्म तरल की लहरें सुमन की गहराई में भर गईं।

सुमन ने एक लंबी, कंपकंपाती साँस भरी, उनकी आँखें बंद हो गईं। उनकी चूत ने उसके लंड को कसकर जकड़ लिया, मानो हर बूंद को निचोड़ रही हो। वह धीरे-धीरे ढीली पड़ी, उनकी बाँहें उसकी पीठ से सरककर नीचे गिर गईं। दोनों स्थिर पड़े रहे, केवल उनके दिल की धड़कनें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।

कुछ देर तक दोनों सिलसिलेवार ढंग से साँस लेते रहे, उनके शरीर चिपके हुए, गर्म तरल अब भी सुमन की जाँघों पर बह रहा था। अंकुर ने धीरे से अपना लंड बाहर खींचा, एक फिसलन भरी आवाज़ के साथ। सुमन ने एक ठंडी साँस भरी और अपनी आँखें खोल दीं, जंगल की छनकी धूप में चमकती पत्तियों को निहारते हुए। उसने अपना हाथ उठाया और अंकुर के गाल पर पसीना पोंछ दिया। "अब तू मेरा हो गया, बेटा," वह फुसफुसाईं, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी कोमलता और अधिकार दोनों थे।

अंकुर ने उनकी उँगली चूम ली और फिर अपना सिर उनके स्तनों के बीच दबा लिया, जैसे शरण माँग रहा हो। "तुमने तो मुझे पिघला दिया, चाची।" सुमन ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए, धीरे से उसे ऊपर खींचा और उसके होंठों पर एक लंबा, आत्मीय चुंबन दिया। यह चुंबन अब वासना से भरा नहीं, बल्कि एक गहरी, थकी हुई तृप्ति से सराबोर था।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे उठने की कोशिश की। शरीर टूटा हुआ महसूस हो रहा था। अंकुर ने उनका हाथ पकड़कर सहारा दिया। सुमन ने अपनी साड़ी को समेटना शुरू किया, कपड़े अभी भी गीले और चिपचिपे थे। उसने देखा कि उनकी काँचुली अभी भी खुली पड़ी है, निप्पल लाल और सूजे हुए। अंकुर ने उनकी ओर लालच भरी नज़र से देखा तो सुमन ने हल्के से उसका हाथ ठोकर मारी। "बस, अब नहीं। सँभालो अपने कपड़े।"

अंकुर ने अपनी पैंट ऊपर खींची और जिप लगाई। वह अभी भी नंगे कमर था। सुमन ने अपना ब्लाउज बटन लगाने की कोशिश की, पर उँगलियाँ काँप रही थीं। अंकुर ने आगे बढ़कर उनकी मदद की, एक-एक बटन लगाते हुए। हर बटन लगने पर उसकी उँगलियाँ जानबूझकर उनकी त्वचा को छू जातीं। सुमन ने आँखें मूँद लीं और उसकी भौंह पर एक पसीने का कण पोंछ दिया। "तू तो सचमुच का शैतान निकला।"

"और तुम मेरी राक्षसी," अंकुर ने कहा और उनकी नाक चुटकी में भींच ली। दोनों हल्के से मुस्कुराए। अचानक दूर से किसी के गाने की आवाज़ आई। दोनों एकदम चौंककर सतर्क हो गए। सुमन ने जल्दी से पल्लू संभाला और अंकुर ने पेड़ के पीछे से झाँका। एक बूढ़ा ग्वाला अपनी गायों को हाँकता हुआ दूर जा रहा था, बेसुरे स्वर में गा रहा था।

"चलो, यहाँ से निकलते हैं," सुमन ने कहा, उनकी आवाज़ में फिर से वही डर लौट आया था। अंकुर ने उनका हाथ पकड़ लिया और दोनों झाड़ियों के बीच से निकलकर दूसरी ओर की पगडंडी पर आ गए। उनके कदम तेज थे, पर चेहरे पर एक अदृश्य गर्व और शर्म का मिश्रण था। कुछ दूर चलने के बाद सुमन ने रुककर अंकुर की ओर देखा। "आज जो हुआ… वो बस यहीं तक है। गाँव में किसी को कानोकान भनक नहीं लगनी चाहिए।"

"तुम मुझे मना नहीं सकती, चाची। कल फिर मिलेंगे," अंकुर ने दृढ़ता से कहा, उसकी नज़र उनके होंठों पर गड़ी थी। सुमन ने सिर हिलाया, "नहीं। ऐसा दोबारा नहीं हो सकता। ये गलत है।" पर उनकी आँखों में वही चमक थी जो झूठ बोल रही थी।

अंकुर ने पास आकर उनकी कमर पर हाथ रखा। "तुम्हारी चूत अभी भी मेरे लिए काँप रही है। तुम मना नहीं कर सकती।" सुमन ने उसका हाथ हटा दिया, लेकिन उनके होठ काँप उठे। "जा, अभी निकल जा। शाम ढलने वाली है।" अंकुर ने एक आखिरी बार उनकी ओर देखा, फिर मुड़कर तेज कदमों से पगडंडी पर चल पड़ा। सुमन कुछ पल वहीं खड़ी रहीं, उसकी पीठ को दूर जाते हुए देखती रहीं। हवा का एक झोंका आया और उनकी साड़ी के पल्लू ने उनके गीले, संवेदनशील निप्पल को छू लिया। एक सिहरन उनकी रीढ़ में दौड़ गई। उन्होंने अपने होठ दबाए और धीरे-धीरे गाँव की ओर चल पड़ीं, हर कदम पर उनकी चूत से रिसते गर्म तरल का एहसास उन्हें याद दिला रहा था कि क्या हुआ था। गाँव की ओर बढ़ते हुए, उनके मन में एक नया संकल्प और एक नया भय दोनों एक साथ जन्म ले रहे थे। पगडंडी अब सिर्फ रास्ता नहीं, उनके शरीर पर एक गुप्त निशान बन चुकी थी।


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