🔥 चाचा की चुलबुली चाची और भतीजे का भड़कता बुखार
🎭 गर्मियों की छुट्टियाँ, भतीजा पहुँचा चाची के घर। विधवा चाची का अकेलापन और जवान भतीजे की उत्सुकता… धीरे-धीरे ज्वाला बनती जा रही थी। नज़रें चुराने का खेल, छूने के बहाने, और वह डर… कि कोई देख न ले।
👤 मीरा (चाची): उम्र ३५, देह भरी हुई, कमर पतली, चूचियाँ भारी और उभरी हुई। रातों को अकेले तकिए से लिपट कर सोती, शरीर की गर्माहट तरसती। 📍 सेटिंग: पुराना पक्का मकान, आम के पेड़ की छाया, दोपहर की ऊँघती गर्मी। पंखा धीमा चल रहा था। भतीजा राहुल आया तो चाची की आँखों में एक चमक दौड़ गई।
कहानी शुरू: राहुल ने सामान रखा। मीरा चाची ने पानी का गिलास भरकर दिया। उनकी उँगलियाँ छू गईं। एक क्षण का स्पर्श… दोनों ने आँखें चुरा लीं। "इतनी गर्मी में आ गए?" मीरा ने पूछा, अपनी साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए। साड़ी का कपड़ा उनके स्तनों पर चिपक गया था। राहुल की नज़र वहीं अटक गई। "हाँ… चाचा जी ने कहा था चाची अकेली हैं, company दूँ।"
मीरा मुस्कुराई। उनके होंठों पर एक नटखट स्माइल थी। "तो अब तू मेरा company बनेगा?" उन्होंने tease किया। राहुल हँसा। दोपहर के खाने में मीरा ने हाथ से बनी रोटियाँ बनाईं। राहुल किचन के दरवाजे पर खड़ा देखता रहा। चाची की कमर घूमती, चूतड़ों का खिंचाव, ब्लाउज के बटनों के बीच से झलकती गर्माहट। उसका लंड अकड़ने लगा। मीरा ने पीछे मुड़कर देखा। "क्या देख रहा है? आ… आकर सब्ज़ी चला दे।"
राहुल पास गया। मीरा ने कड़ाही का हत्था उसके हाथ में दिया। उनके हाथ फिर छू गए। इस बार मीरा ने हटाया नहीं। राहुल की साँसें तेज हो गईं। मीरा की गर्दन पर पसीने की बूंदें थीं। राहुल ने अनजाने में उसे प
उसकी गर्दन पर हाथ फेरने का बहाना करते हुए, राहुल का अँगूठा गीली त्वचा पर फिसल गया। मीरा चाची ने एक तीखी साँस भरी, "अरे… पसीना लग गया है न?" उनकी आवाज़ दबी हुई थी, गर्म। राहुल का हाथ वहीं ठहर गया, अँगूठा उनके कोलरबोन के नीचे घूम रहा था। "हाँ… गर्मी बहुत है," वह बुदबुदाया, उसकी नज़र मीरा के ब्लाउज के खुले बटनों पर टिकी थी जहाँ से गहरी खाई झलक रही थी।
मीरा ने कड़ाही चलाना जारी रखा, पर उनके हाथों में कँपकँपी थी। "तू… तू बैठ जा, मैं बना लेती हूँ," उन्होंने कहा, पर शरीर पीछे हटाने की कोई कोशिश नहीं की। राहुल ने हौले से अपना सीना उनकी पीठ से टिका दिया। मीरा के शरीर में एक झटका दौड़ गया। "राहुल…" नाम उनके होंठों पर एक कराहन बन गया। राहुल ने अपनी नाक उनकी गर्दन के पीछे घुमाई, गीले बालों की खुशबू ली। "चाची… तुम्हारे बालों से नारियल तेल की महक आ रही है," उसने कहा, उसके होंठ हल्के से उनके कान के पास रगड़ गए।
मीरा ने चूल्हा बंद किया। उनके हाथ काँप रहे थे। "ये… ये ठीक नहीं है," वह फुसफुसाईं, पर उनकी कमर पीछे धकेलती हुई उसके अकड़े लंड से दब गई। राहुल ने अपने हाथों से उनकी पतली कमर को पकड़ लिया, अँगुलियाँ साड़ी के अंदर घुसकर नाभि के पास मंडराने लगीं। "क्या ठीक नहीं है, चाची?" उसने उनके कान में गर्म साँस छोड़ी। मीरा की आँखें मूँद गईं। उन्होंने अपना सिर पीछे उसके कंधे पर टिका दिया, गर्दन का कोमल हिस्सा पूरी तरह उजागर हो गया।
राहुल के होंठों ने उस कोमल त्वचा को छुआ, पहले हल्का, फिर दबाव के साथ। मीरा के मुँह से एक लंबी कराह निकली। "अरे राम… कोई आ जाएगा," उन्होंने कहा, पर उनका एक हाथ पीछे बढ़कर राहुल की जाँघ पर आ गया। राहुल ने धीरे से उनकी साड़ी का पल्लू खिसकाया, कमर का नंगा हिस्सा दिखने लगा। उसकी उँगलियाँ नाभि के चारों ओर चक्कर काटने लगीं, फिर नीचे पेट की कोमल त्वचा पर उतर गईं। मीरा का पेट तनाव से सिकुड़ गया।
"दरवाजा… दरवाजा बंद है न?" मीरा ने आँखें बंद करके पूछा। राहुल ने हाँ में सिर हिलाया, होंठ अब उनके कंधे पर थे, कपड़ा खिसकाकर त्वचा चूम रहे थे। उसका एक हाथ आगे बढ़ा और भारी चूची को ढूँढ़ लिया, ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से निप्पल को अँगुलियों के बीच दबोच लिया। मीरा चीखने लगी, "अह्ह्ह… नहीं… ऐसे नहीं," पर उनकी चूची कड़ी होकर बाहर निकल आई थी, कपड़े के अंदर से साफ उभार दिख रहा था।
राहुल ने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक… दो… तीसरा बटन खुलते ही चूची का गोल आकार बाहर झाँकने लगा। मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया, "रुको… हम… हम बैठक में चलते हैं।" उनकी आवाज़ में डर और वासना का मिला-जुला स्वर था। राहुल ने उन्हें मुड़कर देखा, आँखों में ज्वाला थी। "यहीं," वह बोला, "यहीं, चाची।" उसने उन्हें किचन के स्लैब की ओर धीरे से धकेला। मीरा की पीठ ठंडे पत्थर से टकराई। सामने राहुल का तपता हुआ शरीर था। उन्होंने अपनी उँगलियों से उसके शर्ट के बटन खोले, हथेली उसके चौड़े सीने पर फेरने लगीं। "तू… तू बहुत बड़ा हो गया है," वह फुसफुसाईं, उनकी नज़र उसके नीचे उभार पर टिक गई।
राहुल ने अंततः ब्लाउज खोल दिया। भारी, गोल चूचियाँ बाहर आ गईं, गहरे भूरे निप्पल सख्त होकर खड़े थे। मीरा ने शर्म से आँखें झुका लीं, पर राहुल ने उनकी ठोड़ी पकड़कर सिर उठाया। "देखो मुझे," उसने आदेश दिया। फिर उसने सिर झुकाकर एक चूची को मुँह में ले लिया। मीरा चिल्लाई, उनके हाथ उसके बालों में घुस गए, उसे और दबाकर अपनी ओर खींचने लगे। राहुल जीभ से निप्पल को नचाने लगा, दाँतों से हल्का काटता हुआ। मीरा की साँसें फूलने लगीं, उनकी जाँघें रगड़ खाने लगीं। "और… और जोर से," वह कराह उठीं। दोपहर की ऊँघती गर्मी में दो शरीरों की आग और भड़क उठी थी।
राहुल ने दूसरी चूची को भी मुँह में ले लिया, जीभ से निप्पल को घुमाते हुए। मीरा का सिर पीछे की ओर झटका खा गया, उनकी गर्दन की नसें तन गईं। "तेरा… तेरा मुँह बहुत गर्म है," वह हांफती हुई बोलीं, उनकी उँगलियाँ उसके घने बालों में और गहरे धँस गईं। राहुल ने एक हाथ से उनकी साड़ी की चुन्नट खोलनी शुरू की, कमर के नीचे से कपड़ा ढीला करते हुए। मीरा की जाँघों के बीच की गर्माहट उसकी उँगलियों तक पहुँचने लगी।
"चाची… तुम तो पानी की तरह गीली हो रही हो," उसने उनकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर हथेली फेरते हुए कहा। मीरा ने शर्म से अपनी आँखें बंद कर लीं, पर उनके कूल्हे उसके स्पर्श की ओर खुद-ब-खुद बढ़े। राहुल ने साड़ी का अंतिम फाल्ड खोल दिया, और पेट के नीचे का कोमल, रेशमी माँस दिखाई दिया। उसकी उँगलियाँ पेट की लकीरों पर नाचती हुईं नाभि में घुस गईं, फिर और नीचे उस जगह की ओर बढ़ीं जहाँ से मीरा की गर्म साँसें फूट रही थीं।
"रुक… रुक जा," मीरा ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया, उनकी आँखों में एकदम से चिंता तैर गई। "पड़ोस में… कलरवती चाची आ सकती हैं।" राहुल ने उनकी ठुड्डी को पकड़कर चूमा। "दरवाजा बंद है। पंखा चल रहा है, कोई आवाज़ नहीं सुनाई देगी।" उसने अपना दूसरा हाथ उनकी गांड पर रखा, चूतड़ों के भरे हुए गोलों को कसकर दबोच लिया। मीरा की कराह फिर से निकल पड़ी। उन्होंने अपनी जाँघें थोड़ी और खोल दीं, एक साथिक निमंत्रण।
राहुल ने धीरे से उन्हें किचन के स्लैब पर बैठा दिया। मीरा के पैर फर्श पर टिके रहे, लेकिन घुटने मुड़ गए। उसने अपने घुटनों के बीच खड़े होकर उनकी साड़ी को पूरी तरह खोल दिया। अब मीरा का शरीर केवल एक स्लिप और ब्लाउज में था, जो खुला हुआ था। राहुल की नज़र उनकी चूत पर टिक गई, स्लिप के पतले कपड़े के नीचे से गहरा रंग झलक रहा था। उसने अपना चेहरा उनकी जाँघों के बीच ले जाते हुए, नाक से वहाँ के गर्म स्थान को सूँघा। "उफ्फ… क्या खुशबू है," वह बड़बड़ाया।
मीरा ने उसके सिर को अपनी जाँघों से दबा लिया, "अरे नहीं… वहाँ मत…" लेकिन उनका विरोध नकली था। राहुल ने स्लिप के किनारे को अपने दाँतों से पकड़ा और धीरे से नीचे खींचा। काले घने बाल और गुलाबी, चमकती हुई चूत धीरे-धीरे बाहर आने लगी। मीरा ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया, शर्म से उनका सारा शरीर लाल हो गया। राहुल ने अँगूठे से उनकी चूत के ऊपरी हिस्से को हल्का दबाया। मीरा का शरीर ऐंठ गया। "हाथ हटा," उसने कहा, और फिर अपनी जीभ का फड़कता हुआ अगला हिस्सा उस नम गुलाबी दरार पर फेर दिया।
"आईय्य्याह!" मीरा चिल्लाई, उनकी एड़ियाँ स्लैब पर रगड़ खाने लगीं। राहुल ने जीभ को और अंदर धकेला, चूत के फूलते हुए होंठों को चूसना शुरू कर दिया। मीरा के हाथ उसके सिर पर बेतरतीब धकेलने लगे, कभी दबाते, कभी खींचते। "ऐसे… ऐसे मत कर… पागल हो गया है क्या?" वह रोने-सी आवाज़ में बोलीं, पर उनकी चूत से गर्म रिसाव होने लगा, जो राहुल की ठुड्डी पर टपक रहा था। उसने एक उँगली अंदर डाल दी, तंग और गर्म गुफा में घुमाते हुए। मीरा की साँसें अब दमघोंटू हो चली थीं, उनका पेट तेजी से उठ-गिर रहा था।
राहुल ने खुद अपनी पैंट का बटन खोला। उसका लंड बाहर कूदा, सख्त और नसों से युक्त। मीरा ने उसे देखा, आँखें फैल गईं। "वाह… इतना बड़ा," वह अचंभे में फुसफुसाईं। राहुल ने उनकी ओर बढ़ते हुए, अपने लंड को उनकी चूत के नम दरवाजे पर टिकाया। "चाची… तैयार हो?" उसने उनके होंठ चूमते हुए पूछा। मीरा ने जवाब नहीं दिया, बस अपनी बाँहें उसकी गर्दन पर लपेट लीं और अपनी चूत को हल्का-सा ऊपर उठा दिया, उसके सिर को अपने अंदर प्रवेश के लिए रास्ता दे दिया।
राहुल ने धीरे से दबाव बढ़ाया। उसके लंड का मोटा सिर मीरा की गीली चूत के छिद्र में घुसने लगा। मीरा ने एक तीखी साँस भरी, उनकी उँगलियाँ उसकी पीठ में घुस गईं। "आह… धीरे… बहुत बड़ा है," वह कराही। राहुल ने रुक कर उनके होंठ चूमे, फिर एक झटके में अपना आधा लंड अंदर धँसा दिया। मीरा का मुँह खुला रह गया, एक दबी चीख गले में ही रह गई। उनकी चूत तनकर उसके लंड को घेर लिया, गर्म और तंग आकर्षण।
"सारा… सारा ले लो चाची," राहुल हाँफता हुआ बोला, उसकी जाँघें काँप रही थीं। उसने अपने हाथों से मीरा के कूल्हे पकड़े और धीरे-धीरे पूरा अंदर धकेलना शुरू किया। मीरा की आँखों में आँसू आ गए, दर्द और आनंद का मिश्रण। जब वह पूरी तरह अंदर समा गया, तो दोनों एक पल के लिए ठिठके रहे, सिर्फ एक-दूसरे की साँसों की गर्मी महसूस करते हुए। मीरा की चूत में एक हल्की फड़कन थी, जो उसके लंड को और भी जकड़ रही थी।
फिर राहुल ने चलना शुरू किया। पहला धक्का कोमल था, फिर गति तेज होती गई। मीरा की पीठ ठंडे स्लैब से रगड़ खा रही थी, पर उन्हें उसकी गर्मी का कोई अहसास नहीं था। वह राहुल के शरीर से चिपकी हुई थीं, उसके हर धक्के पर कराहती हुई। "हाँ… ऐसे ही… और जोर से," वह बुदबुदाईं, उनके नाखून उसकी पीठ पर लाल रेखाएँ छोड़ रहे थे। राहुल ने उनकी एक चूची मुँह में ले ली, चूसते हुए हल्के से काटा। मीरा की कराहनें और भी ऊँची हो गईं।
उसकी गति अब अनियंत्रित हो रही थी। किचन में उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ गूँजने लगी – एक गीला, चपटा स्वर। मीरा ने अपनी एड़ियाँ उसकी कमर पर लपेट दीं, उसे और गहराई तक खींचने की कोशिश में। राहुल का लंड उनकी चूत में पूरी तरह से घुलमिल गया था, हर बार बाहर निकलते हुए गीलेपन से चमकता हुआ। "तेरी चूत कितनी गर्म है… कितनी तंग," वह गुर्राया, उसके सिर से पसीने की बूंदें मीरा के स्तनों पर गिर रही थीं।
मीरा ने अपनी आँखें खोलीं और उसका चेहरा देखा – तनाव से भरा, वासना से विकृत। उन्होंने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखी और फिर अपने मुँह में ले ली, अपनी चिंघाड़ों को दबाने की कोशिश में। राहुल ने उनकी कलाई पकड़कर हाथ सिर के पीछे धर दिया, उन्हें बिल्कुल बेबस छोड़ दिया। उसकी थपकी अब और तेज़, और जोरदार हो गई। मीरा का शरीर हर धक्के पर स्लैब पर आगे खिसकता, उनकी चूत के भीतर का घर्षण एक जलती हुई मिठास बिखेर रहा था।
"मैं… मैं आ रही हूँ…" मीरा चिल्लाई, उनकी आँखें पलकों के पीछे घूम गईं। उनकी चूत में एक तेज सिकुड़न शुरू हुई, राहुल के लंड को ऐंठन भरी पकड़ में लेती हुई। यह देखकर राहुल का खुद पर नियंत्रण नहीं रहा। उसने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया और अपना गर्म तरल उनके भीतर उड़ेल दिया। मीरा ने एक लंबी, काँपती हुई कराह निकाली, उनका शरीर चाप की तरह तन गया।
दोनों कुछ पलों तक ऐसे ही जुड़े रहे, साँसों का ताल धीरे-धीरे सामान्य होता हुआ। राहुल ने अपना सिर उनके स्तनों के बीच दबा दिया, मीरा ने उसके पसीने से तर बालों को सहलाया। फिर धीरे से, वह उनके अंदर से निकला। मीरा ने एक हल्की सी चुभन महसूस की, और उनकी चूत से उसका वीर्य रिसकर स्लैब पर गिरने लगा। "अब… अब क्या होगा?" मीरा ने धीमी, थकी आवाज़ में पूछा, उनकी नज़रें अभी भी धुँधली थीं। राहुल ने उन्हें चूमा, "कुछ नहीं। बस यही।" पर दोनों जानते थे – यह सिर्फ शुरुआत थी।
राहुल ने अपना सिर उनके स्तनों से हटाया और उनकी ठुड्डी को पकड़कर एक कोमल चुंबन दिया। "अब तुम स्नान करो, मैं किचन साफ कर देता हूँ," वह बोला, पर उसका हाथ मीरा की नंगी जाँघ पर बना रहा। मीरा ने हाँ में सिर हिलाया, शर्म से भरी मुस्कान के साथ। वह स्लैब से उतरीं, उनके पैर जमीन पर लड़खड़ाए। राहुल ने उन्हें सहारा दिया, और इस बहाने उनके नंगे शरीर को फिर से अपने से सटा लिया। "सावधान, चाची," उसने कहा, उसकी उँगलियाँ उनकी कमर के निचले हिस्से पर चिपक गईं।
मीरा ने अपनी स्लिप और ब्लाउज उठाया, फटी हुई साड़ी को जमीन से समेटा। "तू भी… कोई कपड़े पहन ले," उन्होंने कहा, उनकी नज़र उसके अब भी अकड़े हुए लंड पर पड़ी, जो अब नरम पड़ता हुआ भी प्रभावशाली था। राहुल मुस्कुराया और अपनी पैंट ऊपर खींच ली, बटन बंद किए बिना। मीरा बाथरूम की ओर चल दीं, पर उनके कदम धीमे थे, चूत से रिसता वीर्य उनकी जाँघों पर गर्म राह बहा रहा था।
बाथरूम में पहुँचकर उन्होंने दरवाजा बंद किया, पर अंदर से चिटखनी नहीं लगाई। उन्होंने अपना शरीर शीशे के सामने खड़ा कर देखा – स्तनों पर राहुल के दाँतों के निशान, गर्दन पर चूमने के लाल चिन्ह। एक गहरी साँस लेकर उन्होंने नल चलाया। पानी की धारा गर्म थी। उन्होंने अपने शरीर पर डाला, और जैसे ही पानी उनके स्तनों से टकराया, उन्हें राहुल के मुँह की याद आई। उनकी चूत में एक हल्की झुरझुरी दौड़ गई।
बाहर राहुल ने किचन साफ करना शुरू किया, पर उसका ध्यान बाथरूम के दरवाजे पर था। पानी के छनछनाने की आवाज़ आ रही थी। उसने अपनी पैंट उतार दी और नंगा बैठक में आ गया। पंखे की हवा उसके शरीर पर पड़ रही थी। कुछ ही देर में बाथरूम का दरवाजा खुला और मीरा एक तौलिए में लिपटी बाहर आईं। उनके बाल गीले थे, कंधों पर पानी की बूंदें लुढ़क रही थीं। राहुल को नंगा देखकर वह एक पल के लिए रुक गईं, तौलिया कसकर पकड़ लिया।
"तू… अभी तक नहला नहीं?" मीरा ने पूछा, उनकी आवाज़ में एक नया लचीलापन था। राहुल ने उनकी ओर बढ़ते हुए कहा, "तुम्हारे बिना ठंडा पानी कैसे सहूँ?" उसने तौलिए का कोना पकड़कर हल्का खींचा। मीरा ने विरोध नहीं किया। तौलिया खुल गया और उनका नम, साफ शरीर फिर से उजागर हो गया। राहुल की साँस रुक गई। "तुम तो पानी में और भी खूबसूरत लग रही हो," उसने कहा, उसके हाथ उनके कूल्हों पर आ गए।
मीरा ने उसके कंधों पर हाथ रखे। "अब बारी तेरी है। चल, नहला ले," उन्होंने कहा, पर उनकी अँगुलियाँ उसके सीने के बालों में खेलने लगीं। राहुल ने उन्हें उठाकर फिर से बाथरूम में ले चलने का इरादा किया, पर मीरा ने इनकार कर दिया। "नहीं… मैं तेरे लिए पानी लाती हूँ। यहीं बैठ जा।" वह किचन में गईं और एक बाल्टी में गर्म पानी भरकर लाईं। राहुल बैठक के फर्श पर बैठ गया।
मीरा ने उसके सामने घुटने टेके और एक कपड़ा लेकर उसके शरीर पर पानी डालना शुरू किया। पहले उसकी पीठ, फिर सीना। कपड़ा उसके निप्पलों पर घूमा, फिर नीचे पेट की ओर बढ़ा। राहुल की साँसें तेज हो गईं। मीरा ने अपना ध्यान उसकी जाँघों पर केंद्रित किया, कपड़े को हल्के से उसके लंड के चारों ओर घुमाया। "ये तो फिर से जाग गया," वह मुस्कुराईं, उनकी आँखों में एक नटखट चमक थी।
राहुल ने उनका हाथ पकड़कर कपड़ा हटा दिया और उनकी उँगलियों को सीधे अपने लंड पर रखवा दिया। "हाथ से साफ करो," उसने आदेश दिया। मीरा ने हल्का सा दबाव डाला, ऊपर से नीचे की ओर स्ट्रोक देना शुरू किया। उसका लंड पल भर में फिर से पत्थर जैसा कड़ा हो गया। "कितना गर्म है," मीरा फुसफुसाईं, दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर उसके अंडकोष को सहलाने लगीं।
राहुल ने आगे झुककर उनके गीले बालों को सूँघा, फिर उनके कान का लोब अपने दाँतों से दबोच लिया। मीरा के हाथ की गति तेज हो गई। "रुक… मैं नहला रही हूँ तुझे," उन्होंने हँसते हुए कहा, पर उनकी उँगलियाँ उसके लंड के सिर पर जमा चिपचिपे तरल को फैला रही थीं। राहुल ने उनकी बाँह पकड़कर उन्हें खींचा और अपनी गोद में बैठा लिया। मीरा की गांड उसके कड़े लंड पर आकर टिकी। "अब तू ही मेरा तौलिया बन जा," वह गुर्राया, उसके हाथ उनके स्तनों पर चढ़ गए, निप्पलों को मरोड़ते हुए।
मीरा ने अपना सिर पीछे उसके कंधे पर टिका दिया, उनकी पीठ उसके सीने से चिपक गई। वह धीरे-धीरे अपने कूल्हे हिलाने लगीं, उसके लंड को अपनी गांड के बीच दबाते हुए। राहुल का मुँह उनकी गर्दन पर था, चूमता हुआ, चूसता हुआ। "आज रात…" मीरा ने हांफते हुए कहा, "आज रात तू मेरे साथ सोएगा क्या?" राहुल ने उनकी चूची को जोर से दबोचा, "पूरी रात, चाची। पूरी रात तेरी चूत मेरी होगी।" उनके शरीर फिर से एक दूसरे में लिपट गए, पानी की बूंदें और पसीना मिलकर एक नया गीला पैटर्न बना रहे थे। बाहर शाम हो रही थी, और अंदर दोनों के बीच की आग फिर से धधकने को तैयार थी।
राहुल ने उनकी गर्दन पर चूमते हुए हाथों से उनके पेट को सहलाया, नाभि के चारों ओर गोलाई बनाते हुए। "पूरी रात का वादा है," वह फुसफुसाया, "पर पहले खाना बनाना होगा। वरना शरीर में ताकत कहाँ से आएगी?" मीरा ने उसके लंड पर हल्का दबाव डालते हुए कूल्हे घुमाए, "तू ही बना दे न। मैं तो थक गई हूँ।" उनकी आवाज़ में एक नटखट थकान थी।
राहुल ने उन्हें उठाकर खड़ा किया और स्वयं भी उठा। उसने तौलिया उठाकर उनके गीले शरीर को फिर से पोंछा, इस बार बहुत धीरे-धीरे, हर अंग को अलग से सूखाते हुए। जब तौलिया उनकी जाँघों के बीच पहुँचा तो उसने रुक कर दबाव बढ़ाया। मीरा ने उसके कंधे पकड़ लिए, "ऐसे नहीं… फिर से गीला हो जाऊँगी।" पर राहुल ने एक कोमल, घुमावदार स्ट्रोक दिया, तौलिया के माध्यम से ही उनकी चूत की सूजन महसूस की। "तुम तो पहले से ही गीली हो," उसने कान में कहा।
फिर उसने मीरा को कपड़े पहनने के लिए भेजा और खुद एक शॉर्ट्स पहनकर किचन में चला गया। मीरा ने एक हल्की सी कॉटन साड़ी ओढ़ी, बिना ब्लाउज के। कपड़ा पतला था, और उनके उभार साफ झलक रहे थे। वह किचन में आई और चूल्हे के पास बैठ गई, राहुल को सब्ज़ी काटते हुए देखने लगी। उसकी माँसपेशियाँ हर हरकत पर नाच रही थीं।
"क्या देख रही हो?" राहुल ने मुस्कुराते हुए पूछा, बिना मुड़े। "तेरी बाँहें," मीरा ने कहा, "तू चाकू कैसे पकड़ता है, कैसे काटता है… सब देख रही हूँ।" राहुल ने चाकू रखा और उनके पास आकर बैठ गया। उसने उनकी साड़ी के पल्लू से उनका चेहरा पोंछा, "तुम्हारे चेहरे पर भूख की जगह कुछ और है।" उसने उनके निचले होंठ को अँगूठे से सहलाया, फिर अपनी उँगली उनके मुँह में डाल दी। मीरा ने आँखें मूँद लीं और उँगली चूसने लगीं, जीभ से अँगूठे के नाखून के पास चक्कर लगाते हुए।
राहुल की साँस फिर से भारी हो गई। उसने उँगली बाहर निकाली और सीधे उनके होंठों पर जा लगा। यह चुंबन कोमल नहीं, विक्षुब्ध था, दाँतों का हल्का दंश और जीभ की गहरी छाप। मीरा ने पीछे की ओर झुककर हाथों से जमीन को टेका, और राहुल उन पर झुक गया। उनकी साड़ी का पल्लू फिर खिसक गया, और उनका सीना खुल गया। राहुल ने अपना चेहरा वहाँ दबा दिया, निप्पलों को बिना छुए, सिर्फ गर्म साँसों से उन्हें उत्तेजित किया।
"खाना बनाने दो पहले," मीरा हाँफती हुई बोली, पर उनके हाथ उसके बालों में थे। "बना तो रहा हूँ," राहुल बोला, उसका एक हाथ उनकी साड़ी के नीचे घुसा और जाँघ के मुलायम भीतरी हिस्से पर पहुँच गया। उसने वहाँ की कोमल त्वचा को चुटकी में लिया, हल्का सा। मीरा का शरीर ऐंठ गया। "अरे! दर्द होता है," वह चिल्लाई, लेकिन उनकी जाँघें और खुल गईं।
राहुल ने चुटकी छोड़ी और उस जगह को हथेली से सहलाया। फिर उसकी उँगलियाँ फिसलकर उनकी चूत के बाहरी होंठों पर आ गईं, जो अभी भी थोड़ी सूजी हुई और गर्म थीं। उसने मध्यमा उँगली को धीरे से अंदर के नमी में डुबोया, सिर्फ एक जोड़। मीरा ने गर्दन पीछे की ओर झटकी, "वाह… रात भर का इंतज़ार नहीं हो रहा।" राहुल ने उँगली अंदर-बाहर करनी शुरू की, धीमी, लेकिन गहरी गति। "खाना बनाने में देर लगेगी," उसने कहा, "इससे पहले तुम्हारी भूख शांत हो जाए।"
थोड़ी देर बाद उसने उँगली बाहर निकाली और चमकती हुई उँगली मीरा के सामने कर दी। "चखो, कितना मीठा है।" मीरा ने शर्माते हुए उसकी उँगली मुँह में ले ली और चूसना शुरू कर दिया। उनकी नज़रें आँखों में गड़ी रहीं। राहुल ने फिर से उन्हें चूमा, इस बार उनके मुँह का स्वाद चाटता हुआ।
अचानक बाहर कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। दोनों एकदम स्तब्ध। मीरा ने डरकर साड़ी संभाली। "शायद कलरवती चाची हैं," वह काँपती आवाज़ में बोली। राहुल उठा और खिड़की की ओर गया। झाँककर देखा तो सड़क पर एक कुत्ता भौंक रहा था, कोई और नहीं। वह मुस्कुराया और वापस आकर मीरा को दबाकर लिटा दिया। "डर गईं? कोई नहीं है।" उसने उनकी साड़ी का अंचल खोल दिया, "चलो, अब कोई रुकावट नहीं।"
मीरा ने उसकी शॉर्ट्स की ओर हाथ बढ़ाया और कमरबंद खोल दी। "तू भी कुछ कपड़े पहन लेता," वह हँसी। राहुल ने शॉर्ट्स उतार फेंके और उन पर पूरी तरह लेट गया। दोनों के बीच अब केवल पतली साड़ी का कपड़ा था। उसने अपने लंड को उनकी चूत के ऊपर रगड़ना शुरू किया, बिना अंदर घुसे। मीरा की आँखें लाल हो गईं, "अंदर आ… बस कर।" राहुल ने इनकार में सिर हिलाया, "नहीं, पहले तुम मुझे भीख माँगो।"
मीरा ने अपनी जाँघें उसकी कमर से लपेट लीं और कूल्हे ऊपर उठाकर उसके लंड के सिर को अपनी चूत के द्वार पर टिका दिया। "अब आ जा," वह गिड़गिड़ाई। राहुल ने धीरे से दबाव डाला, केवल सिर अंदर घुसाया। मीरा कराह उठी। "पूरा… पूरा लेने को तरस रही हूँ," उन्होंने उसके कान में कहा। यह सुनते ही राहुल का संयम टूट गया। उसने एक झटके में पूरा लंड अंदर धँसा दिया, और दोनों की साँसें एक साथ रुक गईं। अब रात का अंधेरा पूरी तरह छा गया था, और किचन में केवल स्टोव की बची हुई लौ टिमटिमा रही थी।
राहुल ने एक झटके में पूरा लंड अंदर धँसा दिया, और दोनों की साँसें एक साथ रुक गईं। अब रात का अंधेरा पूरी तरह छा गया था, और किचन में केवल स्टोव की बची हुई लौ टिमटिमा रही थी। उसकी गर्मी उनके पसीने से तर चेहरों पर महसूस हो रही थी। राहुल ने गहरी साँस ली और फिर धीरे-धीरे चलना शुरू किया, हर धक्के पर मीरा की चूत के भीतर एक नई गर्मी फैलती।
"ओह… हाँ… बस ऐसे ही," मीरा ने अपनी बाँहें उसकी गर्दन पर कस दीं, उनके नाखून उसकी पीठ में गड़ने लगे। राहुल का एक हाथ उनकी गांड के नीचे सरका, उन्हें और ऊपर उठाकर अपनी ओर खींचा। इससे उसके लंड का कोण बदल गया और वह और गहराई तक पहुँचने लगा। मीरा की आँखें चौंधियाँ गईं, "अरे राम… ये क्या कर दिया तूने?" उनकी कराह एक लंबी सिसकी में बदल गई।
राहुल ने उनकी इस प्रतिक्रिया पर अपनी गति और तेज़ कर दी। अब वह पूरी शक्ति से अंदर-बाहर हो रहा था, उनकी चूत के गीले होंठ हर बार चपटे होकर बाहर निकलते और फिर अंदर समा जाते। मीरा का शरीर हर धक्के से किचन के फर्श पर खिसक रहा था, पर राहुल का दूसरा हाथ उनके सिर को सँभाले हुए था। उसने झुककर उनके होंठों को निगल लिया, उनकी जीभ को चूसते हुए। स्वाद मीठा और नमकीन मिश्रित था।
थोड़ी देर बाद उसने मीरा को पलट दिया, उनकी गांड हवा में उठा दी। इस नई पोजीशन में उसकी पहुँच और गहरी हुई। उसने उनकी कमर के दोनों ओर हाथ रखे और जोरदार धक्के देना शुरू किए। मीरा का चेहरा फर्श की ओर था, और उनकी कराहें दबी हुई, गूँजती आवाज़ें थीं। "मेरी… मेरी गांड मत देख… अह्ह्ह!" राहुल ने उनकी गोल चुतड़ों को अपनी हथेलियों से कसकर दबोचा, उँगलियाँ उनके भीतर घुसते लंड के साथ तालमेल बिठाते हुए।
उसकी गति एक अनियंत्रित रिदम में बदल गई। स्टोव की लौ अब बिल्कुल बुझने के कगार पर थी, और अँधेरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और स्पष्ट हो गई। मीरा ने अपना एक हाथ पीछे बढ़ाकर अपनी चूत को छुआ, जहाँ राहुल का लंड आ-जा रहा था। उनकी उँगलियाँ गीलेपन से भीग गईं। "मैं… मैं फिर से आ रही हूँ," वह चीखी, उनका शरीर काँपने लगा।
यह सुनते ही राहुल ने एक हाथ से उनके बाल खींचे, उनका सिर पीछे की ओर झुकाया, और दूसरे हाथ से उनकी एक चूची मरोड़ी। "साथ आओ मेरे साथ," वह गुर्राया। मीरा की चूत में एक तीव्र सिकुड़न दौड़ गई, जैसे कोई गर्म लहर उनके पेट के निचले हिस्से में फैल रही हो। उनकी कराह एक लंबी, टूटी हुई चीख में बदल गई। राहुल ने भी अपना सिर पीछे झटका और एक गहरा, कंपकंपी भरा धक्का दिया। उसका गर्म वीर्य उनकी चूत की गहराई में फूट पड़ा, भरता हुआ, लगातार।
दोनों कई क्षणों तक ऐसे ही जमे रहे, केवल उनकी हाँफती साँसों की आवाज़ और दूर कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। फिर राहुल धीरे से उन पर लुढ़क गया, अपना वजन बाँटते हुए। मीरा ने अपना चेहरा फर्श से मोड़ा, उनके गाल पर आँसू और पसीने की धारियाँ थीं। राहुल ने उनकी पलकें चूमीं। "क्यों रो रही हो?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ में एक नई कोमलता थी।
"पता नहीं," मीरा फुसफुसाईं, "शायद… शायद इसलिए कि यह गलत है।" उन्होंने अपना हाथ उठाकर उसका चेहरा छुआ। राहुल ने उनकी हथेली को चूमा। "गलत वह होता है जिससे तकलीफ हो। यहाँ तो सिर्फ… सुकून है।" उसने उन्हें गले लगा लिया। मीरा ने अपना सिर उसकी छाती पर टिका दिया, उसकी धड़कन सुनने लगीं। धीरे-धीरे, उनकी साँसें एक सामान्य लय में आ गईं।
थोड़ी देर बाद राहुल उठा और मीरा को भी उठाया। उसने उन्हें बाथरूम तक पहुँचाया, फिर खुद लौटकर किचन में बिखरे कपड़े और तौलिया उठाया। जब वह बैठक में पहुँचा तो मीरा फर्श पर चादर बिछा रही थीं। "आज रात यहीं सोएँगे," उन्होंने कहा, बिना निगाह उठाए। राहुल ने हाँ में सिर हिलाया। दोनों चादर पर लेट गए, नंगे शरीर, एक-दूसरे से सटे हुए। राहुल ने चादर का एक कोना उन पर ओढ़ दिया।
"कल सुबह कलरवती चाची आ सकती हैं," मीरा ने अचानक कहा, उनकी आवाज़ में फिर वही डर लौट आया था। राहुल ने उन्हें अपनी ओर खींचा। "आने दो। हम तो बस भतीजा और चाची हैं, ना?" उसने कहा, एक नटखट मुस्कान के साथ। मीरा ने उसकी बाँह पर हल्की चपत लगाई, "हरामी।" फिर वह चुप हो गईं, उनकी आँखें खिड़की से आते हुए पहली सुबह के उजाले की ओर टिक गईं। राहुल की साँसें गहरी और नियमित हो चली थीं, वह सोने के कगार पर था। मीरा ने अपना हाथ उसके सीने पर रखा, उसकी गर्मी महसूस करते हुए। एक अजीब सी शांति थी, जो उनके अंदर के तूफान के बाद आई थी। बाहर, पहली चिड़िया चहकी।