अनजानी मुलाकात






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🔥 शीर्षक – गाँव की उस राह पर, जहाँ हर सवाल एक नया मोड़ ले आया।

🎭 टीज़र – एक अनजान रास्ता, एक सहमी हुई आवाज़, और वह गलत मोड़ जो दो अजनबियों की किस्मत बदल देता है। अब वापसी का रास्ता भी उनकी वासना का शिकार हो चुका है।

👤 किरदार विवरण – राहुल, २८, शहर से आया हुआ, उसकी आँखों में एक अलग तरह की भूख है। प्रिया, २४, गाँव की रहने वाली, उसके कसते हुए कपड़े उसके नटखट अरमानों को छुपा नहीं पाते।

📍 सेटिंग/माहौल – साँझ का समय, सुनसान गाँव का पगडंडी वाला रास्ता, चारों तरफ सन्नाटा और बस उन दोनों की साँसों की आवाज़।

🔥 कहानी शुरू – "भैया, यह रास्ता तो शहर जाता है क्या?" प्रिया की आवाज़ में एक कंपकंपी थी। राहुल ने उसकी तरफ देखा, उसके पसीने से तर कपड़े उसके स्तनों के आकार उभार रहे थे। "नहीं, यह तो बिल्कुल अलग दिशा में है।" वह धीरे से बोला, उसकी नज़रें उसकी चूची पर टिक गईं। प्रिया ने महसूस किया उसकी नज़रों का गर्म ताप, एक अजीब सी गर्माहट उसके पेट में उतर गई। "तो… तो अब क्या करें?" उसने डरी हुई आवाज़ में पूछा, पर उसके होंठों पर एक नटखट मुस्कान खेल रही थी। राहुल ने कदम बढ़ाया, "डरो मत, मैं हूँ ना।" उसका हाथ अनजाने में ही उसकी कमर पर आ गया। प्रिया ने एक झटका सा महसूस किया, पर हटी नहीं। उसकी साँसें तेज हो गईं। आसपास कोई नहीं था, बस हवा में उनकी वासना तैर रही थी। राहुल ने धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, "तुम्हारा रास्ता भटक गया, पर मेरा दिल तो तुम्हारे पास भटक गया है।" प्रिया की आँखें बंद हो गईं, उसने अपने आप को उसकी गर्माहट के सामने ढलते महसूस किया। अब सवाल सिर्फ रास्ते का नहीं, बल्कि उनकी इस नई, गहराती जा रही ख्वाहिश का था।

राहुल की उंगलियों ने उसकी कमर पर हल्का सा दबाव डाला, प्रिया की सांसें और भी तेज हो गईं। "तुम्हारी यह डरावनी मुस्कान… मुझे बेकाबू कर रही है," उसने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, अपने होंठों को हल्के से उसके गाल से टकरा दिया। प्रिया ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी ओर देखा, और फिर एक नटखट हंसी के साथ अपना सिर झुका लिया। "भैया, आप तो मुझे भटका रहे हैं," उसने कहा, पर उसकी पीठ उसकी छाती से और दब गई।

उसका एक हाथ धीरे से उसकी पीठ से होता हुआ उसके पेट तक आया, कपड़े के पतले कपास के आर-पार उसकी गर्मी महसूस कर रहा था। "यह रास्ता तो अब हम दोनों ने मिलकर चुना है," राहुल ने कहा, अपनी नाक उसके बालों में छुपा दी। प्रिया के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपना हाथ उठाया और अनिश्चितता से उसकी कलाई को छू लिया, फिर वहीं रुक गई, जैसे कोई अदृश्य रेखा पार करने से डर रही हो।

"इतना डर क्यों?" राहुल का सवाल उसकी गर्दन पर गर्म सांसों की तरह टिका। "डर नहीं… पर…" प्रिया की आवाज़ लड़खड़ा गई जब उसकी उंगलियों ने उसकी नाभि के ऊपर हल्का सा घेरा बनाया। उसके मन में विचारों की उथल-पुथल थी-गाँव की चुप्पी और इस शहरी आदमी की गर्माहट के बीच फंसी हुई। राहुल ने उसकी इस हिचकिचाहट को पढ़ लिया। उसने जल्दबाजी नहीं की। बस, अपना माथा उसके कंधे पर टिका दिया, उसकी धड़कन सुनने लगा।

थोड़ी देर की खामोशी में, सिर्फ उनकी सांसों और दूर किसी झींगुर की आवाज़ ने जगह भरी। फिर प्रिया ने धीरे से अपना हाथ मोड़ा और उसकी उंगलियों को अपने हाथों में ले लिया। यह एक सहमती थी, बिना शब्दों के। राहुल ने इस मौके को समझा। उसने अपना सिर उठाया और उसके कान के पास के नर्म हिस्से पर हल्का सा चुंबन दिया। प्रिया के होठों से एक अधूरी कराह निकल गई, उसकी पलकें फड़कने लगीं।

उसकी साड़ी का पल्लू, जो पहले ही उलझा हुआ था, अब और खिसक गया। राहुल की नजर उसके ब्लाउज के कसाव पर गई, जहां कपड़ा तनाव में था। "तुम्हारे ये नखरे…" उसने कहा, "…ये कपड़े तो तुम्हारे अरमानों का बोझ नहीं संभाल पा रहे।" प्रिया ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसकी बात का विरोध नहीं किया। उसकी चुप्पी में एक अनुमति थी, एक चुनौती भी। राहुल का हाथ अब उसके पेट से ऊपर उठा, उसकी पसलियों के नीचे के मुलायम मोड़ को महसूस करने लगा, उसकी उंगलियों का स्पर्श जानबूझकर धीमा और भारी था।

प्रिया की पसलियों के नीचे से गुजरती उसकी उंगलियाँ अब धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगीं, हर इंच पर रुककर उसकी त्वचा के सिहरन भरे संकेत पढ़तीं। वह उसके ब्लाउज के नीचे के किनारे तक पहुँच गईं, कपड़े और त्वचा के बीच की गर्म दरार में ठहर गईं। "तुम चुप क्यों हो गई?" राहुल ने फुसफुसाया, उसके गाल को अपने होंठों से सहलाया। "बोलो… क्या चाहती हो?"

उसका सवाल हवा में लटका रहा। प्रिया ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में डर नहीं, एक तरल साहस था। "आप जानते हैं…" उसने धीमी, लिपटी हुई आवाज़ में कहा, और अपना हाथ उठाकर उसकी गर्दन के पीछे रख दिया, उसे और नज़दीक खींचा। यह एक स्पष्ट निमंत्रण था।

राहुल ने उसके ब्लाउज के बटन पर अपना अंगूठा घुमाया, पहला बटन खुलने की आवाज़ ने प्रिया के शरीर में एक झटका दौड़ा दिया। उसकी साँस रुक सी गई। ठंडी शाम की हवा ने खुले हिस्से को छूकर एक नया सिहरन पैदा किया। राहुल का सिर झुका और उसने उसकी कंधे की नर्म त्वचा पर, कपड़े के खुले किनारे से, एक लंबा, गर्म चुंबन दिया। प्रिया के मुँह से एक लंबी, कंपकंपी कराह निकल गई, उसकी उंगलियाँ उसके बालों में चिपक गईं।

उसका दूसरा हाथ अब उसकी पीठ के निचले हिस्से पर था, साड़ी के कपड़े के मोटे परत के ऊपर से उसके चूतड़ों के ऊपर एक कोमल दबाव बना रहा था। वह उसे अपनी ओर दबा रहा था, और प्रिया ने अपने शरीर को उसकी मर्दानगी के खिंचाव के प्रति ढलते महसूस किया। एक अंदरूनी गर्मी उसके निचले पेट में ज्वाला की तरह फैलने लगी।

"यहाँ… कोई आ सकता है," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में चेतावनी नहीं, बल्कि इस रोमांच का एहसास था। राहुल ने उसकी बात को अपने होंठों से दबा दिया, उसके गाल से होते हुए उसके होठों के कोने तक पहुँच गया। "तो फिर… चुपके से… बस इतना," उसने कहा और दूसरा बटन खोल दिया।

दूसरा बटन खुलते ही ब्लाउज का कपड़ा दोनों तरफ फैल गया, उसके स्तनों का उभार अब केवल पतली ब्रा के कपड़े से छुपा था। राहुल की सांसें उसकी गर्दन पर भारी पड़ने लगीं। "चुपके से?" प्रिया ने हंसते हुए फुसफुसाया, "पर आपकी उंगलियां तो बहुत शोर कर रही हैं।" उसने अपनी उंगलियों से उसकी कमर पर बंधी साड़ी की गांठ को खिसकाया, एक इंच नीचे।

राहुल ने अपना मुंह उसके खुले कंधे से हटाकर उसकी गर्दन की नसों पर लगाया, हल्के दांतों से नर्म काटमारी की। प्रिया का सिर पीछे झुक गया, उसकी आंखें फिर से बंद हो गईं। उसकी ब्रा के कपड़े के ऊपर से, उसके निप्पल सख्त होकर उभर आए थे। राहुल की उंगली ने उसके पेट पर चक्कर काटना जारी रखा, फिर नाभि में घुसकर हल्का दबाव डाला। "तुम्हारा पेट तो मेरी उंगली को अपने अंदर खींच रहा है," वह बोला।

प्रिया ने अपना हाथ उसकी जांघ पर रख दिया, ऊपर की ओर सरकाते हुए। "आपकी भी तो… तैयारी हो रही है," उसने उसके कान में कहा, उसकी पैंट के कपड़े के नीचे के कड़ेपन को महसूस किया। राहुल ने एक गहरी सांस भरी। उसका हाथ अब ब्रा के नीचे से सरककर उसके स्तन के किनारे पर आ गया, अंगूठे ने निप्पल के ऊपर से हल्का सा रगड़ा। प्रिया का मुंह खुला रह गया, एक मूक कराह हवा में लटक गई।

उसने अचानक अपनी आंखें खोलीं और राहुल को दूर से आती एक टिमटिमाती लाइट की ओर देखते हुए पाया। "रुको…" उसने कहा, डर से नहीं बल्कि सतर्कता से। राहुल रुका, उसकी सांसें गर्म और बेचैन थीं। लाइट दूर मुड़ गई। प्रिया ने उसकी ओर देखा, फिर उसके होंठों पर अपनी उंगली रख दी। "चुपचाप…" वह बोली और खुद ही तीसरा बटन खोल दिया।

ब्रा का एक हिस्सा अब पूरी तरह देखा जा सकता था, गीला पसीने से। राहुल ने अपना सिर झुकाया और कपड़े के ऊपर से ही, उसके निप्पल को अपने होंठों से दबा दिया, गर्म सांसों से उसे भिगोते हुए। प्रिया के पैरों तक एक करंट दौड़ गया। उसकी उंगलियां उसके बालों में कसकर घुस गईं। "ओह… भैया…" वह कराह उठी।

उसकी साड़ी की गांठ अब लगभग खुल चुकी थी। राहुल का हाथ पीठ से नीचे सरककर उसके चूतड़ों के बीच की गर्म दरार पर आया, कपड़े के मोटे परत के बावजूद गर्मी महसूस कर रहा था। वह उसे अपनी ओर खींचा, और प्रिया ने अपनी जांघों को उसकी जांघ से रगड़ते हुए महसूस किया। एक नया तनाव, नया खिंचाव। "अब… बस इतना ही," प्रिया ने कहा, पर उसके हाथ ने उसकी पैंट की बेल्ट को पकड़ लिया था।

उसकी बेल्ट पर उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना हल्का था कि राहुल ने पहले तो समझा ही नहीं। फिर उसकी पकड़ कस गई, और उसने अपनी आँखें उठाकर प्रिया को देखा। उसकी निगाहों में एक नटखट दाव था, जैसे कह रही हो कि अब बारी उसकी है। "चुपचाप ही सही," प्रिया ने फुसफुसाया और बेल्ट के बकल को खिसकाने लगी।

राहुल ने अपना मुंह उसके स्तन से हटाया, उसकी ललाई देखकर एक गहरी सांस भरी। उसकी हथेली ने प्रिया के चूतड़ों के बीच के गर्म दबाव को और बढ़ाया। "तुम तो मुझसे भी आगे निकल गई," उसने कहा, उसकी नाक उसके गाल से रगड़ खाती हुई।

बकल खुलने की धातु की आवाज़ ने शाम की खामोशी में एक तीखा स्वर भर दिया। प्रिया ने उसकी पैंट का बटन खोल दिया, ज़िप का ऊपर चढ़ना उन दोनों की सांसों की गड़गड़ाहट में डूब गया। उसका हाथ अंदर घुसा, उसके अंडरवियर के कपड़े को महसूस किया और नीचे के गर्म, कड़े खिंचाव को। राहुल का सिर पीछे झुक गया, एक गंभीर कराह उसके गले से निकली।

"शोर मत करो," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, और अपने दूसरे हाथ से उसके ब्लाउज के आखिरी बटन को खोल दिया। कपड़ा पूरी तरह फैल गया, ब्रा उसके स्तनों को कसकर पकड़े हुए। उसने अपनी उंगली उसके लंड के सिरे पर, कपड़े के ऊपर से घुमाई। राहुल काँप उठा।

उसने जवाब में अपना हाथ उसकी साड़ी के पल्लू के नीचे डाला, उसकी जांघ के मुलायम अंदरूनी हिस्से को ढूँढ़ा। उसकी त्वचा गर्म और नम थी। प्रिया की सांस फूलने लगी, उसकी हरकत धीमी पड़ गई। "यह… यह रास्ता…" वह बोली, पर वह वाक्य पूरा नहीं हुआ।

"हम दोनों ने चुना है," राहुल ने उसका वाक्य पूरा किया और उसकी जांघ के कोमल मांस पर अपनी उंगलियों से हल्का दबाव डाला। प्रिया ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसकी उंगलियों के निशान अपनी त्वचा पर उभरते हुए महसूस किए। दूर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई, और उसने अचानक अपना हाथ खींच लिया।

"कोई है," वह सहमी हुई फुसफुसाई। राहुल रुका, उसकी सांसें गर्म और तेज चल रही थीं। उसने कान लगाकर सुना। सन्नाटा था। "हवा का झोंका था," उसने कहा, पर अब उनकी गति में एक सतर्कता आ गई थी।

प्रिया ने उसकी पैंट को नीचे खिसकाया, बस इतना कि उसका कड़ापन आज़ाद हुआ। ठंडी हवा के झोंके ने राहुल को एक सिहरन भर दी। उसने प्रिया को और पास खींचा, उसके खुले स्तन अपनी छाती से दब गए। दोनों के बीच कपड़े का एक पतला, गीला परदा ही रह गया था। उनकी धड़कनें एक दूसरे से टकराने लगीं। प्रिया ने अपना माथा उसके कंधे पर टिका दिया, और धीरे से, हिलते हुए, अपनी जांघों के बीच उसके लंड के सिरे को रगड़ा। राहुल की पकड़ उसकी जांघ पर कस गई। अब कोई शब्द नहीं थे, बस इस अनचाहे रास्ते पर दो शरीरों का गर्म, साँसों से भरा नाच।

प्रिया के जांघों का रगड़ना एक लय में बदल गया, हर हिलतर में उसका लंड उसके नर्म मांस पर दबाव बनाता। राहुल ने अपना मुंह उसके कंधे से हटाकर उसके होंठों की तरफ बढ़ाया, पर प्रिया ने अपना सिर झुका लिया, उसकी नाक उसकी ठुड्डी से टकराई। "पहले… पहले यहाँ से हटें," वह हाँफती हुई बोली, उसकी नज़र उस ओर गई जहाँ दूर की लाइट फिर से दिखी थी।

राहुल ने उसे पेड़ के पीछे खींचा, उनके शरीर अब छाया में समा गए। उसकी पीठ खुरदुरी छाल से टिकी। प्रिया ने इस नई जगह का फायदा उठाते हुए अपने दोनों हाथों से उसकी पैंट को और नीचे धकेला, उसके कूल्हे बाहर आए। ठंडी हवा ने त्वचा को छूकर एक साझी सिहरन पैदा की। राहुल का हाथ उसकी साड़ी के भीतर और गहराई तक घुसा, उसकी चूत के ऊपर के बालों को, कपड़े के नीचे से, महसूस किया। प्रिया की सांस एकदम रुक गई, उसकी आंखें चौंधिया गईं।

"तुमने कहा था चुपचाप," राहुल ने उसके कान में गुर्राते हुए कहा, और अपनी उंगली ने उसके अंदरूनी लबों के बीच एक कोमल, सर्पिल रास्ता बनाया। वह गर्म और स्लिपरी थी। प्रिया का मुंह खुला रह गया, एक मूक हांफना उभरा। उसने जवाब में अपना हाथ उसके लंड के तने पर रखा, अंगूठे से सिरे पर जमा हुआ पानी फैलाया।

उनकी हरकतें अब समन्वित हो गईं, एक दूसरे की लय पकड़ती हुईं। राहुल की उंगली धीरे से अंदर घुसी, केवल एक जोड़। प्रिया ने अपनी जांघें कसकर बंद कर लीं, उसकी उंगली को अपनी गर्मी में कैद करते हुए। "अरे… यह तो…" वह बुदबुदाई।

"हाँ, बस यही," उसने फुसफुसाया और अपनी दूसरी उंगली से उसके निप्पल को, ब्रा के कपड़े के ऊपर से, दबाया। प्रिया का शरीर एक धनुष की तरह तन गया, उसकी पीठ छाल से रगड़ खाने लगी। उसकी सांसों में कराहने का स्वर मिलने लगा।

तभी पत्तों की सरसराहट हुई। दोनों जम गए। प्रिया की उंगलियाँ राहुल के लंड पर जकड़ गईं। सरसराहट दूर जाती लगी। "शायद जानवर," राहुल ने कहा, पर उसकी आवाज़ में अब एक जल्दबाजी थी। प्रिया ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में छुपे डर के पीछे एक तीव्र ललक जल रही थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू और खोला, अपनी एक जांघ उसके हिप्स के बीच में फंसा दी। दोनों के निचले अंग अब सीधे संपर्क में थे, केवल पतले अंदरूनी कपड़ों का अवरोध।

राहुल ने अपनी उंगली थोड़ी और चलाई, गीलेपन की आवाज़ उनकी अपनी सांसों में खो गई। प्रिया ने अपना सिर पीछे झटका, उसकी गर्दन की नसें तन गईं। उसने उसके लंड को एक तेज, दबाव भरी मुट्ठी में ले लिया। राहुल के होठों से एक गहरा, दबा हुआ गुर्राहट निकला। उसने अपना मुंह उसकी छाती पर गिरा दिया, ब्रा के कपड़े को अपने दांतों से खींचा। प्रिया ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ लिया।

उनकी गति तेज हो गई, अब धीरज नहीं, एक तात्कालिक, भूखी जल्दबाजी। प्रिया की उंगलियाँ उसके लंड पर तेजी से चलने लगीं, जबकि राहुल की उंगली उसकी चूत के अंदर एक गहरे, गोलाकार दबाव में घूमने लगी। हवा में उनके पसीने और उत्तेजना की गंध मिल गई। प्रिया का मुंह खुला रह गया, एक लंबी, दबी हुई कराह उसके गले से निकलकर राहुल के कान में समा गई। उसकी जांघें कांपने लगीं। राहुल ने अपना सिर उठाया और उसके होंठों को अपने में समेट लिया, उनकी कराहें अब एक दूसरे में डूब गईं।

उसके होंठों का चुंबन एक गहरी, भूखी चूसन में बदल गया। प्रिया की मुट्ठी उसके लंड पर तेज़ हुई, उसकी उंगलियाँ सिरे से तने तक गीली गति से फिसलने लगीं। राहुल की उंगली उसकी चूत के अंदर गहराई तक घुसी, एक और जोड़ अब उसकी तंग गर्मी में समा गया। प्रिया की कराह उसके मुँह में डूब गई, उसकी जांघें तेजी से काँपने लगीं।

"रुको… मैं…" उसकी आवाज़ टूटी, पर राहुल ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसकी नज़रों में झाँका। "नहीं… अब नहीं रुकना," उसने गुर्राते हुए कहा और अपनी उंगलियों की गति बढ़ा दी, उसकी चूत के अंदर एक तेज, गोलाकार घर्षण पैदा करते हुए। प्रिया का सिर पीछे छाल से टकराया, उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसके निचले पेट में एक ज्वाला फैलने लगी, तीव्र और अपरिहार्य।

उसने अचानक राहुल के लंड को पूरी मुट्ठी में ले लिया और अपनी जांघों के बीच की गर्म दरार पर रख दिया, केवल उनके अंडरवियर के पतले कपड़े अब अवरोध थे। "इसे… अंदर ले लो," वह हाँफती हुई बोली, उसकी आवाज़ में एक गहरी वासना थी। राहुल ने एक क्षण को रुककर उसकी आँखों में देखा, फिर अपने हाथ से उसकी पैंटी को तरफ सरका दिया। ठंडी हवा ने उसकी गीली चूत को छूकर उसे एक सिहरन से भर दिया।

वह धीरे से, अपने लंड के सिरे को उसके नम द्वार पर टिकाया। प्रिया की साँस रुक गई, उसकी उंगलियाँ उसकी पीठ में घुस गईं। "आह… हाँ…" उसने फुसफुसाया, और राहुल ने एक धीरे, दबाव भरे धक्के में अपना आधा अंदर कर दिया। प्रिया की चूत ने उसे एक जलती हुई तंगी से घेर लिया। उसका मुँह खुला रह गया, एक लंबी, कंपकंपी कराह निकल गई।

राहुल ने गति बनाई, धीमी और गहरी शुरुआत की। हर धक्के पर प्रिया की पीठ छाल से रगड़ खाती, उसके स्तन ब्रा में कसकर हिलते। उसकी कराहें अब लगातार और ऊँची होने लगीं। राहुल का एक हाथ उसकी गांड पर कस गया, उसे हर धक्के में अपनी ओर खींचते हुए। दूसरा हाथ उसके ब्लाउज के अंदर घुसकर उसके निप्पल को दबाने लगा। "तुम… ओह… तुम कितना गहरे जा रहे हो," प्रिया हाँफी।

उसकी गति तेज और अधिक आक्रामक हो गई। पेड़ की छाल उसकी पीठ को रगड़ने लगी, पर दर्द अब आनंद में डूब गया था। प्रिया की चूत उसके लंड को हर थ्रस्ट में चूस रही थी, गीली और तेज आवाज़ें उनकी हांफती सांसों में मिल रही थीं। उसकी आँखें बंद थीं, माथे पर पसीना चमक रहा था। राहुल ने उसका मुँह फिर अपने होंठों से दबा दिया, उसकी कराहों को निगलते हुए।

प्रिया ने अचानक अपनी एड़ियों को जमीन में गड़ाया और अपने चुतड़ों को उसकी गति के साथ उठाना-गिराना शुरू किया। यह समन्वय उनकी सेक्स को एक उग्र लय में ले गया। राहुल का शरीर तनाव से भर गया, उसकी जांघों की मांसपेशियाँ कस गईं। "मैं… मैं आ रही हूँ…" प्रिया चीखी, और उसकी चूत में एक तीव्र स्पंदन शुरू हो गया, गर्म और लगातार। उसका शरीर काँपने लगा, उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

उसकी ऐंठन ने राहुल को उकसाया। उसने दो तेज, गहरे धक्के दिए और अपना सारा गर्म तरल उसकी गहराई में उड़ेल दिया। एक गहरा गुर्राहट उसके सीने से निकला। प्रिया ने उसके कंधे को दाँत से दबा लिया, उसके निकलने वाले गर्मपन को अपने अंदर महसूस करते हुए।

कुछ पलों तक वे सिर्फ हाँफते रहे, एक दूसरे से चिपके हुए। फिर राहुल ने धीरे से बाहर निकला। प्रिया की जांघों से एक गर्म धार बह निकली। वह पेड़ के सहारे सरककर बैठ गई, उसकी सांसें अभी भी तेज थीं। राहुल ने अपनी पैंट उठाई, उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर एक विचित्र शांति थी, पर आँखों में एक नया डर भी उभर रहा था। दूर से कुत्ते का भौंकना फिर सुनाई दिया। प्रिया ने अपनी साड़ी समेटी, उसकी नज़रें जमीन पर टिक गईं। "अब… अब जाना चाहिए," वह धीमे से बोली, उसकी आवाज़ में एक खालीपन था। राहुल ने हाँ में सिर हिलाया, पर उसके मन में यह सवाल घूम रहा था कि क्या यह रास्ता वाकई भटकाव था, या फिर एक ऐसा मोड़ जिससे वापसी नहीं थी।


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