गलत कॉल से जगी भाभी की दबी आग






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🔥 चाची की चूत पर देवर की नज़र: गर्मियों की एक रात, फोन पर गलती से सुन ली उसकी कराहें

🎭 गाँव की गर्मी में एक विधवा की दबी वासना। देवर की नटखट नज़रों ने जगाई आग। और फिर… एक गलत कॉल ने खोल दिया सारे राज।

👤 अवनी (28): मखमली गोरी काया, भरी हुई चूचियाँ जो सूती साड़ी में उभरी रहतीं, कमर का खिंचाव। तीन साल से दबी हुई यौन भूख, रातों को तकिया चबाती, गुप्त फंतासियों में डूबती। राहुल (25): देवर, शहर से आया, घनी देह पर चिपकी टी-शर्ट, उसकी नज़रें अवनी के चुतड़ों पर चिपकी रहतीं। छेड़छाड़ की आदत, गुप्त इच्छा कि भाभी को अपने लंड पर बिठा ले।

📍 गाँव – मध्य प्रदेश। भीषण गर्मी की रात, बिजली गुल। पंखे की आवाज, दूर कुत्तों के भौंकने। अवनी अकेली सोने जा रही, राहुल पड़ोस में। गलती से लग गया फोन, और वह लाइन पर सुनने लगी वो आवाजें…

***

अवनी ने पसीने से तर बदन पोंछा। कमरे में उमस थी, सूती साड़ी शरीर से चिपकी हुई। उसने चेहरे पर हाथ फेरा तो राहुल की नज़र याद आई – आज दोपहर कुएं पर जब वह पानी भर रही थी, उसकी गीली साड़ी से उभरे निप्पल्स पर टिकी वो नज़र। "भाभी, कपड़े गीले हो गए," उसने चुहल भरी आवाज में कहा था। अवनी ने सीने पर हाथ रखा, धड़कन तेज थी।

रात के दस बजे थे। पति की याद आई तो जांघों के बीच खिंचाव महसूस हुआ। उसने फोन उठाया, राहुल का नंबर डायल किया पंखा ठीक करवाने के बहाने। लेकिन लाइन में पहले से ही कॉल चल रहा था… और वह गलती से कनेक्ट हो गई।

"हाँ… हाँ… और जोर से," एक स्त्री की कराह सुनाई दी। अवनी की सांस रुक गई। "तुम्हारी चूची कितनी कड़क है," राहुल की गर्दन खरोंटती हुई आवाज आई। "चूस… पूरा मुंह में ले।" अवनी के होंठ सूख गए। उसने फोन कान से लगा रखा था, हाथ खुद-ब-खुद नीचे सरकने लगा। "अब गांड दिखा," राहुल की आवाज में वासना उबल रही थी। "चटक… चटक के चोदूंगा।"

अवनी की चूत में ऐंठन हुई। उसने साड़ी का पल्लू हटाया, निप्पल्स सख्त थे। फोन में आवाजें आ रही थीं – चुंबन की आवाज, चूची चूसने की, और फिर… "आह! अंदर! पूरा लंड अंदर डाल!" अवनी ने अपनी उंगलियाँ नीचे डालीं, गर्माहट महसूस की। वह राहुल के बारे में सोचने लगी – उसकी मजबूत भुजाएँ, पेट पर उभरी मांसपेशियाँ। "तुम्हारी भाभी… अवनी… उसकी चूत में कितना पानी होगा?" अचानक फोन में आवाज आई। अवनी चौंकी। वह उसके बारे में बात कर रहा था? "उसके चुतड़… कुएं पर देखे थे… कसकर भरे हुए।" अवनी की कराह निकल गई। उसकी उंगलियाँ तेज हो गईं, शरीर में आग दौड़ने लगी। "कल… कल मैं उसे छूऊंगा… गलती से," राहुल फुसफुसाया। और फिर उसकी एक लंबी कराह के साथ लाइन कट गई। अवनी कांप रही थी, जांघें गीली हो चुकी थीं। उसकी नज़र दरवाजे पर टिकी – कल?

अवनी ने सुबह की चाय बनाते हुए अपने हाथ कांपते महसूस किए। रसोई की खिड़की से राहुल आंगन में पानी से नहाता दिख रहा था। उसकी पीठ की मांसपेशियाँ पानी की धारों के साथ खेल रही थीं। अवनी की नज़र उसके नीचे उतरते पानी पर टिक गई, जहाँ उसकी निकर गीली होकर चिपकी हुई थी, एक उभार साफ दिख रहा था। उसने अपनी जीभ नीचे होंठों पर फेरी।

"चाय, भाभी?" अचानक राहुल की आवाज़ पीछे से आई। वह चौंककर मुड़ी। वह बिना कपड़ों के ऊपर के, सिर्फ़ निकर में, टॉवल गले में डाले खड़ा था। उसके बालों से पानी की बूँदें गिर रही थीं, छाती पर नम चमक थी। "आ… आ जाओ," अवनी ने धीमी आवाज़ में कहा, नज़रें नीची कर लीं।

राहुल ने चाय का प्याला उठाया। उसकी उंगलियाँ अवनी की उंगलियों से छू गईं। एक क्षण की गर्माहट। "कल रात बहुत गर्मी थी," उसने आँख मारते हुए कहा। "सोए कैसे?" अवनी ने गले को साफ़ किया। "ठीक… ठीक ही।" वह उसकी नज़रों को महसूस कर रही थी, जो उसके साड़ी के ब्लाउज के बटनों पर टिकी हुई थीं, जहाँ से स्तनों का उभार साफ़ झलक रहा था।

दोपहर को जब वह कमरे में चादरें बदल रही थी, राहुल अंदर आया। "मदद चाहिए, भाभी?" उसकी आवाज़ उसके कान के पास से गुजरी। वह झुकी हुई थी, चादर समेटते हुए। राहुल ने दूसरी तरफ़ से चादर पकड़ी। उसकी बाँहें फैलीं तो उसकी टी-शर्ट ऊपर उठ गई, पेट का सपाट हिस्सा दिखा। "तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं, भाभी," उसने धीरे से कहा। अवनी ने देखा, उसकी उंगलियाँ उसकी उंगलियों के ऊपर थीं। चादर के नीचे का यह छिपा स्पर्श। उसने अपनी उंगलियाँ हिलाई नहीं।

"मुझे लगा… कल रात कुछ आवाज़ें आ रही थीं," राहुल ने फुसफुसाया, उसके और करीब आकर। उसकी सांस अवनी की गर्दन को छू रही थी। "तुमने कुछ सुना?" अवनी का दिल जोर से धड़का। "न… नहीं।" "अच्छा हुआ," उसने कहा, और जानबूझकर आगे झुककर चादर का कोना सम्हाला। उसकी छाती अवनी की पीठ से सट गई। गर्मी। दबाव। अवनी की सांस रुक सी गई। "क्यों, कुछ था क्या?" उसने हिम्मत जुटाकर पूछा, मुड़े बिना।

राहुल ने अपना मुँह उसके कान के पास लाया। उसकी गर्म सांसें उसके कान के परों से टकराईं। "बस… एक सपना। तुम्हारे बारे में।" अवनी के जांघों के बीच एक ऐंठन सी हुई। "क… कैसा सपना?" उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई। राहुल ने अपना एक हाथ चादर से हटाकर, बिस्तर पर टिका दिया, अवनी को अपने और बिस्तर के बीच घेर लिया। "तुम पानी भर रही थीं कुएं पर। तुम्हारी साड़ी गीली थी। मैंने तुम्हारी कमर से पकड़ा… और…" वह रुका। उसका दूसरा हाथ अवनी के कूल्हे के पास, चादर पर आया। "और क्या?" अवनी ने कराहती हुई आवाज़ में पूछा, उसकी पीठ अब पूरी तरह राहुल के सीने से सट चुकी थी।

"और मैंने तुम्हारे गीले ब्लाउज के बटन खोल दिए," उसने फुसफुसाया, उसका होंठ अब सीधे अवनी के कान को छू रहा था। अवनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके निप्पल सख्त होकर कपड़े से रगड़ खा रहे थे। "फिर?" "फिर मैंने एक चूची मुँह में ले ली। तुम्हारी कराह सुनाई दी।" राहुल का हाथ अब चादर पर सरकता हुआ, अवनी की जांघ के पास आ पहुँचा। "सपना ही था न?" अवनी ने कहा, पर उसकी जांघ ने उस हाथ की ओर खुद-ब-खुद करवट ले ली।

"हाँ… सपना," उसने कहा, और अचानक अपना वजन थोड़ा और डाल दिया, अवनी को बिस्तर की तरफ दबाया। उनके शरीरों के बीच का सूती कपड़ा पतला बैरियर बनकर रह गया। अवनी ने राहुल की कलाई पकड़ ली, वह हाथ जो उसकी जांघ के करीब था। "रुको…" उसने कहा, पर उसकी पकड़ में ताकत नहीं थी। "क्यों, भाभी? डर गईं?" राहुल ने उसका कान नीचे से होंठों से छुआ। एक जलती हुई नम चुंबन सा। अवनी का शरीर तन गया। "तुमने… फोन पर जो सुना… वह सपना नहीं था न?" उसने आखिरकार सच उगल दिया।

राहुल एक पल के लिए स्तब्ध रहा, फिर उसके होंठों पर एक ख़तरनाक मुस्कान फैल गई। "और तुमने सुना सब?" उसका हाथ अब चादर के नीचे से सरककर अवनी की जांघ पर आ गया, साड़ी के पल्लू को हटाता हुआ। "हाँ," अवनी ने कराहते हुए कहा, और अपनी जांघें थोड़ी और खोल दीं। उसकी उंगलियों ने राहुल की कलाई को और दबाया, उसे अपने अंदर की गर्माहट की ओर खींचा। "तो अब… सपना सच करोगे?" उसकी सांसें तेज़ हो चुकी थीं। बिस्तर पर उनके शरीरों का दबाव बढ़ रहा था, और रसोई से आती चूल्हे की आग की तरह हवा में तनाव तप रहा था।

राहुल की सांस अवनी के कान में गर्म हवा की तरह भरी। "सपना सच करूं?" उसने उसकी जांघ पर पड़े अपने हाथ को हल्का दबाया, उंगलियां साड़ी के हल्के कपड़े के भीतर उसकी त्वचा की गर्मी तलाशने लगीं। "पर तुम्हारे होंठ 'रुको' कह रहे थे।" उसने अपनी नाक अवनी की गर्दन के पीछे घिसी, उसकी सुगंध सूंघी। नहाने के बाद का नारियल तेल और पसीने की मीठी-खट्टी महक।

अवनी ने अपना सिर पीछे झुकाया, असहाय सी, उसकी गर्दन का वक्र राहुल के लिए निमंत्रण बन गया। "होंठ झूठ बोलते हैं," उसने फुसफुसाया। उसकी एक हथेली बिस्तर पर टिकी थी, दूसरी ने राहुल की कलाई को नीचे, अपनी भीतरी जांघ की ओर खींच लिया। साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह हट चुका था, उसकी चिकनी जांघ का स्पर्श राहुल की उंगलियों को जलाता था।

राहुल ने अपना दूसरा हाथ भी आज़माया। वह हाथ जो बिस्तर पर टिका था, वह सरककर अवनी के पेट पर आया, साड़ी के ब्लाउज के नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने लगा। "यह चूची… सपने में जैसी थी?" उसने गर्दन पर हल्के दांत गड़ाते हुए पूछा। उसकी उंगलियों ने ब्लाउज के बटनों से खेलना शुरू किया। पहला बटन खुला, फिर दूसरा। ठंडी हवा का एक झोंका अवनी के उभार को छू गया, उसके निप्पल और सख्त हो गए, कपड़े के अंदर से साफ उभरने लगे।

"खुद देख लो," अवनी ने कहा, और अपने शरीर को थोड़ा मोड़कर, राहुल के हाथ को और अंदर जाने दिया। उसकी पीठ अब पूरी तरह उसके सीने से चिपकी, उसकी नम निकर का उभार उसकी कमर पर दबाव बना रहा था। राहुल ने ब्लाउज को एक तरफ किया। उसकी उंगलियों ने पहले कपड़े के भीतर ही, उसके भरे हुए स्तन का आकार लिया, फिर ब्रा के ऊपर से निप्पल को अंगूठे और तर्जनी के बीच ले लिया। एक हल्की चिकोटी।

"आह!" अवनी की कराह कमरे में गूंजी। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं, अपने सिर को राहुल के कंधे पर टिका दिया। उसकी उंगलियां अब और तेजी से राहुल की कलाई को अपनी जांघों के बीच की ओर खींच रही थीं, जहां गर्मी और नमी एक सुलगती आग की तरह जमा हो रही थी।

"कितनी कड़क है," राहुल फुसफुसाया, उसके निप्पल को मसलता हुआ। उसने अपना मुंह नीचे किया और उसकी गर्दन, कंधे की हड्डी पर गीले चुंबन लगाने लगा। हर चुंबन के साथ अवनी का शरीर एक अलग कंपन से भर जाता। उसका हाथ जो पेट पर था, वह अब ब्रा के हुक तक पहुंच गया। एक तेज झटके से उसे खोल दिया।

अवनी के स्तन ब्रा के बंधन से मुक्त होकर राहुल की हथेली में ढल गए। उसने पूरा भार महसूस किया, निप्पल को अपनी हथेली के बीच में घुमाया। "सपने से ज्यादा भारी," उसने उसके कान में गुर्राते हुए कहा। उसकी दूसरी हथेली, जो अवनी की जांघ पर थी, अब साड़ी की पेटी के अंदर सरक गई। उंगलियों ने नरम बालों का स्पर्श पाया, और उससे आगे, गर्म, स्लिपरी गुफा का मुहाना।

अवनी ने राहुल की निकर की कमर पर अपना हाथ डाला, उसे अपने ऊपर की ओर खींचा। "बस… सपना नहीं," वह हांफी। राहुल ने उसे पलटना शुरू किया, धीरे से, अपने नीचे लेटने के लिए। अवनी की पीठ अब बिस्तर से लगी, उसके स्तन खुले हवा में, निप्पल गुलाबी और तने हुए। राहुल उस पर झुका, अपने घुटनों से उसकी जांघों के बीच जगह बनाते हुए। उसकी नज़रें उसके चेहरे से होती हुईं, उसके सीने पर टिकीं, फिर नाभि की ओर भागीं जहां साड़ी की पेटी बंधी थी।

"यह गांड…" उसने कहा, अपने हाथों से उसके कूल्हों को बिस्तर में दबाते हुए, "कुएं पर मैं देखता रह जाता था।" उसने झुककर, बिना उसके होंठों को छुए, उसके ऊपर मंडराया। उनकी सांसें मिल रही थीं। अवनी ने अपनी उंगलियां उसके बालों में चलाई, उसे नीचे खींचा। "अब देख लो," वह बोली, "छू लो।"

राहुल का हाथ साड़ी की पेटी को खोलने लगा। कपड़ा ढीला हुआ। उसकी उंगलियों ने अंतिम बाधा पार की और उस कोमल, गर्म, पहले से गीली चूत को सीधे स्पर्श से जाना। अवनी की आंखें चौंधिया गईं, एक लंबी, कंपकंपी कराह उसके गले से निकली। राहुल की उंगली उसके भीतर घुसी, तंग और आग की तरह गर्म नमी ने उसे निगल लिया। "हां… यही… वही आवाज," वह बुदबुदाया, अपना मुंह अंततः उसके होंठों पर गिराते हुए। चुंबन आग का गोला था, लालसा से भरा, उनकी जीभें तुरंत एक-दूसरे से लड़ने लगीं। अवनी ने अपनी जांघें उसकी उंगली को और घेर लिया, अपनी एड़ियों से उसकी पीठ को खरोंचने लगी। बिस्तर की चादर उनके नीचे सिकुड़ रही थी, कमरे की हवा अब उमस से नहीं, बल्कि दो शरीरों के टकराव से गर्म हो रही थी।

राहुल की उंगली अवनी के भीतर एक लयबद्ध गति से चलने लगी, पहले धीरे, फिर तेज, उसकी गर्मी में खोजती हुई वह सभी गीले कोनों। उसका मुंह अवनी के होंठों से हटकर उसकी ठुड्डी, गर्दन और फिर स्तनों की ओर खिसका। उसने एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया, जीभ से उसके सख्त घेरे को चूसते हुए, दांतों से हल्का कसकर। अवनी की कराहें गहरी और लंबी होती गईं, उसकी उंगलियां राहुल के बालों में और जोर से घुस गईं, उसे अपने सीने पर दबाए रखा।

"और… अंदर… दो उंगलियां," अवनी हांफी, अपनी एड़ियों से उसकी पीठ को और खरोंचते हुए। राहुल ने आज्ञा का पालन किया। एक और उंगली ने उस तंग रास्ते में दाखिल होकर खिंचाव पैदा किया, जिससे अवनी का शरीर धनुष की तरह तन गया। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ रही थी, राहुल की उंगलियों को चूस रही थी। "तुम्हारा लंड… दिखाओ मुझे," उसने अपनी आंखें अर्ध-बंद करते हुए कहा।

राहुल ने अपना चेहरा उसके पेट पर टिकाया, गीले चुंबन उसकी नाभि की ओर बढ़ते हुए, जबकि उसकी उंगलियां अभी भी अंदर-बाहर चल रही थीं। उसने अपनी निकर की कमर पर अवनी का हाथ महसूस किया, जो अब बेसब्री से बटन खोलने की कोशिश कर रहा था। "इतनी जल्दी?" वह मुस्कुराया, उसकी त्वचा पर अपनी गर्म सांस फेंकते हुए। "पहले तो मैं इस गांड का स्वाद लूं।"

उसने अपनी उंगलियां बाहर खींचीं, और अवनी एक निराशा भरी कराह के साथ ढह गई। लेकिन राहुल ने उसे पलटने में देरी नहीं की। उसने अपने हाथों से उसके कूल्हों को पकड़ा और उसे धीरे से बिस्तर पर घुमा दिया, उसकी गांड हवा में उभर आई। साड़ी का पल्लू अब बिल्कुल हट चुका था, उसके गोल चुतड़ों पर हल्के निशान दिख रहे थे, शायद उसकी निकर के बटन के। राहुल की नजरें उस कोमल दरार पर टिक गईं, जो अब गीली और गुलाबी थी।

उसने दोनों हाथों से उसके चुतड़ों को फैलाया, अंगूठों से हल्का दबाव डाला। अवनी ने चेहरा तकिए में दबा लिया, लेकिन उसकी कमर उभारी हुई थी, एक मूक निमंत्रण। राहुल ने झुककर पहले जीभ फेरी, उस गर्म दरार के ऊपर से नीचे तक, एक लंबी, धीमी चाट। अवनी का पूरा शरीर झटके से कांप उठा। "राहुल… अरे बाप रे…" उसकी आवाज दबी हुई थी।

राहुल ने जीभ से और जोर लगाया, उस कोमल गुफा के मुहाने को चूसते हुए, उसकी सारी नमी चाट ली। फिर उसने अपनी नाक का स्पर्श वहां किया, गहराई से सूंघा, उसकी वासना की खुशबू में डूब गया। "तुम तो शहद से भी मीठी हो, भाभी," वह गुर्राया, और फिर से जीभ डुबो दी, इस बार थोड़ी और अंदर, एक घूमती, चाटती गति में।

अवनी के हाथ बिस्तर की चादर को मुट्ठियों में जकड़ चुके थे। उसकी कराहें अब लगातार थीं, एक लय में। राहुल का एक हाथ उसकी गांड को सहलाता हुआ, उसकी जांघ के भीतरी हिस्से पर आया, उसे और फैलाया। दूसरा हाथ उसकी पीठ पर सरकता हुआ, उसके ब्लाउज को पूरी तरह उतारने लगा। कपड़ा उसके कंधों से खिसका और अवनी ने अपने स्तनों को बिस्तर पर दबा दिया, रगड़ महसूस की।

"अब… लंड… अब दो," अवनी मिन्नत करने लगी, अपनी गांड को हल्का-हल्का हिलाते हुए। राहुल ने खुद को संभाला। वह खड़ा हुआ, और अवनी ने पलटकर देखा। उसने अपनी निकर उतारी, और उसका लंड, कड़ा और नसों से भरा, हवा में खड़ा हो गया। अवनी की आंखें चौड़ी हो गईं, उसकी जीभ बाहर निकलकर होंठों को गीला करने लगी।

वह वापस बिस्तर पर आया, अपने घुटनों के बल अवनी के पीछे। उसने अपने लंड को उसकी गीली चूत के मुहाने पर रखा, सिर से हल्का दबाव दिया, अंदर नहीं घुसाया, बस उसकी संवेदनशील गांठ को रगड़ा। अवनी पीछे की ओर धक्का देने लगी, लेकिन राहुल ने उसकी कमर पकड़कर रोक ली। "नहीं, भाभी… धीरे," उसने कहा, और अपना सिर आगे झुकाकर उसकी पीठ पर चुंबन लगाने लगा, जबकि उसकी गांड और उसका लंड अभी भी उस गर्म दहलीज पर टिके थे, एक दर्दनाक आनंद की पूर्वसन्ध्या में।

"धीरे, भाभी," राहुल ने गहरी, दबी हुई आवाज़ में कहा, उसकी कमर को और मजबूती से पकड़ते हुए। उसका लंड का सिरा उसकी गीली चूत के मुहाने पर दबाव बनाए हुए था, अंदर घुसने की जगह बस एक कठोर, गर्म घर्षण पैदा कर रहा था। "इतनी जल्दी कहाँ भाग रही हो? पूरा स्वाद तो लेने दो।" उसने अपने होंठ अवनी की रीढ़ की हड्डी पर रखे, हर एक मेरुदंड के उभार पर गर्म सांस फेंकी।

अवनी ने चेहरा तकिए में गड़ा दिया, एक गहरी, कष्टपूर्ण कराह उसके गले से निकली। "अंदर… डालो ना… बस," उसने मिन्नत की, अपनी गांड को हल्का-हल्का हिलाते हुए, उस कड़े लंड को अपने भीतर खींचने की कोशिश में। लेकिन राहुल ने उसे स्थिर रखा। उसने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ी रखी और दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर उसके बगल में बिस्तर पर टिका दिया, खुद को और झुकाते हुए। इससे उसका वजन अवनी पर पड़ा और उसका लंड उसकी चूत की दरार में और गहराई से दब गया, फटने की कगार पर, पर फिर भी अंदर नहीं।

"ये ले, पहले ये," उसने फुसफुसाया, और अपनी उंगली उसके होंठों तक ले गई, जो अवनी के मुंह के पास थी। अवनी ने आंखें खोलीं और उसकी उंगली को देखा, जो उसकी अपनी ही चूत की नमी से चमक रही थी। बिना कुछ कहे, उसने अपना मुंह खोला और उस उंगली को अपने भीतर ले लिया, जीभ से चूसते हुए, अपनी ही कामुकता का स्वाद चखा। राहुल की आंखें चमक उठीं। "कैसी लगती है अपनी ही चूत, भाभी?" उसने पूछा, जबकि उसकी उंगली अवनी के गर्म मुंह में थी।

अवनी ने जवाब नहीं दिया, बस उसकी उंगली को और गहराई से चूसा, अपनी आंखें बंद कर लीं। उसकी यह हरकत राहुल के लिए आखिरी धैर्य की सीमा थी। उसने अपनी उंगली बाहर खींची और अचानक अपनी जगह से हटा। अवनी ने निराशा से कराह की, लेकिन तभी राहुल ने उसे पलट दिया। अब अवनी पीठ के बल लेटी थी, उसके स्तन हवा में कांप रहे थे, निप्पल गुलाबी और सूजे हुए। राहुल उसके ऊपर आ गया, अपने घुटने उसकी जांघों के बीच में फंसा कर।

"अब देखूं?" राहुल ने कहा, अपना लंड हाथ में लेते हुए और उसके चूत के ऊपर से, उसके सारे गीलेपन को अपने डंडे पर लपेटते हुए। अवनी ने उसकी कलाइयां पकड़ लीं, उसकी आंखों में एक तीव्र इच्छा थी। "हां… अब… अब देख लो," वह बोली।

राहुल ने अपने लंड का सिरा सही जगह पर टिकाया और आखिरकार, एक धीमे, जानबूझकर किए गए धक्के में, थोड़ा सा अंदर प्रवेश किया। अवनी की आंखें फैल गईं, उसके मुंह से एक लंबी 'ओह' निकली, जो हवा में लटक गई। वह तंग थी, बहुत तंग, और राहुल को रुकना पड़ा, बस पहली गांठ तक। "कितनी… गर्म हो तुम अंदर से," वह हांफा, अपने सिर को पीछे झुकाते हुए, उस संवेदना में खो जाते हुए।

"पूरा… सारा… ले लो," अवनी ने कहा, अपनी एड़ियों से उसकी कमर को खींचते हुए। राहुल ने धीरे से और धक्का दिया, एक इंच, फिर दूसरा। हर इंच के साथ अवनी का शरीर उसे चूसता, समेटता चला गया। उसकी आंखें अब आधी बंद थीं, होंठ सूजे हुए, सांसें तेज और अनियमित। राहुल ने पूरा अंदर जाने से पहले ठहराव लिया, बस उसकी चूत के भीतर धड़कते हुए, उसकी गर्मी में सनकर। उसने झुककर उसके एक निप्पल को मुंह में ले लिया, एक लंबा, गहरा चुस्की ली, जिससे अवनी का शरीर झटके से ऊपर उठा और उसने अनजाने में राहुल को और अंदर खींच लिया।

"आह! हां… ऐसे ही," अवनी कराह उठी, उसके हाथ अब उसकी पीठ पर दौड़ रहे थे, नाखूनों से हल्के निशान बनाते हुए। राहुल ने चूसना जारी रखा, एक हाथ से उसके दूसरे स्तन को मसलते हुए, और धीरे-धीरे अपने कूल्हों को पीछे खींचा, फिर आगे किया। गति अभी भी धीमी, यातनापूर्ण रूप से नियंत्रित थी। हर बार वह पूरी तरह बाहर आता, बस लंड का सिरा ही अंदर रहता, और फिर एक लंबे, रसीले धक्के में वापस उसकी गहराई में समा जाता।

"तेज… और तेज, राहुल," अवनी ने मिन्नत की, उसके कंधों को पकड़कर खुद को उस पर झोंकते हुए। लेकिन राहुल ने उसकी गति को नहीं बढ़ाया। उसने अपना मुंह उसके निप्पल से हटाया और उसके होंठों को देखा। "नहीं, भाभी। यह तो बस शुरुआत है। मैं तो पूरी रात तुम्हारी इस चूत को चोदूंगा।" यह कहकर उसने एक अलग कोण से धक्का दिया, जिससे अवनी की आंखें चौंधिया गईं। उसने उसकी एक जांघ को अपने कंधे पर रख लिया, उसे और चौड़ा किया, और गहराई और भी बढ़ गई। अब हर धक्का एक नई, तीव्र संवेदना लाता, और अवनी की कराहें कमरे की दीवारों से टकराने लगीं, जो उसकी अपनी ही वासना की गूंज से भर गई थीं।

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राहुल की इस नई स्थिति ने अवनी के भीतर एक ऐसी गहराई छुई जिसका उसे अहसास भी नहीं था। उसकी एक जांघ आकाश की ओर उठी हुई थी, दूसरी बिस्तर पर टिकी, जिससे उसकी चूत पूरी तरह खुल गई और राहुल का लंड हर बार उसकी सबसे संवेदनशील जगह से टकराने लगा। "अरे… यह क्या…" अवनी की आवाज़ एक लंबी कराह में डूब गई क्योंकि राहुल ने लयबद्ध धक्के देना शुरू कर दिया, अब धीमे नहीं, बल्कि एक दमदार, दृढ़ गति से।

उसकी हर थ्रस्ट के साथ बिस्तर की पाये चरमरा उठती। अवनी के हाथों ने चादर को और मजबूती से पकड़ लिया, उसकी उंगलियों के जोड़ सफेद पड़ गए। राहुल ने झुककर उसके होंठों को अपने में कैद किया, उनकी जीभों का युद्ध अब और उग्र हो चला था। वह उसकी लार पीता, उसकी हर कराह को अपने मुंह में समेटता। उसका एक हाथ अवनी के उठे हुए स्तन पर मौजूद था, निप्पल को उंगलियों के बीच दबाते हुए, जबकि दूसरा हाथ उसकी गांड को सहलाता हुआ, उसके चुतड़ों के मांसल हिस्से को कसकर पकड़ता।

"मुझे… मुझे पीछे से देखो," अवनी ने हांफते हुए कहा, उसकी इच्छा अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी। राहुल ने उसकी जांघ को नीचे किया और उसे फिर से पलट दिया। अवनी ने घुटनों के बल होकर अपनी गांड हवा में उठाई। यह नज़ारा राहुल के लिए बर्दाश्त से बाहर था। उसने दोनों हाथों से उसके चुतड़ फैलाए, उसकी गुलाबी, गीली चूत और उससे आगे के संकरे छिद्र को देखा। "कितना हसीन नज़ारा है, भाभी," वह बुदबुदाया और अपने लंड को फिर से उसकी चूत के द्वार पर टिका दिया।

इस बार कोई रुकावट नहीं थी। एक जोरदार धक्के में वह पूरी लंबाई के साथ अंदर घुस गया। अवनी चीख उठी-आनंद और उपभोग से भरी एक तीखी चीख। राहुल ने तुरंत एक तेज़ लय पकड़ी, उसकी गांड से टकराते हुए, उसकी चूत के भीतर से गीली आवाज़ें निकल रही थीं। उसने आगे झुककर उसकी पीठ पर पसीने के मोती चाटे, उसके कंधे पर दांत गड़ा दिए।

"हां… ऐसे ही… मारो… पूरा चोदो," अवनी गाली देती हुई कराह रही थी, उसका सिर लटका हुआ, बाल चिपके हुए। उसकी चूत अब पूरी तरह उसके लंड के आकार के अनुरूप ढल चुकी थी, हर धक्के पर उसे चूसती हुई। राहुल का सांस लेना भी भारी हो गया। उसने अपनी गति और तेज़ कर दी, उसकी जांघों के थप-थप की आवाज़ कमरे में गूंजने लगी। उसका एक हाथ उसकी कमर पर कसा हुआ था, दूसरा उसके बाल पकड़कर उसका सिर पीछे की ओर खींच रहा था।

"बोलो… किसकी चूत है यह?" राहुल नहीं रुका, उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

"तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी, राहुल!" अवनी चिल्लाई।

"और यह लंड?"

"मेरा… सिर्फ मेरा!"

यह स्वीकारोक्ति सुनते ही राहुल के शरीर में एक तीव्र कंपन दौड़ा। उसने और जोर लगाया, और गहराई से धंसा। अवनी को लगने लगा कि उसके पेट के निचले हिस्से में एक अजीब सी गर्म लहर इकट्ठा हो रही है, फैल रही है। उसकी कराहें टूटने लगीं, उसकी आंखें पलकों के पीछे घूमने लगीं। "मैं… मैं आ रही हूं…" वह चीखी।

उसकी चूत में तेज़ सिकुड़न शुरू हुई, एक लहरदार संकुचन जिसने राहुल के लंड को जकड़ लिया। यह संवेदना असहनीय थी। राहुल ने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया, अपना सिर पीछे खींचा और एक गर्जनाकार कराह के साथ उसके भीतर सारा ताप उड़ेल दिया। उसका गर्म स्खलन अवनी की गहराइयों में भरता गया, हर झटके के साथ। अवनी का शरीर बार-बार ऐंठता रहा, उसकी चीखें धीरे-धीरे कराहों में बदल गईं।

थोड़ी देर बाद, दोनों ही स्तब्ध, पसीने से तरबतर, एक-दूसरे पर गिरे हुए थे। राहुल ने धीरे से अपना लंड बाहर निकाला, और अवनी कराह उठी। वह उसके बगल में गिर गया, सांस भर रहा था। कमरे में केवल उनकी हांफने की आवाज़ें थीं और दूर से टिमटिमाते दीये की लौ।

अवनी ने आंखें खोलीं और छत को देखने लगी। उसके भीतर की गर्मी धीरे-धीरे ठंडी पड़ रही थी, पर एक नया भारीपन, एक गहरा अपराधबोध उभरने लगा। उसने राहुल की ओर देखा, जो पहले से ही उसे देख रहा था। उसकी आंखों में संतुष्टि थी, लेकिन एक सवाल भी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल को छुआ। "अब…" अवनी ने फुसफुसाया, "अब क्या होगा?"

राहुल ने उसकी उंगली पकड़ ली और होठों से छुआ। "जो होगा, देखा जाएगा, भाभी। लेकिन आज की रात… सिर्फ हमारी है।" वह बोला, और उसने उसे अपनी बांहों में समेट लिया। बाहर, गाँव में सन्नाटा पसरा था, और अन्दर, दो शरीरों की गर्माहट के बीच, एक नया रिश्ता जन्म ले रहा था-निषिद्ध, गहरा, और अब हमेशा के लिए बदल चुके जीवन का साक्षी।


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