चाचा और भतीजी






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🔥 पगडंडी पर छुपी वो रात, जब चाचा ने भतीजी को चूत मारने की ठानी

🎭 गाँव की सूनी सड़क पर, चाचा और भतीजी के बीच छुप-छुप कर फिसलते हाथों का खेल। दोनों के मन में उबलती वासना, पर सामने खड़ा है रिश्ते का डर। क्या इस बार छुपकर मिलने का मौका हाथ लगेगा?

👤 राधा (18): हल्की गोरी, कमर से ऊपर उभरे स्तन, कसी हुई गांड। स्कूल जाने का बहाना करके चाचा से मिलने की भूख। विजय (42): दबंग शरीर, घनी दाढ़ी, आँखों में भतीजी के निप्पलों को नोचने की चाह। गाँव के सरपंच का बेटा होने का गुमान।

📍 शाम का समय, गाँव के बाहर खेतों के बीच बनी कच्ची पगडंडी। हवा में उड़ती धूल, दूर से आती घंटियों की आवाज। राधा किताबें लेकर जा रही है, विजय उसे रोक लेता है।

विजय ने राधा की कलाई पकड़ी। "कहाँ भाग रही है इतनी जल्दी?" उसकी उंगलियाँ राधा की नरम त्वचा पर रेंगने लगीं। राधा ने सिर झुकाया, पर उसकी चूची सख्त हो चुकी थी। "चाचा जी… कोई देख लेगा।" विजय ने उसे खींचकर नीम के पेड़ के पीछे किया। उसकी सांसें तेज थीं। "तुझे पता है मैं कितने दिन से तेरे स्तनों को देख रहा हूँ?" राधा काँप उठी, पर उसकी चूत गीली होने लगी। दूर कुत्ते भौंके। विजय ने धीरे से उसकी कमीज उठाई। "आज तो तुझे चूत में लंड लेना ही पड़ेगा।"

विजय की उंगलियों ने राधा की कमीज के बटन खिसकाने शुरू किए। "चाचा… नहीं," राधा ने कहा पर उसकी आवाज़ दबी थी। पहला बटन खुला और उसकी चूची की नोक झलकी। हवा का झोंका उसके निप्पलों पर पड़ा तो वे और कड़े हो गए। विजय ने अंगूठे से उस नोक को घुमाया। "इतनी सख्त हो गई है… तू भी तो चाहती है।" राधा ने आँखें मूंद लीं, उसके मन में डर और चाहत की लड़ाई चल रही थी।

दूसरा बटन खुला और राधा का स्तन पूरा बाहर आ गया। विजय ने मुँह झुकाकर उसके भूरे निप्पल को अपने होंठों से दबाया। राधा के मुँह से एक हल्की कराह निकली। उसने चाचा के बालों में हाथ फंसा दिए, खींचे नहीं, बस टिका दिए। विजय की जीभ ने उस निप्पल के चारों ओर चक्कर लगाया, फिर उसे चूसना शुरू किया। "आह… चाचा जी…" राधा की सांस फूलने लगी। उसकी चूत में एक गर्म सनसनी दौड़ गई।

विजय ने दूसरे स्तन को हथेली में लेकर मसलना शुरू किया। उसकी दाढ़ी राधा की नाजुक त्वचा पर रगड़ खा रही थी। "तू मेरी है आज," वह बुदबुदाया। उसने राधा की स्कर्ट पर हाथ फेरा, उसकी गांड के उभार को कसकर दबाया। राधा ने अपनी जांघें सिकोड़ लीं, पर विजय का हाथ उसकी जांघों के बीच तक पहुँच गया। कपड़े के ऊपर से ही, उसने उसके चूत के गर्म उभार पर अंगूठा घुमाया। राधा का शरीर झटके से तन गया।

"इधर देख," विजय ने उसका चेहरा अपनी ओर मोड़ा और उसके होंठों को चाटते हुए कहा, "तेरे होंठ भी तो काँप रहे हैं।" उसने राधा के निचले होंठ को अपने दांतों से हल्का सा कसा। राधा की आँखों में पानी आ गया, वह कारण समझ नहीं पा रही थी। विजय ने उसकी आँखों के आंसू चाट लिए और फिर उसके कान में फुसफुसाया, "डर मत… कोई नहीं आएगा। बस तू मेरे लिए खोल दे अपनी चूत।"

उसने राधा की स्कर्ट का हुक खोल दिया। कपड़ा ढीला हुआ और राधा ने अपनी जांघें और जोर से बंद कर लीं। "रुको… मैं…" वह हाँफने लगी। विजय ने उसे नीम के तने से सटाकर खुद उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसकी सांसें राधा की नंगी जांघों पर टकरा रही थीं। "बस एक बार देखने दें," उसने कहा और उसकी जांघों को हल्के से खींचा। राधा का शरीर थोड़ा ढीला पड़ गया, समर्पण की एक क्षणिक लहर दौड़ गई।

विजय की उंगलियों ने स्कर्ट के किनारे को और खींचा। राधा की सफेद जांघें पूरी तरह खुल गईं, उसकी चड्डी के काले किनारे से गीलेपन का धब्बा दिखाई दिया। "अरे… पूरी गीली हो गई है तो," विजय ने गले में खराश भरी आवाज़ में कहा। उसने अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच और करीब लाया, उसकी सांसों की गर्मी राधा की चूत के ऊपर के कपड़े को भिगोने लगी। राधा ने अपनी हथेलियाँ नीम के खुरदुरे तने पर दबाईं, एक लंबी सांस ली।

विजय ने अंगूठे से उसकी चड्डी का किनारा नीचे सरकाया। राधा के शरीर में एक झटका दौड़ गया। "चाचा… वादा करो किसी को नहीं बताओगे," उसने आँखें मूंदकर फुसफुसाया। "वादा," विजय ने कहा और उसकी चूत के ऊपर के बालों को हल्के से सहलाया। फिर उसने अपनी जीभ का पहला स्पर्श दिया – गर्म, नम, और चौड़ा। राधा के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली। उसने अपनी एड़ियाँ जमीन में गड़ा दीं।

विजय की जीभ ने उसके भीतरी होंठों के बीच का रास्ता तलाशा, धीरे-धीरे चाटते हुए। राधा का सिर पीछे की ओर झटका, उसकी सांसें तेज और खंडित हो गईं। "आह… हम्म…" वह बुदबुदाई। विजय ने एक हाथ से उसकी गांड को कसकर पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा, ताकि उसकी चूत और गहराई से चाटी जा सके। नमकीन स्वाद और गर्म गंध ने विजय के लंड को और सख्त कर दिया।

थोड़ी देर तक सिर्फ चाटने की आवाज़ और राधा की दबी कराहें हवा में मिलीं। फिर विजय ने अपनी दो उंगलियाँ उसकी चूत के द्वार पर रखीं। वहाँ पहले से ही गीलापन था। उसने धीरे से दबाव डाला। राधा का शरीर फिर से तन गया। "आराम से," विजय ने उसकी जांघ चूमते हुए कहा। उंगलियाँ अंदर घुसीं – एक, फिर आधी दूसरी। राधा ने अपना मुँह खोला, एक लंबी कराह हवा में छूट गई। अंदर की गर्मी और कसाव ने विजय को चक्कर सा दे दिया। उसने उंगलियाँ हिलाना शुरू किया, धीमी गति से, अंदर-बाहर।

"तू… तू कितनी तंग है," वह हाँफता हुआ बोला। राधा की आँखें अब भी बंद थीं, उसके गाल लाल हो चुके थे। विजय ने उंगलियों की गति बढ़ाई। राधा का एक हाथ अचानक उसके सिर पर आ गया, उसके बालों में उलझ गया। वह उसे खींचने लगी, नहीं, बस पकड़े रही, जैसे डूबते हुए को सहारा मिल गया हो। विजय ने अपना मुँह फिर उसकी चूत पर लगाया, जीभ से उसके ऊपरी हिस्से को दबाया, जबकि उंगलियाँ अंदर चलती रहीं। राधा का शरीर एकदम से काँप उठा। उसकी सांस रुक सी गई। फिर एक लहर दौड़ी, उसकी जांघें विजय के सिर को जकड़ लीं, उसकी चूत सिकुड़ी और गर्म तरल की कुछ बूंदें विजय की उंगलियों पर टपकीं। वह कराहती हुई, थककर तने से सट गई।

विजय ने अपनी उंगलियाँ धीरे से बाहर खींचीं, उन पर चमकती हुई नमी देखकर मुस्कुराया। राधा अभी भी हाँफ रही थी, उसकी आँखें भारी थीं। विजय खड़ा हुआ और उसने राधा को अपने सीने से लगा लिया। उसकी दाढ़ी उसके कान को छूने लगी। "अब तैयार है?" उसने कान में फुसफुसाया।

राधा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना चेहरा उसकी गर्दन में छुपा दिया। विजय का हाथ उसकी पीठ पर फिरा, फिर नीचे सरककर उसकी गांड के निचले हिस्से को कसकर दबाया। उसने अपनी जांघों के बीच राधा को खींचा, ताकि वह अपने लंड के कड़े उभार को महसूस कर सके। राधा का शरीर ऐंठ गया। "चाचा… यह…"

"बस एक बार," विजय ने कहा, उसकी स्कर्ट को और नीचे खिसकाया। अब राधा की नंगी गांड हवा के संपर्क में थी। उसने अपना लंड अपने पैंट से बाहर निकाला और उसे राधा की गर्म जांघों के बीच रख दिया। रगड़ की गर्माहट ने दोनों को एक साथ कराहने पर मजबूर कर दिया।

विजय ने राधा का चेहरा उठाया और उसके भरे हुए होंठों को चूसना शुरू किया। इस बार राधा ने भी जवाब दिया, अपनी जीभ हल्की सी बाहर निकालकर। उनकी सांसें गर्म और उलझी हुई थीं। विजय का हाथ उसकी गांड के बीच में घुसा, उंगली फिर से उसकी गीली चूत के द्वार पर चली गई। राधा ने अपनी जांघें खोल दीं, एक खोखली कराह के साथ।

"अब डर मत," विजय बुदबुदाया और अपने लंड की नोक को उसकी चूत के छिद्र पर टिका दिया। दबाव ने राधा की आँखें खोल दीं। वह विजय की आँखों में देखने लगी, डर और चाहत का एक अजीब मिश्रण। विजय ने धीरे से धक्का दिया। एक इंच अंदर घुसते ही राधा का मुँह खुल गया, दर्द और भराव की एक चीख दब गई। विजय रुक गया, उसने उसके निप्पल को मरोड़ा, ताकि उसका ध्यान बंटे। फिर धीरे-धीरे, एक और इंच आगे बढ़ा।

राधा की सांसें रुक रुक कर निकल रही थीं। अंदर की तंग गर्मी विजय को पागल कर रही थी। उसने उसे और कसकर पकड़ा और पूरी गति से अंदर धकेल दिया। राधा चिल्लाई, पर विजय के होंठों ने उसकी चीख को चूस लिया। वह अंदर पूरा घुस गया था। दोनों एक पल के लिए जमे रहे, सिर्फ सांसों का आदान-प्रदान और शरीरों का काँपना।

विजय ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया, हर धक्के के साथ राधा की कराह हवा में गूंजती। उसने उसकी गांड को और कसकर पकड़ा, उसे अपनी ओर खींचते हुए हर मूवमेंट को गहरा किया। राधा की आँखें फिर से बंद हो गईं, उसके होंठ काँप रहे थे। "धीरे… अहह," वह फुसफुसाई, पर उसका शरीर उसके साथ ताल मिलाने लगा।

विजय की सांसें उसके कान पर गर्म होकर टकराईं। "तेरी चूत… कितनी गर्म है," वह बुदबुदाया, अपनी गति थोड़ी तेज करते हुए। उसने एक हाथ उठाकर राधा के उलझे बालों को सहलाया, फिर उसकी गर्दन पर नम चुंबन रखे। राधा ने अपना सिर पीछे झुकाया, विजय के होंठों को अपनी नसों पर महसूस किया। उसकी चूत में एक नई सनसनी उभरने लगी-दर्द अब आनंद में बदल रहा था।

अचानक दूर से किसी के खाँसने की आवाज आई। दोनों एकदम जम गए। विजय का लंड अभी भी अंदर था, राधा की चूत सिकुड़ गई। "चुप," विजय ने उसके कान में फुसफुसाया, उसकी पीठ को थपथपाया। आवाज दूर चली गई। इस डर ने उनकी वासना को और भड़का दिया। विजय ने फिर से हिलना शुरू किया, इस बार और ज़ोर से, जैसे किसी ने उसके भीतर का जानवर छोड़ दिया हो।

राधा ने अपना मुँह विजय के कंधे में दबा लिया, ताकि उसकी कराहें दबी रहें। उसकी उंगलियाँ उसकी पीठ में घुस गईं। विजय ने उसे पेड़ से हटाकर खुद नीचे लेटने का इशारा किया। राधा समझ गई। धीरे से, अभी भुजाओं में लिपटे हुए, वह नीम की जड़ों के पास घास पर लेट गई। विजय उसके ऊपर आ गया, उसकी टांगों को और फैलाया। "अब पूरा देखूंगा," उसने कहा और फिर से अंदर घुसा।

इस नई पोजीशन में गहराई और बढ़ गई। राधा की आँखें खुली रह गईं, आकाश में धीरे-धीरे उभरते तारे देखते हुए। विजय का हर धक्का उसे घास में दबा रहा था। उसने राधा के एक स्तन को मुँह में ले लिया, चूसते हुए हल्के दांतों से कसा। राधा का शरीर फिर से उस चरम की ओर बढ़ने लगा, एक जानी-पहचानी गर्म लहर उसकी चूत के भीतर जमा हो रही थी। विजय ने अपनी गति बढ़ा दी, उसकी हाँफती सांसें राधा के चेहरे पर पड़ रही थीं। "साथ आ… मेरे साथ," वह हाँफता रहा।

राधा ने आकाश में तारों को धुंधली आँखों से देखा, उसकी चूत में विजय का हर धक्का उसे ज़मीन में गड़ा रहा था। विजय का मुँह उसके दूसरे स्तन पर चला गया, निप्पल को जीभ से घेरकर चूसने लगा। राधा की कराहें अब दबी नहीं, खुलकर निकलने लगी थीं। "ओह… चाचा… वो आ रहा हूँ…" वह हाँफती हुई बुदबुदाई।

विजय ने गति और तेज़ कर दी, उसकी गांड की मांसपेशियाँ तनकर कस गईं। "मुझे भी… साथ आने दें," उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई। राधा ने अपनी एड़ियाँ घास में गड़ा दीं, उसकी पीठ एक धनुष की तरह उठी। उसकी चूत में तेज़ सिकुड़न शुरू हुई, गर्मी की एक लहर ने विजय के लंड को घेर लिया। विजय का सिर पीछे झटका, एक गहरी गुर्राहट उसके गले से निकली। उसने राधा को कसकर अपने में समेट लिया और गर्म तरल का सैलाब उसकी चूत के भीतर छोड़ दिया।

कुछ पलों तक दोनों स्थिर पड़े रहे, सिर्फ उनके सीने एक-दूसरे से टकरा रहे थे। फिर विजय धीरे से बाहर निकला। राधा ने अपनी जांघें बंद कर लीं, एक अजीब सी खालीपन महसूस करते हुए। विजय उसके बगल में घास पर लेट गया, सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। उसने राधा का हाथ पकड़ा, उंगलियाँ आपस में फंसा लीं।

थोड़ी देर बाद विजय ने अपना कुर्ता उठाया और राधा के पेट और जांघों पर बची गीली चिपचिपाहट को पोंछा। राधा ने आँखें मूंद लीं, शर्म और संतुष्टि का एक मिश्रण उसके चेहरे पर तैर रहा था। "किसी को पता नहीं चलेगा ना?" उसने फुसफुसाया।

"कभी नहीं," विजय ने कहा, उसके माथे पर एक पसीने की बूंद को अंगूठे से साफ किया। दूर से ट्रैक्टर की आवाज आई। विजय तुरंत सतर्क हो गया। "उठो, अब चलना चाहिए।"

राधा ने धीरे से अपनी स्कर्ट और कमीज ठीक की। उसके कपड़े अभी भी उलझे हुए थे, बालों में घास फंसी थी। विजय ने उसे खड़ा होने में मदद की। वह थोड़ा लड़खड़ाई। विजय ने उसे अपनी बाँहों में सहारा दिया, एक क्षण के लिए उसके होंठों को हल्का सा चूसा। "कल शाम… इसी जगह," वह चुपचाप बोला।

राधा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस सिर हिलाया। फिर वह किताबें उठाकर तेज कदमों से पगडंडी पर चल पड़ी, पीछे मुड़कर नहीं देखा। विजय नीम के पेड़ के सहारे खड़ा रहा, उसकी आँखों में संतुष्टि की एक चमक थी। हवा में अब भी उनके मिलन की गंध तैर रही थी।

राधा के जाने के बाद विजय वहीं नीम के पेड़ के सहारे कुछ पल खड़ा रहा, उसके लंड पर अभी भी उसकी चूत की गर्मी और गंध चिपकी थी। उसने धीरे से अपना पैंट ठीक किया, मन में एक विजयी भावना घुमड़ने लगी। पर अचानक उसे एहसास हुआ-राधा की चड्डी का काला फीता घास पर पड़ा था। वह तुरंत उसे उठाकर जेब में छुपा लिया, दिल की धड़कन तेज हो गई।

अगले दिन शाम को राधा फिर उस पगडंडी पर आई, पर इस बार उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। विजय ने उसे देखते ही खींचकर पेड़ के पीछे लिया। "क्या हुआ?" उसने पूछा, उसकी उंगलियाँ राधा की कमर पर रेंगने लगीं। राधा ने सिर झुकाया, "माँ ने पूछा कल देर से आने का कारण… मैं डर गई।" उसकी आवाज़ काँप रही थी।

विजय ने उसका चेहरा उठाया, "तू चिंता मत कर।" उसने उसके होंठों को अपने से सटा दिया, जीभ से दबाव डाला। इस बार राधा का जवाब उत्साही नहीं, सहमा हुआ था। विजय ने उसकी कमीज उठाई, उसके स्तनों को हथेलियों से दबाया। निप्पल सख्त थे, पर राधा का शरीर तनाव से भरा हुआ। "आज तू पूरी तरह मेरी है," विजय ने कान में फुसफुसाया और उसे घास पर लिटा दिया।

उसने राधा की स्कर्ट उतार फेंकी, चड्डी के बिना उसकी चूत सीधे खुली हुई थी। हवा का झोंका लगते ही राधा सिहर उठी। विजय ने अपना लंड नंगा किया और बिना किसी और foreplay के सीधे उसकी चूत के द्वार पर टिका दिया। राधा ने आँखें मूंद लीं, एक आह भरी। विजय ने धक्का दिया-एक ही बार में पूरा अंदर घुस गया। राधा चिल्लाने ही वाली थी कि विजय ने उसका मुँह हथेली से दबा लिया।

"चुप रह… कोई सुन लेगा," वह गुर्राया और तेज गति से चलने लगा। राधा की चूत पहले से ही गीली थी, पर उसकी कराहें दर्द और मजबूरी से भरी हुई। विजय ने उसकी टाँगें और फैलाई, हर धक्के में उसकी गांड घास पर रगड़ खाती। उसने राधा के एक स्तन को मुँह में ले लिया, निप्पल को दाँतों से कसकर काटा। राधा के आँसू आँखों से बह निकले।

थोड़ी देर में विजय की गति और तेज़ हो गई, उसकी सांसें फूलने लगीं। राधा का शरीर अब उसके साथ ताल छोड़ रहा था, वासना ने डर पर जीत पा ली थी। उसकी चूत सिकुड़ने लगी, एक गहरी गर्मी उभरने लगी। "मैं आ रही हूँ…" वह हाँफती हुई बुदबुदाई। विजय ने एक अंतिम ज़ोरदार धक्का दिया, अपना सारा तरल उसकी गहराई में उड़ेल दिया। उसके बाद वह उस पर गिर पड़ा, दोनों की सांसें एक दूसरे में घुल रही थीं।

कुछ मिनटों तक सन्नाटा रहा। फिर विजय उठा और बिना एक शब्द कहे अपने कपड़े संभालने लगा। राधा ने धीरे से अपनी स्कर्ट पहनी, उसकी आँखें नम थीं। "चाचा… यह आखिरी बार था ना?" उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी। विजय ने मुड़कर देखा, उसकी आँखों में एक क्षणिक पश्चाताप झलका, फिर वह दबंगपन से बोला, "जब मैं कहूँगा, तब आएगी।" वह चला गया, पीछे राधा को टूटी हुई घास पर बैठा छोड़कर।

राधा ने आकाश में उगते चंद्रमा को देखा, उसकी चूत में अभी भी उसके वीर्य की गर्माहट टपक रही थी। उसने अपने घुटनों को सीने से लगा लिया, एक गहरी, दबी हुई सिसकी उसके गले से निकल पड़ी। पगडंडी सूनी थी, पर अब उस पर चलना हमेशा के लिए बदल चुका था।


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