🔥 **साली की चूत पर मेरी नज़र: ब्यूटी पार्लर बहाना, वासना मंज़िल**
🎭 **टीज़र**
गाँव की सीमित रंगत में एक नया ब्यूटी पार्लर खुलता है। पर यह तो बस एक पर्दा है, एक बहाना है उस गहरी, दबी हुई वासना के लिए जो चाचा और भाभी के बीच सुलग रही है। हर मसाज का स्पर्श एक सवाल बन जाता है, हर नज़र एक जवाब ढूंढती है।
👤 **किरदार विवरण**
**राजेश (35)**: दबंग, गाँव का नया नाई। उसकी मजबूत बाहें और गहरी नज़रें हर औरत को अंदर तक महसूस कराती हैं। उसकी छिपी भूख गाँव की सबसे मासूम चेहरे वाली औरत, अपनी ही भाभी के लिए है।
**प्रिया (22)**: भाभी, कोमल शरीर, उभरे हुए स्तन और एक डरा हुआ मन। शादी के बाद भी उसके अंदर की वासना सोई पड़ी है, जो राजेश की नटखट नज़रों से जागने लगी है।
📍 **सेटिंग/माहौल**
गर्मी की दोपहर, गाँव का नया ब्यूटी पार्लर। पंखे की आवाज़ और बाहर सन्नाटा। अंदर बस दो लोग… और एक गहरा सन्नाटा जो चीख़ रहा है।
🔥 **कहानी शुरू**
"भाभी, आज हाथ पर हल्की मालिश कर दूँ? तनाव दूर हो जाएगा।" राजेश की आवाज़ में एक मिठास थी, एक खिंचाव। प्रिया ने हाँ में सिर हिलाया। उसकी कलाई पर उसकी उँगलियाँ रेंगने लगीं, धीरे-धीरे। गर्माहट फैल रही थी। "इतना नर्म हाथ… गाँव की मिट्टी में भी कैसे बचा लिया?" उसकी उँगलियाँ कोहनी तक पहुँच गईं। प्रिया की साँसें तेज़ हुईं। वह जानती थी यह गलत है, पर उसका शरीर तो मानने को तैयार नहीं था। राजेश की नज़रें उसके गले की नसों पर थीं, फिर नीचे स्तनों की ओर सरकीं। एक पल के लिए उसकी नज़र उसकी चूची पर ठहर गई, कपड़े के भीतर उभार साफ़ दिख रहा था। प्रिया ने आँखें मूँद लीं। उसकी उँगलियाँ अब कंधे पर थीं, गर्दन के पास। हल्का दबाव… फिर एक कसाव। वह कराह उठी। "चाचा…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "होने दो भाभी, आराम करो।" उसका हाथ पीठ पर सरकने लगा, रीढ़ की हड्डी के नीचे। वहाँ… जहाँ से एक गर्म लहर उठकर सीधे उसकी चूत तक जा रही थी। बाहर किसी के चलने की आहट हुई। दोनों जम गए। राजेश का हाथ ठहर गया, पर हटाया नहीं। प्रिया की जाँघों के बीच एक अजीब सी गीली गर्मी फैलने लगी। खिड़की से आती हवा भी उसकी गरमाई को नहीं ठंडा पा रही थी। डर था… पर उस डर में एक रोमांच भी था। राजेश ने धीरे से कान के पास अपना मुँह लाया। "कल फिर आना… कोई नया हेयर स्टाइल ट्राई करेंगे।" उसकी साँस प्रिया के कान को छू गई। प्रिया काँप गई। उसने बस इतना ही कहा, "हाँ… चाचा।" और फिर वहाँ से उठकर चली गई, अपने शरीर में सुलगते एक नए अंगारे को लिए हुए। राजेश उसे जाते हुए देखता रहा… उसकी गांड के हिलने के अंदाज़ पर। एक गहरी साँस ली। खेल अब शुरू हुआ था।
अगले दिन का सूरज और भी तेज़ लग रहा था। प्रिया ने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी थी, जो उसके कोमल घेरों पर बारीक से चिपक रही थी। ब्यूटी पार्लर का दरवाज़ा खोलते हुए उसकी साँसें फिर वैसी ही तेज़ थीं। "आ जाओ भाभी, तुम्हारा इंतज़ार था," राजेश ने दबी आवाज़ में कहा, उसकी नज़रें सीधे उसके कमर से ऊपर उभारों पर टिक गईं। उसने हेयर कलर का एक बॉक्स टेबल पर रखा। "बैठो, पहले बाल गीले करने हैं।"
प्रिया कुर्सी पर बैठी। राजेश ने उसके घुंघराले बालों को पानी से भीगोया। उसकी उँगलियाँ स्कैल्प में घूमने लगीं, हल्के से दबाते हुए। "तनाव यहाँ भी है… देखो," उसने कहा और अंगूठे से उसके गर्दन के पीछे के नर्म हिस्से को दबाया। प्रिया की आँखें झपक गईं। उसका सिर पीछे की ओर झुक गया, बाल गीले होकर कंधों पर चिपक रहे थे। राजेश का हाथ उसकी गर्दन पर सरकता हुआ, आगे की ओर बढ़ा। उसकी अंगुलियों के पोर उसके गले की नन्ही नसों को छू रहे थे, फिर हल्का सा नीचे… कोलरबोन की हड्डी तक। "चाचा…" प्रिया की आवाज़ एक फुसफुसाहट थी। "शhh… बस आराम करो," राजेश ने कान के पास से कहा, उसका शरीर अब उसके पीछे इतना झुक गया था कि उसकी छाती प्रिया की पीठ को छू रही थी।
उसने हेयर कलर लगाना शुरू किया, लेकिन उसका हर स्ट्रोक जानबूझकर लंबा खिंच रहा था। ब्रश कान के पीछे से होता हुआ, गर्दन पर, फिर पीठ के ऊपरी हिस्से तक… जहाँ साड़ी का ब्लाउज खत्म होता था। एक बूंद रंग की उसकी त्वचा पर गिरी और नीचे सरकने लगी। राजेश ने अपनी उँगली से उसे रोका। उँगली ने उस रास्ते को ट्रेस किया जो ब्लाउज के नीचे छिपे हुए कश की ओर जाता था। प्रिया ने अपनी जाँघें आपस में दबा लीं। उसकी चूत में एक हल्की सी खुजलाहट सी उठी।
"अब थोड़ी देर बैठो, कलर सेट होने दो," राजेश बोला और एक स्टूल खींचकर उसके सामने बैठ गया। उनकी टाँगें अब लगभग छू रही थीं। उसकी नज़रें प्रिया के होंठों पर टिक गईं, जो हल्के से काँप रहे थे। "पसीना आ रहा है?" उसने पूछा और बिना इंतज़ार किए, अपना रुमाल लेकर उसके माथे के पसीने को पोंछा। रुमाल नीचे सरककर उसकी गर्दन की घाटी तक पहुँचा, फिर हल्का सा दबाव डालते हुए, उसके स्तनों के बीच वाली जगह को छू गया। प्रिया ने एक तीखी साँस भरी। "नहीं… चाचा… मैं…" वह बुदबुदाई।
"क्या हुआ? ठंडा लगा?" राजेश मुस्कुराया, उसका हाथ रुमाल के साथ वहीं ठहर गया, उसके नर्म उभार के ऊपर से एक हल्का दबाव बनाए हुए। उसकी अँगुली ने अनजाने में ही उसके कपड़े के ऊपर से निप्पल के उभार को रगड़ दिया। प्रिया के शरीर में एक झटका सा दौड़ गया। उसकी आँखें चौंधिया गईं। बाहर किसी के खाँसने की आवाज़ आई। राजेश ने हाथ हटा लिया, पर उसकी टाँगें अब और आगे बढ़ आई थीं, उसके घुटने प्रिया की जाँघों के बीच में टिक गए थे। उसके जींस का कपड़ा उसकी साड़ी के पतले कपड़े से रगड़ खा रहा था।
"डरती हो?" राजेश ने फुसफुसाया, उसकी साँसें प्रिया के होंठों से टकरा रही थीं। "इतनी सुंदर… और इतनी डरी हुई।" उसने अपना हाथ उसकी जाँघ पर रख दिया, ऊपर से, कपड़े के ऊपर ही। उसकी हथेली ने एक गोलाकार मूवमेंट बनाया, धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ते हुए। प्रिया का शरीर स्टूल में धंस गया, उसकी पलकें भारी हो रही थीं। उसकी अपनी जाँघों के बीच की गर्मी अब तेज़ हो चुकी थी, एक चिपचिपाहट शुरू हो गई थी। राजेश की उँगलियाँ अब उसकी जाँघ के भीतरी नर्म हिस्से पर थीं, साड़ी के फाड़ के पास। एक और इंच… और वह उस जगह को छू लेगा जहाँ से गर्मी धड़क रही थी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी। दोनों एकदम अलग हुए। प्रिया की साँस फूल रही थी, उसके होंठ सूखे लग रहे थे। राजेश उठा और दरवाज़े की ओर चला, मगर मुड़कर एक नटखट मुस्कान के साथ देखा। "कल फिर आना भाभी… बाल सुखाने बाकी हैं।" प्रिया ने अपनी जाँघों को कसकर दबाया, उस चिपचिपी गर्मी को महसूस करते हुए जो अब उसकी चूत के अंदर तक फैल चुकी थी। वह जानती थी, यह बस एक शुरुआत थी।
दरवाज़ा खोलते ही एक बुज़ुर्ग महिला अंदर झाँकती है, "बेटा, सिर में तेल लगवाना है।" राजेश ने एक गहरी साँस ली, अपने उभरे हुए लंड को जींस में दबाते हुए। "जी चाची, बैठिए।" उसकी नज़रें प्रिया से मिलीं, जो स्टूल पर स्तब्ध बैठी थी, उसकी साड़ी का पल्लू जाँघों के बीच कसकर दबा हुआ था।
बुज़ुर्ग महिला के तेल मालिश करते हुए राजेश का ध्यान पूरी तरह प्रिया पर था। वह उसे देख रहा था कि कैसे वह धीरे-धीरे अपनी साँसों पर काबू पा रही थी, कैसे उसकी उँगलियाँ अपने ही गोद में चिपचिपे पसीने को महसूस कर रही थीं। जैसे ही चाची चली गई, दरवाज़ा बंद होते ही माहौल फिर से गाढ़ा हो गया।
राजेश सीधा प्रिया के पास गया, उसके सामने झुककर। "बाल अभी भी गीले हैं," उसने कहा और बिना इंतज़ार किए हेयर ड्रायर उठा लिया। गर्म हवा के झोंकों ने प्रिया की गर्दन को छुआ। राजेश का बायाँ हाथ उसके बालों में से गुज़रता हुआ, बार-बार उसके कान के पास, गर्दन के पिछले नर्म हिस्से पर जा टिकता। हर बार उसकी उँगलियों का स्पर्श थोड़ा और लंबा खिंच जाता।
"सीधे बैठो," उसने कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, और अपना दायाँ हाथ उसके कंधे पर रख दिया, अंगूठा उसकी कोलरबोन की खाई में घुमाने लगा। गर्म हवा और उसके हाथों का स्पर्श… प्रिया ने आँखें मूंद लीं। हेयर ड्रायर बंद हुआ। अचानक सन्नाटा छा गया, जिसमें सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ गूंज रही थी।
राजेश ने ड्रायर रखा और दोनों हाथों से प्रिया के बालों को संवारने लगा। उसकी उँगलियाँ बार-बार उसकी स्कैल्प से होती हुईं, गर्दन तक उतरतीं, और हर बार नीचे की ओर थोड़ा और बढ़ जातीं। अब उसके अंगूठे उसकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर, ब्लाउज के नेकलाइन के किनारे पर मंडरा रहे थे। "तुम्हारी गर्दन… इतनी नाज़ुक," उसने कहा, और अपने हाथों को पूरी तरह से उसके कंधों पर रख दिया, अंगुलियाँ आगे की ओर सरकीं, जहाँ से उसके स्तनों का उभार शुरू होता था।
प्रिया ने एक झटके के साथ आँखें खोलीं। "चाचा… यह…"
"क्या?" राजेश ने मासूमियत भरी आवाज़ में पूछा, पर उसकी अँगुलियाँ अब उसके ब्लाउज के कपड़े को हल्का सा दबा रही थीं, जिससे नीचे के निप्पलों का सख्त होना और साफ़ महसूस हो रहा था। "तेजी से सांस क्यों ले रही हो?"
उसने अपना मुँह उसके कान के इतना करीब कर लिया कि उसके होंठ उसके लौंडे को छूने लगे। "डर नहीं है न?" उसकी गर्म साँसें प्रिया के कान के भीतर घुस गईं। प्रिया का सिर फिर से पीछे की ओर झुक गया, अब वह राजेश की छाती से टिका हुआ था। उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर लीं, एक लम्बी, काँपती हुई साँस ली।
राजेश का दायाँ हाथ अब बिल्कुल साहसिक हो गया। उसकी हथेली ने उसके ब्लाउज के ऊपर से ही उसके दाहिने स्तन को ढक लिया, और एक गोलाकार गति में मसलने लगी। अँगूठे ने जानबूझकर कपड़े के ऊपर से निप्पल पर दबाव डाला। प्रिया के मुँह से एक दबी हुई कराह निकल गई। "ऐसा मत…" वह विरोध करने की कोशिश करते हुए भी बुदबुदाई।
"मत क्या?" राजेश ने उसके निप्पल को अँगुलियों के बीच दबाते हुए पूछा। "यहाँ तो बहुत तनाव है।" उसने अपना बायाँ हाथ भी आगे बढ़ाया और उसकी दूसरी चूची को उसी तरह नचोड़ना शुरू कर दिया। प्रिया का शरीर उसकी पकड़ में पूरी तरह ढीला पड़ गया। उसकी जाँघें खुल गईं, साड़ी का पल्लू लुढ़क गया।
राजेश ने अपने होंठ उसकी गर्दन पर रख दिए, एक हल्का सा चुंबन, फिर अपनी जीभ से हल्का सा टच। प्रिया की चूत में एक तीव्र ऐंठन सी उठी, और वह अपनी जाँघों के बीच की गर्मी को बहते हुए साफ़ महसूस कर सकी। "चाचा… रुको… कोई आएगा," उसकी आवाज़ रोने जैसी थी, लेकिन उसने अपने स्तनों को उसकी हथेलियों में और घुसाना शुरू कर दिया।
"दरवाज़ा बंद है," राजेश ने उसके कान में कहा, और अपना एक हाथ उसकी जाँघ पर वापस ले गया। इस बार उसकी उँगलियाँ सीधे साड़ी के फाड़ में घुस गईं, अंदर के नर्म, गर्म मांस को ढूंढते हुए। उसकी मध्यमा उँगली ने उसके सलवार के ऊपरी किनारे को ढूंढ लिया, और उस नाजुक इलाके पर एक हल्का, दबाव डालने वाला स्पर्श किया जहाँ उसकी चूत की गर्मी फैल रही थी।
प्रिया ने तेजी से सिर हिलाया, उसके बाल उड़कर राजेश के चेहरे पर आ गए। "नहीं… वहाँ मत…" लेकिन उसकी प्रतिवाद करती आवाज़ में कोई दम नहीं था। राजेश की उँगली ने सलवार के कपड़े को और दबाया, एक गोलाकार गति बनाते हुए जो सीधे उसके भग के ऊपर से रगड़ खा रही थी। प्रिया के पेट के निचले हिस्से में एक ज्वार उठा, और उसने अनजाने में ही अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठा दिया, उस स्पर्श की और पेश करते हुए।
तभी बाहर से किसी के जोर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई। "राजेश भाई! अंदर हो?" एक पड़ोसी लड़के की आवाज़ थी।
दरवाजे की खटखटाहट ने कमरे में जमे हुए तनाव को एकदम तोड़ दिया। राजेश का हाथ प्रिया की जाँघ से सरककर ऊपर आया, और वह तुरंत खड़ा हो गया। प्रिया ने अपनी साड़ी को ठीक किया, उसका चेहरा लाल हो चुका था, साँसें अब भी तेज़। "राजेश भाई!" आवाज़ फिर आई।
"आ रहा हूँ!" राजेश ने जोर से जवाब दिया, लेकिन उसकी नज़रें प्रिया पर चिपकी रहीं। वह दबी आवाज़ में बोला, "चुपचाप बैठो। कोई शक नहीं करेगा।" उसने अपनी शर्ट का निचला हिस्सा ठीक किया, जो उसके उभार को छुपाने के लिए पर्याप्त नहीं लग रहा था।
दरवाजा खोलते हुए, राजेश ने अपने शरीर को बाहर निकलने के लिए मुश्किल से जगह दी। "क्या हुआ रमेश?" उसने पड़ोसी लड़के से पूछा, दरवाजा आधा ही खुला रखा।
"अम्मा ने कहा है कि शाम को चाचा का बाल कटवाना है," रमेश बोला, उसकी नज़र अंदर घुसने की कोशिश कर रही थी।
"ठीक है, आ जाएँगे।" राजेश ने जल्दी से कहा और दरवाजा बंद कर दिया। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, वह उसके पीछे टेक लगाकर खड़ा हो गया, एक लम्बी साँस छोड़ी। फिर वह धीरे-धीरे प्रिया की ओर मुड़ा, जो अब भी स्टूल पर काँप रही थी। उसकी आँखों में डर था, लेकिन उसके होंठ अब भी नम थे, और उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी।
"चले गए," राजेश ने फुसफुसाया, और वापस उसके पास आकर खड़ा हो गया। उसने अपना हाथ उसके बालों पर रखा, धीरे से सहलाया। "डर गई?" उसकी उँगलियाँ उसकी गर्दन के पीछे की नर्म त्वचा पर चली गईं।
प्रिया ने सिर हिलाया, फिर ना में सिर हिलाया। वह बोल नहीं पा रही थी। राजेश ने उसकी ठुड्डी पकड़कर हल्का सा ऊपर उठाया, उसे सीधे अपनी आँखों में देखा। "तुम्हारी आँखें… इतनी शरारती लग रही हैं।" उसने अपना अंगूठा उसके निचले होंठ पर फेरा, जो हल्का सा काँप रहा था। "यहाँ तो सब कुछ बोल रहा है।"
उसने झुककर उसके होंठों के इतने करीब आ गया कि बमुश्किल एक इंच का फासला रह गया। उनकी साँसें मिल रही थीं। "क्या चाहती हो, भाभी?" उसका सवाल सीधा और गर्म था।
प्रिया की पलकें झपकीं। उसने अपनी जीभ निकालकर अपने होंठ गीले किए, और अनजाने में ही, उसकी जीभ ने राजेश के अंगूठे को छू लिया। एक बिजली सी दौड़ गई दोनों में। राजेश की आँखों में आग सी लपक उठी।
उसने अपना अंगूठा हटाया नहीं, बल्कि उसे उसके होंठों के बीच हल्का सा दबा दिया। "मुझे पता है तुम क्या चाहती हो," उसने कहा, और आखिरकार उसके होंठों को अपने होंठों से दबा दिया। यह चुंबन कोमल नहीं था, यह भूखा, दावेदारी भरा था। उसने उसके निचले होंठ को अपने दाँतों के बीच ले लिया, हल्का सा कसकर। प्रिया कराह उठी, और उसका मुँह खुल गया।
राजेश ने इस मौके का फायदा उठाया, अपनी जीभ उसके मुँह के भीतर डाल दी। स्वाद मीठा और नम था। प्रिया ने पहले विरोध करने की कोशिश की, उसके कंधों पर हाथ रखकर धकेला, लेकिन फिर उसकी उँगलियाँ उसकी शर्ट में चिपक गईं, और उसने जवाब देना शुरू कर दिया। उनकी जीभें लड़ने लगीं, गर्म और तेज़।
राजेश का हाथ फिर से उसकी साड़ी के फाड़ में घुसा, लेकिन इस बार उसने सलवार के इलास्टिक को ढूंढ लिया। उसकी उँगलियाँ अंदर सरक गईं, सीधे उसके नंगे जाँघ के नर्म मांस को छूते हुए। प्रिया की कराह चुंबन में दब गई। उसकी उँगलियाँ उसकी त्वचा पर ऊपर की ओर रेंगने लगीं, जहाँ से उसकी चूत की गर्मी एक तेज रोशनी की तरह फैल रही थी।
वह उसके अंदरूनी होंठों के कोमल किनारे तक पहुँच गया। प्रिया का शरीर ऐंठ गया, उसने चुंबन तोड़ दिया और अपना सिर राजेश के कंधे पर गिरा दिया, भारी साँसें लेते हुए। "नहीं… वहाँ… बहुत संवेदनशील है," वह हाँफती हुई बोली।
"यही तो चाहिए," राजेश ने उसके कान में गुर्राया। उसकी तर्जनी उँगली ने उस नम, कोमल गुहा के ऊपरी हिस्से को छू लिया, जहाँ से एक गर्म स्राव बाहर रिस रहा था। उसने एक गोलाकार गति बनाई, बहुत हल्के से, सिर्फ बाहरी हिस्से पर। प्रिया की पीठ में एक झटका दौड़ गया, और उसने अपनी जाँघों को और खोल दिया, एक मूक अनुमति।
"देखो तुम कितनी तैयार हो," राजेश बुदबुदाया, अपनी उँगली को उसके गीलेपन से भीगोते हुए। उसने उसकी चूत के छोटे से खुलने को महसूस किया, जो उसके स्पर्श पर सिकुड़ रहा था। उसने दबाव बढ़ाया, अभी भी अंदर घुसे बिना, सिर्फ उस कोमल बटन पर, जो अब सख्त हो चुका था।
प्रिया ने अपना चेहरा उसकी गर्दन में गड़ा दिया, उसकी गहरी कराहनें राजेश के कान तक पहुँच रही थीं। "चाचा… यह… अलग है," वह रोई। उसकी उँगलियाँ अब उसकी पीठ पर खरोंचने लगी थीं।
"हाँ, पहली बार कोई छू रहा है न?" राजेश ने पूछा, उसकी उँगली ने एक तेज, छोटी गति बनाई। प्रिया चीख़ने ही वाली थी कि राजेश ने उसका मुँह फिर से अपने होंठों से ढक लिया, उसकी चीख़ को निगल लिया। उसकी उँगली ने लयबद्ध तरीके से उसके भगशेफ को दबाना और रगड़ना शुरू कर दिया, हर स्पर्श पर प्रिया का शरीर एक नई ऐंठन में बंध जाता।
उसकी दूसरी हथेली ने फिर से उसके ब्लाउज के नीचे से उसके स्तन को दबोच लिया, निप्पल को उँगलियों के बीच घुमाया। प्रिया उसके मुँह में कराहती रही, उसका शरीर पूरी तरह से उसकी इच्छा के आगे झुक चुका था। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ रही थी, गर्म तरल की एक नई लहर बाहर निकल आई थी, जिससे राजेश की उँगली और भी आसानी से सरकने लगी।
वह उसके कान में बोला, "अब आ जाओ… मेरे लिए।" और उसने अपनी उँगली का दबाव और गति दोनों बढ़ा दिए। प्रिया की आँखें चौंधिया गईं, उसका शरीर तन गया, और फिर एक लंबी, काँपती हुई कराह के साथ, वह उसकी उँगली पर ढह गई, उसकी गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई, होंठ खुले हुए। उसकी चूत में तीव्र स्पंदन हुए, गर्मी की एक लहर उसके पूरे शरीर में फैल गई।
राजेश ने धीरे-धीरे अपनी उँगली हटाई, और उसे देखते हुए, चमकदार और गीली, प्रिया के सामने लाया। फिर उसने अपनी उँगली अपने मुँह में डालकर चूस ली, आँखें बंद करके स्वाद लिया। "मीठा है," उसने कहा, जबकि प्रिया, अब भी हाँफती हुई, उसे देख रही थी, शर्म और एक अजीब गर्व से भरी हुई।
राजेश ने अपनी उँगली चूसते हुए प्रिया की आँखों में देखा, उसकी नटखट मुस्कान फिर से लौट आई थी। प्रिया की साँसें अब भी अनियमित थीं, उसकी छाती जोरों से धड़क रही थी। "अब… अब बाल सुखाने हैं," राजेश बुदबुदाया और हेयर ड्रायर फिर से उठा लिया। गर्म हवा के झोंके प्रिया की गर्दन पर पड़े, लेकिन अब वह हर स्पर्श के प्रति और संवेदनशील हो चुकी थी।
उसने ड्रायर एक हाथ में पकड़ा और दूसरा हाथ प्रिया के कंधे पर रखकर उसे आगे की ओर झुकाया। "थोड़ा आगे झुको," उसने कहा, और खुद उसके पीछे ऐसे खड़ा हो गया कि उसकी जाँघें प्रिया के चुतड़ों को छूने लगीं। गर्म हवा बालों में से गुजर रही थी, लेकिन राजेश का लंड, जो अब भी कसे हुए जींस में उभरा हुआ था, प्रिया की गांड के नर्म मांस पर हल्का दबाव बना रहा था। हर बार जब वह ड्रायर हिलाता, उसकी कमर हल्का सा घूमती, तो वह उभार प्रिया के चुतड़ों के बीच रगड़ खाता।
प्रिया ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसकी मुट्ठियाँ कुर्सी के किनारे पर कस गईं। राजेश ने ड्रायर बंद किया और अचानक दोनों हाथों से उसके गीले बालों को पीछे की ओर सहलाया, उसकी गर्दन का पूरा हिस्सा खुल गया। उसने अपने होंठ उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर रख दिए, बिना चूमे, बस गर्म साँसें छोड़ते हुए। प्रिया का शरीर एक बार फिर काँप उठा।
"तुम्हारी खुशबू… अब मेरे हाथों में रच बस गई है," उसने कान के पास फुसफुसाया, और अपनी नाक उसके कान के पीछे के नर्म स्थान पर घुमाई। उसका एक हाथ उसके कंधे से होता हुआ आगे सरक गया और उसने उसकी चूची को फिर से, अब ब्लाउज के अंदर से, बिना कपड़े के रुकावट के, ढूंढ लिया। उसकी उँगलियाँ बटन खोलती हुई अंदर घुस गईं और नंगे स्तन के गर्म मांस को थाम लिया।
प्रिया ने एक तीखी साँस भरी जब उसकी ठंडी उँगलियों ने उसके गर्म निप्पल को छुआ। "चाचा… यह बहुत ज्यादा है," वह विरोध करने की कोशिश करते हुए भी अपने स्तन को उसकी हथेली में और धकेलने लगी।
"क्या ज्यादा है? यह?" राजेश ने कहा और उसने निप्पल को अँगूठे और तर्जनी के बीच दबाकर हल्का सा खींचा। प्रिया कराह उठी। उसने अपना दूसरा हाथ उसकी कमर पर रखा और उसे कुर्सी पर और पीछे की ओर खींचा, जिससे उसकी गांड अपने लंड पर और जोर से दब गई। वह धीरे-धीरे अपने कूल्हों को हिलाने लगा, एक लयबद्ध रगड़ जो उसकी जींस और उसकी साड़ी के बीच चल रही थी।
उसने अपना मुँह उसके कान से हटाया और उसकी गर्दन के साइड पर, जहाँ नस धड़क रही थी, जीभ फेरने लगा। प्रिया का सिर फिर पीछे की ओर गिर गया, उसकी गर्दन की रेखा तन गई। राजेश के होंठ वहाँ से नीचे सरकते हुए उसके कंधे की हड्डी पर आए, और उन्होंने हल्का सा काटा। प्रिया चौंक गई, लेकिन उसके अंदर एक नई हलचल जाग उठी।
"मुझे देखो," राजेश ने कहा और उसे कुर्सी में घुमाया ताकि वह उसका सामना कर सके। उसकी आँखें अब भी शरारत से भरी हुई थीं, लेकिन उनमें एक गंभीरता भी आ गई थी। उसने प्रिया के ब्लाउज को और खोल दिया, उसके दोनों स्तन अब पूरी तरह से खुले हुए थे, गुलाबी निप्पल कड़े होकर उभरे हुए। उसने उन्हें देखा, फिर अपनी उँगली से एक के चारों ओर घेरा बनाया।
"सुंदर हैं," वह बुदबुदाया, और झुककर एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया। प्रिया की कराह कमरे में गूंज उठी। उसने लपककर उसे अपने मुँह से चूसा, जीभ से नचाया, और हल्के दाँतों से कसकर। उसका दूसरा हाथ दूसरे स्तन पर समान ध्यान देने लगा। प्रिया के हाथ उसके बालों में घुस गए, उसे अपनी ओर खींचते हुए, उसके मुँह को अपने स्तन पर और दबाने के लिए।
राजेश ने उसे चूसना जारी रखा, एक से दूसरे पर जाते हुए, जबकि उसकी कमर का हिलना धीरे-धीरे तेज होता गया। उसकी जाँघों के बीच का दबाव प्रिया के लिए एक मधुर यातना बन गया था। वह अपने कूल्हों को उसके लंड के उभार के साथ तालमेल बिठाते हुए हिलाने लगी, एक अनजान लय में। उनकी साँसें फिर से तेज हो गईं, हवा में गर्मी और बढ़ गई।
राजेश ने अचानक उसका मुँह छोड़ा और उसे खड़ा होने के लिए खींचा। वह उसके सामने खड़ा था, उसकी आँखों में एक स्पष्ट मांग। "अब तुम," उसने कहा, और अपने जींस का बटन खोल दिया। जिप नीचे खिसली और उसने अपने लंड को बाहर निकाल लिया, जो कड़ा और गर्म था, उसकी नसें धड़क रही थीं। प्रिया की नज़रें उस पर चिपक गईं, उसका मुँह थोड़ा सा खुला रह गया।
उसने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने लंड पर रख दिया। "छुओ," उसने आदेश दिया, उसकी आवाज़ में एक कर्कशपन आ गया था। प्रिया की उँगलियाँ काँप रही थीं जब उन्होंने उस गर्म, मखमली लेकिन सख्त चीज को छुआ। उसने हल्का सा दबाव डाला, और राजेश ने एक गहरी साँस ली। उसने उसकी उँगलियों को अपने ऊपर बंद करवाया और धीरे-धीरे उन्हें ऊपर-नीचे चलवाना शुरू किया, उसकी हथेली से लंड के सिर को रगड़वाया।
"हाँ… ऐसे ही," वह कराहा। उसने प्रिया को फिर से चूमना शुरू किया, यह चुंबन अब और भी जंगली, और भी भूखा था। उसका हाथ उसकी साड़ी के नीचे फिर से गया, इस बार सलवार के इलास्टिक को नीचे खींचते हुए। कपड़ा उसकी जाँघों पर उतर आया। उसकी उँगलियाँ सीधे उसकी चूत के गीले, खुले हुए होंठों पर वापस आ गईं, लेकिन इस बार एक उँगली ने आसानी से अंदर की ओर रास्ता बना लिया।
प्रिया की कराह चुंबन में दब गई जब उसकी उँगली उसके अंदरूनी गर्मी में घुस गई। वह तंग और नम था, हर स्पंदन में सिकुड़ रहा था। राजेश ने धीरे-धीरे उसे अंदर-बाहर करना शुरू किया, जबकि प्रिया का हाथ उसके लंड पर तेजी से चलने लगा। उनकी साँसें, उनकी हरकतें, सब एक दूसरे के साथ तालमेल बिठाने लगे।
राजेश की उँगली उसकी चूत के भीतर एक गहरी, नम गर्मी में धँस गई। प्रिया का सिर उसके कंधे पर लुढ़क गया, उसकी साँसें गर्म और तेज़ होकर उसकी गर्दन पर टकरा रही थीं। "और… धीरे से," वह हाँफी, जबकि उसकी उँगलियाँ उसके लंड पर दबाव बनाती रहीं।
"तुम ही तो तेज़ कर रही हो," राजेश ने उसके कान में गुर्राते हुए कहा, और अपनी दूसरी उँगली को उसकी चूत के बाहरी होंठों पर लाया, उसके संवेदनशील भगशेफ पर हल्का-हल्का दबाते हुए। प्रिया के शरीर में एक जबरदस्त ऐंठन दौड़ गई, और उसकी चूत राजेश की उँगली के इर्द-गिर्द सख्ती से सिकुड़ी। उसकी कराहनें अब दबी हुई चीखों में बदलने लगी थीं।
राजेश ने अपनी उँगली की गति तेज़ की, अंदर-बाहर का लयबद्ध खेल, जबकि उसका अंगूठा बाहर उसके नन्हें बटन पर नाचता रहा। उसने प्रिया का मुँह अपनी ओर घुमाया और उसके होंठों को फिर से अपने में कैद कर लिया, उसकी हर कराह को चूस लिया। उनके बीच की हवा चिपचिपी और भारी हो गई थी।
वह धीरे से उसकी साड़ी के पल्लू को और खोलते हुए, उसकी नंगी जाँघों और पेट के निचले हिस्से को देखने लगा। उसकी नज़रें उसकी चूत पर टिक गईं, जहाँ उसकी अपनी उँगली नम और चमकदार, अंदर-बाहर हो रही थी। यह दृश्य उसे और उत्तेजित कर रहा था। "देखो तुम कैसे स्वागत कर रही हो," उसने कहा, उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।
प्रिया ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी ओर देखा, उसकी पुतलियाँ फैली हुईं, इच्छा से धुंधली। उसने अपना हाथ तेज़ी से उसके लंड पर चलाया, अंगूठे से सिर की नोंक पर जमा हुआ तरल फैलाते हुए। राजेश ने एक गहरी, कर्कश साँस ली। उसने अपनी उँगली प्रिया की चूत से निकाली और उसे अपने मुँह के सामने लहराया, उसकी नज़रों में चुनौती भरी चमक के साथ। फिर वह उस उँगली को धीरे से प्रिया के होंठों पर रगड़ने लगा।
"अपने स्वाद का मज़ा लो," उसने कहा। प्रिया, एक पल के लिए झिझकी, फिर अपनी जीभ निकालकर उसकी उँगली को चाटने लगी, आँखें बंद करके। यह क्रिया इतनी अश्लील और इतनी अंतरंग थी कि राजेश का लंड उसकी मुट्ठी में एक झटके के साथ फड़क उठा।
"अब बस," वह बुदबुदाया, और उसने प्रिया को कुर्सी से खींचकर ब्यूटी पार्लर के बीचों-बीच फर्श पर उतार दिया। उसकी साड़ी अस्त-व्यस्त थी, स्तन बाहर झाँक रहे थे। राजेश ने अपने जींस को घुटनों तक उतार दिया और उसके ऊपर झुक गया, अपने लंड को उसकी चूत के नम द्वार पर टिका दिया। "तैयार हो?" उसकी आवाज़ में एक अंतिम पूछताछ थी।
प्रिया ने जवाब में अपनी जाँघें और चौड़ी कर दीं, अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया, उस गर्म, सख्त स्पर्श को अपने भीतर लेने के लिए तैयार। उसकी आँखों में सहमति और एक तीव्र भूख थी। "जी… चाचा," वह फुसफुसाई।
राजेश ने एक धीमा, दबाव भरा धक्का दिया। प्रिया की चूत ने प्रतिरोध किया, फिर उस मोटे, गर्म लंड के सिर को अंदर खींच लिया। दोनों की साँस एक साथ रुक गई। फिर, एक लंबी कराह के साथ, राजेश ने खुद को पूरी तरह से अंदर धकेल दिया। प्रिया की आँखें फैल गईं, उसने अपने नाखून उसकी पीठ में गड़ा दिए, जैसे कि इस नई, तीखी भराव की सनसनी को थामने की कोशिश कर रही हो। गर्मी और तंगी ने राजेश को चारों ओर से लपेट लिया। वह एक पल के लिए स्थिर रहा, बस उसके भीतर धड़कन को महसूस करते हुए, फिर धीरे-धीरे चलना शुरू किया।
राजेश का लंड उसकी चूत के भीतर पूरी तरह से समा गया था, एक गहरी, तीखी भराव की सनसनी जिसने प्रिया की साँसें एक पल के लिए रोक दीं। वह अंदर ठहरा रहा, बस उसकी आँखों में झाँकता हुआ, जहाँ आशंका और वासना का एक अद्भुत मिश्रण तैर रहा था। फिर, धीरे से, उसने अपने कूल्हे पीछे खींचे और फिर अंदर धकेले, एक लय शुरू की जो शुरू में धीमी और खोजभरी थी।
प्रिया की कराह फर्श पर गूंजी। उसकी उँगलियाँ उसकी पीठ में और गहरे घुस गईं, उसकी नंगी त्वचा पर लाल रेखाएँ खींचती हुईं। "अरे… चाचा…" वह हाँफी, जबकि उसकी चूत हर धक्के पर अनुकूलन करते हुए सिकुड़ रही थी। राजेश की गति धीरे-धीरे तेज़ होने लगी, उसके चुतड़ों के नर्म मांस पर हर बार जोर से टकराते हुए। उसका लंड उस गर्म, नम गुफा में आसानी से सरक रहा था, जो अब और भी गीली होती जा रही थी।
उसने झुककर उसके होंठों को फिर से अपने में कैद कर लिया, उसकी हर कराह को निगलते हुए। उसका एक हाथ उसके स्तन पर वापस आया, निप्पल को उँगलियों के बीच दबाकर मरोड़ते हुए। दूसरा हाथ उसकी गांड के नीचे सरक गया, उसे ऊपर उठाते हुए ताकि वह और गहराई से घुस सके। प्रिया की टाँगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द लिपट गईं, उसे और नज़दीक खींचती हुईं।
"तुम… तुम कितनी तंग हो…" राजेश गुर्राया, उसकी साँसें अब भारी और अनियमित हो चलीं थीं। उसकी गति में एक जानवरी ज़ोर आ गया, हर धक्का पहले से ज़्यादा मजबूत, पहले से ज़्यादा गहरा। फर्श उनके नीचे सरक रहा था, कुर्सी टल गई थी। ब्यूटी पार्लर की हवा में केवल उनकी सिसकियाँ, चिपचिपी आवाज़ें और शरीरों के टकराने की ध्वनि गूंज रही थी।
प्रिया का सिर पीछे की ओर झटका खा रहा था, उसके बाल फर्श पर बिखर गए थे। उसकी आँखें बंद थीं, मुँह खुला हुआ, और हर तेज़ धक्के के साथ एक नया, दबा हुआ रोना निकल रहा था। उसकी चूत में एक ज्वार सा उमड़ रहा था, एक दबाव जो उसके पेट के निचले हिस्से में जमा हो रहा था। "मत रुको… ऐसे ही…" वह बुदबुदाई, उसकी एड़ियाँ उसकी पीठ को दबाने लगीं।
राजेश ने उसे देखा, उसके चेहरे पर आनंद की वह भावना जो उसने जगाई थी। यह देखकर उसका लंड और सख्त हो गया। उसने अपनी गति और तेज़ कर दी, अब पूरी ताकत से, जंगली और अनियंत्रित। प्रिया चीख़ उठी, लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया, उसकी चीख़ को दबा दिया। "शhh… कोई सुन लेगा," उसने कान के पास हाँफते हुए कहा, लेकिन खुद उसकी आवाज़ भी लड़खड़ा रही थी।
यह खतरा, इस तरह के समय में, केवल आग में घी का काम किया। प्रिया की आँखें खुल गईं, और उसने उसकी कलाई पकड़कर उसका हाथ अपने मुँह से हटा दिया। "तो… तो सुन ले," वह चुनौती देते हुए हाँफी, और जानबूझकर जोर से कराही जब उसने एक विशेष रूप से गहरा धक्का दिया। यह चुनौती राजेश को और भी उत्तेजित कर गई।
उसने उसे पलट दिया, उसकी पीठ के बल लिटाया, और उसकी टाँगों को कंधों पर डाल लिया। इस नई स्थिति में, उसका प्रवेश और भी गहरा हो गया। प्रिया की आँखें फैल गईं, उसकी चूत में एक तीव्र, मीठा दर्द उठा। राजेश ने फिर से चलना शुरू किया, अब पूरी लंबाई में, हर बार उसकी चूत के अंदरूनी छोर को छूता हुआ। उसका एक हाथ उसकी जाँघ पर कसकर पकड़ बनाए हुए था, जबकि दूसरे ने उसके स्तनों को नचोड़ना जारी रखा।
प्रिया का शरीर एक तार की तरह तन गया। उसके नीचे से गर्मी का एक विस्फोट सा हुआ, उसकी चूत तेजी से सिकुड़ने लगी, राजेश के लंड को एक मधुर चूसने वाली पकड़ में लेते हुए। "मैं… मैं जा रही हूँ…" वह चीख़ पड़ी, उसकी पलकें फड़फड़ा रही थीं। राजेश ने अपनी गति बनाए रखी, उसके चरमोत्कर्ष को और लंबा खींचते हुए। प्रिया का शरीर ऐंठता रहा, उसकी कराहनें लगातार और अनियंत्रित होती चली गईं।
जब उसकी ऐंठनें कम हुईं, राजेश ने अपनी गति फिर से तेज़ की। उसकी अपनी सीमा नज़दीक थी। उसने प्रिया को कसकर पकड़ लिया, उसके शरीर को अपने में दबाते हुए, और अंतिम, तीव्र धक्के लगाने शुरू किए। उसका माथा उसके कंधे से टिका हुआ था, आँखें बंद थीं। "भाभी…" उसकी आवाज़ एक गहरी गड़गड़ाहट थी।
और फिर वह भी टूट गया। एक लंबी, कर्कश कराह के साथ, उसने खुद को गहराई से अंदर धकेल दिया, और उसकी गर्मी उसकी चूत के भीतर फूट पड़ी, हर स्पंदन के साथ भरते हुए। प्रिया ने उस गर्म भराव को महसूस किया, और उसके शरीर में एक दूसरी, हल्की लहर दौड़ गई। वे दोनों स्थिर हो गए, केवल साँस लेने और धड़कनों की आवाज़ से भरी हुई हवा में।
थोड़ी देर बाद, राजेश उस पर से लुढ़क गया, फर्श पर उसके बगल में लेट गया। सन्नाटा फिर से छा गया, लेकिन अब वह भारी और संतुष्ट था। प्रिया की आँखें बंद थीं, उसकी छाती अब भी तेजी से उठ रही थी। उसकी साड़ी पूरी तरह से खुल चुकी थी, शरीर चमकदार पसीने से लथपथ।
राजेश ने अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल पर हल्का स्पर्श किया। प्रिया ने आँखें खोलीं, और उनमें एक अजीब सी खालीपन थी, जैसे किसी तूफान के बाद की शांति। "अब…" वह फुसफुसाई, लेकिन वाक्य पूरा नहीं कर पाई।
"अब कुछ नहीं," राजेश ने कहा, उसकी आवाज़ नरम थी, लेकिन उसमें एक अंतिमता भी थी। उसने उठकर अपने कपड़े ठीक किए। प्रिया ने भी धीरे-धीरे बैठकर अपनी साड़ी समेटी, हर हरकत में एक नई शर्म और एक गहरी थकान झलक रही थी। जो हुआ था, उसका भार अब उन दोनों पर था। वह उठी, बिना कुछ कहे, और दरवाज़े की ओर चल दी। जाते-जाते, वह मुड़कर देखे बिना, बस इतना कहा, "कल… शाम को आऊँगी। बाल बनवाने।"
दरवाज़ा बंद हुआ। राजेश अकेला खड़ा रहा, उस जगह को देखते हुए जहाँ कुछ देर पहले तक वह गर्मी और उलझन थी। हवा में अब भी उनकी वासना की गंध थी, एक निषिद्ध याद जो दीवारों में समा गई थी। उसने एक लंबी साँस ली। खेल खत्म हुआ, लेकिन खेलने वाले अब भी मैदान में थे।