🔥 शादी के उस कमरे में…जब दूल्हे की बहन ने दुल्हन के भाई को बुलाया
🎭 गाँव की शादी, रस्मों के बीच एक गुप्त निमंत्रण। दुल्हन की सहेली और दूल्हे का विधुर चाचा…एक अलग कमरा जहाँ बंद दरवाज़े के पीछे उमड़ती हैं वर्जित वासनाएँ। सिंदूर और सेहरा के बीच छुपा एक ऐसा रिश्ता जिसे कोई नहीं जानता।
👤 मीरा (22): दुल्हन की कॉलेज से लौटी सहेली, कसी हुई कमीज़ और सलवार में उभरे निप्पल, चुस्त चुतड़ों की मचलती चाल, विधुर पड़ोसी के लिए छुपी भूख।
विक्रम (42): दूल्हे का विधुर चाचा, मोटे हाथों वाला किसान, पसीने से तर बदन, युवा देहों को निहारने की आदत, मीरा की गोलाईयों पर टिकी नज़र।
📍 सावन की शाम, गाँव के ठाकुर की हवेली में बारात। ढोल-नगाड़ों के शोर के बीच दूसरी मंज़िल का सूना कमरा जहाँ सामान रखा है। मीरा को चुनरी ठीक करने बुलाया गया, विक्रम उधर से गुज़र रहा था।
🔥 कमरे में चुनरी की चुनौटी ठीक करते हुए मीरा की नज़र दरवाज़े पर पड़ी। विक्रम चुपके से अंदर आया, "बाहर शोर है…यहाँ थोड़ी शांति मिलेगी।" उसकी नज़र मीरा के सलवार के टाइट हिस्से पर टिक गई। "चाचा जी…यहाँ?" मीरा ने झिझकते हुए कहा, पर उसकी आँखों में एक चमक थी। विक्रम ने करीब आकर उसके कंधे पर हाथ रखा, "तुम्हारी चुनरी उलझ गई है।" उसके हाथ का स्पर्श गर्म था, मीरा के रोंगटे खड़े हो गए। "नहीं…मैं…" उसकी आवाज़ काँपी। बाहर से बारातियों के चिल्लाने की आवाज़ आई। विक्रम ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया। कमरे में अँधेरा गहरा हो रहा था। मीरा की साँसें तेज हो गईं जब विक्रम ने उसके बालों से गिरी एक पिन उठाई और जानबूझकर उसके होंठों के पास ले गया। "चाचा जी…लोग…" "यहाँ कोई नहीं आएगा," उसने फुसफुसाया। उसकी सांसों की गर्माहट मीरा की गर्दन को छू रही थी। बाहर से बंदूक की फायरिंग की आवाज़ आई – बारात का स्वागत। विक्रम ने इस शोर का फायदा उठाते हुए मीरा को दीवार की तरफ धकेल दिया। "एक मिनट…बस एक मिनट," उसकी आवाज़ में वासना का खुरदुरापन था। मीरा के होंठ सूख गए थे, उसकी चूची कसी हुई कमीज़ के अंदर सख्त हो रही थी। विक्रम की नज़र उसके स्तनों के उभार पर टिकी थी जो तेज साँसों से उठ-गिर रहे थे। "तुम…तुम क्या चाहते हो?" मीरा ने काँपती आवाज़ में पूछा। "वो जो तुम भी चाहती हो," विक्रम ने उसके कान में फुसफुसाया। उसका एक हाथ मीरा की कमर पर सरकने लगा, नीचे की ओर…
विक्रम का हाथ उसकी कमर पर रुका नहीं। उसकी मोटी उँगलियाँ मीरा के सलवार के नेक से नीचे सरकने लगीं, उसके गोल चुतड़ों के ऊपरी हिस्से को, कपड़े के पतले परदे के आर-पार, एक खुरदुरे, दावेदार स्पर्श से दबोचने लगीं। मीरा की एक कराह निकल गई, आधी दबी हुई, आधी हवा में लटकी। "अभी… अभी नहीं," उसने कहा, लेकिन उसका सर दीवार पर पीछे झुक गया था, आँखें बंद।
"अभी ही," विक्रम ने उसके कान में गुर्राया, अपना पूरा भारी बदन उसके कोमल अंगों पर थोपते हुए। उसकी साँसों से शराब और पान की महक आ रही थी, जो मीरा के चेहरे के पास मादक बादल-सी बन गई। बाहर ढोल की थाप तेज़ हुई। विक्रम ने इस शोर का लाभ उठाया और अपना दूसरा हाथ उसकी पीठ से होता हुआ ऊपर ले गया, उसकी चुनरी के अंदर घुसा दिया। कसी हुई कमीज़ का महीन कपड़ा अब एकमात्र बाधा था।
उसकी गर्म, पसीने से थोड़ी सनी हथेली मीरा की रीढ़ पर फिरी, हर मेरुदंड को जगाती हुई। "चाचा… कोई आ जाएगा," मीरा ने फुसफुसाया, पर उसकी उँगलियाँ खुद उसकी सलवार की कमरबंद में फँस गईं, बंद करने के बजाय खोलने का इशारा कर रही थीं।
"दरवाज़ा बंद है," विक्रम ने कहा, और अपने होंठ उसकी गर्दन के नाज़ुक कोपल जैसे हिस्से पर रख दिए। चूमा नहीं, बस दबाया, गर्मी का एक चौंधियाने वाला झोंका देते हुए। मीरा का शरीर एकदम तन गया, फिर एक कंपकंपी ने उसे जकड़ लिया। उसकी चूचियाँ, पहले से ही सख्त, कमीज़ के भीतर और उभर आईं, कपड़े पर दो स्पष्ट उभार बनाते हुए।
विक्रम की नज़र वहाँ गड़ गई। उसने अपना सिर उठाया और अपना वह हाथ, जो अब तक उसकी पीठ पर था, आगे की ओर सरकाया। धीरे-से, उसने अपनी उँगलियों के पोरों से मीरा के स्तन के किनारे का स्पर्श किया, ऊपर से नीचे की ओर एक हल्का रेशा खींचा। मीरा की साँस रुक-सी गई। "ऐसा मत…" उसकी आवाज़ एक दमदार फुसफुसाहट में डूब गई।
"ऐसा ही," विक्रम ने जवाब दिया, और इस बार उसने पूरी हथेली से उसके दाहिने स्तन को दबोच लिया, उसे अपनी मुट्ठी में भरते हुए, निप्पल को अँगूठे से रगड़ते हुए। मीरा के मुँह से एक तीखी, दबी हुई कराह निकली, जो बाहर के शोर में खो गई। उसकी आँखें अचानक खुल गईं, विक्रम के चेहरे से सिर्फ इंच भर दूर, उसकी वासना से तर और जंगली नज़रों में घूरती रहीं।
विक्रम ने अपना दबाव बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ अब पूरी तरह से मीरा के चुतड़ों के गोलाकार में धँस गई थीं, सलवार का कपड़ा उनके बीच तन रहा था। उसने अपने धड़ से उसे और जोर से दीवार पर दबाया, और मीरा ने अपनी जाँघों के बीच एक गर्म, द्रवीय संवेदना महसूस की। उसकी अपनी वासना, अब दबाव में फूट रही थी।
"तुम्हारा शरीर… बोल रहा है," विक्रम ने उसके होंठों के पास से फुसफुसाया, उसकी नज़र उसके मुँह पर टिकी थी। उसने अपना सिर और झुकाया, उनके होंठों के बीच की नाममात्र की दूरी को मिटाते हुए। उसकी सांसें, गर्म और भारी, अब सीधे मीरा के होंठों पर पड़ रही थीं। वह चूमने ही वाला था कि नीचे से, उसका हाथ एक ज़ोरदार, दावेदार मूवमेंट में आगे बढ़ा और मीरा के सलवार के अंदर, उसकी जाँघों के बीच के नर्म मांस पर जा पहुँचा।
विक्रम की मोटी उँगलियाँ उस नर्म, गर्म घाटी के ऊपरी हिस्से में दब गईं, कपड़े के नीचे की कोमल त्वचा को एक अजीब-सी खुरदुरी कोमलता से रगड़ने लगीं। मीरा का सर पीछे दीवार से टकराया, उसकी आँखें फिर से झपककर बंद हो गईं। "ऊह्ह…" यह आवाज़ उसके गले से निकली, लंबी और कंपकंपाती। उसकी जाँघें, अपने आप ही, एक बार तनकर फिर ढीली पड़ गईं, उस स्पर्श के लिए रास्ता देती हुईं।
"देखो तो… कितनी गर्मी है यहाँ," विक्रम ने गुर्राते हुए कहा, अपनी उँगली को उसके अंदरूनी हिस्से के ऊपर दबाते हुए एक गोलाकार घुमाव दिया। मीरा के शरीर में एक झटका-सा दौड़ गया। उसने अपनी आँखें खोलीं और विक्रम की तरफ देखा, उसकी नज़रों में अब झिझक नहीं, बल्कि एक तीव्र, धुंधली प्यास थी। उसके होंठ हिले, "चाचा… वो…" वह पूरा वाक्य नहीं कह पाई।
विक्रम ने उसकी इस मौन गुहार को समझ लिया। उसने अपना सिर और झुकाया, आखिरकार उनके होंठों के बीच का वह बचा-खुचा फासला मिटा दिया। पहला चुंबन कोमल नहीं, दावेदार था। उसके मोटे, खुरदुरे होंठ मीरा के नरम होंठों को अपने में दबोच लेना चाहते थे। मीरा ने एक क्षण के लिए प्रतिरोध किया, फिर उसके होंठ भी हिलने लगे, जवाब देने लगे। उनके बीच की गर्म, नम हवा फुसफुसाहट में बदल गई। विक्रम का हाथ, जो अब तक उसकी जाँघ पर था, एक झटके में उसकी सलवार की कमरबंद की ओर बढ़ा। उसकी उँगलियों ने फुर्ती से गाँठ खोलनी शुरू कर दी।
बाहर ढोल का बजना एक तेज क्रेसेंडो पर पहुँचा। मीरा ने उस क्षण का फायदा उठाते हुए अपना हाथ उठाया और विक्रम के सीने पर रख दिया, जैसे धकेलने के लिए, लेकिन उसकी हथेली उसके पसीने से तर बनियान पर फिसल गई, उसके सख्त सीने के बालों का स्पर्श पाकर। यह स्पर्श उसे और उत्तेजित कर गया। सलवार की गाँठ खुल गई। विक्रम ने अपना हाथ अंदर डाला, सीधे उसके नाभि के नीचे के मुलायम पेट पर, और फिर नीचे, उसके चिकने जघन पर।
मीरा की साँस रुक-सी गई। उसने चुंबन तोड़ा और उसकी आँखों में देखा। वहाँ कोई डर नहीं था, बस एक बेकरार इंतज़ार था। "बस… इतना ही," उसने फुसफुसाया, लेकिन उसका अपना शरीर उसके विपरीत जा रहा था। उसने अपनी जाँघें थोड़ी और खोल दीं।
विक्रम ने मुस्कुराते हुए उसकी नाक को अपने होंठों से छुआ। "तुम्हारी चूत गीली हो रही है, मीरा," उसने कान में कहा, शब्दों को बड़ी बेलाग बोलते हुए। यह शब्द सुनते ही मीरा के कान लाल हो गए, पर उसकी आँखें नहीं झुकीं। विक्रम की मध्यमा उँगली ने उसके अंदरूनी लब की रेखा को टटोला, कपड़े के पतले अवरोध के पार से ही उसकी गर्मी और नमी महसूस की।
फिर उसने अचानक अपना दूसरा हाथ, जो अब तक उसके स्तन को मसल रहा था, ऊपर की ओर ले जाकर उसकी कमीज़ के बटन खोलने लगा। एक… दो… तीन… बटन खुलने की आवाज़ कमरे की सन्नाटे में चटखने की तरह गूंजी। मीरा ने विरोध करने की एक नाकाम कोशिश में अपना हाथ उसकी कलाई पर रखा, लेकिन विक्रम ने रुका नहीं। उसने कमीज़ के दोनों पल्लों को अलग किया। अंदर एक साधारण सूती अंगिया थी, जो उसके भरे हुए स्तनों को कसकर समेटे हुए थी, और उनके ऊपर, स्पष्ट उभार बनाते हुए, उसके कड़े निप्पल।
"हम्म…" विक्रम ने गहरी सांस भरते हुए कहा, अपनी नज़र उसके उभारों पर गड़ा दी। उसने अपना सिर झुकाया और अपने मुँह से, अंगिया के पतले कपड़े के आर-पार, उसके बाएँ निप्पल को दबाया। गर्म, नम स्पर्श ने मीरा को ऐसा लगा जैसे बिजली का झटका लगा हो। उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई। "अरे राम…" उसके मुँह से निकल गया।
विक्रम ने लगातार उस निप्पल को अपने होंठों और जीभ से दबाया, चूसा, जबकि उसकी उँगली नीचे उसकी चूत के ऊपर एक लयबद्ध दबाव बनाने लगी। मीरा का शरीर अब तनाव और आराम के बीच झूल रहा था। उसने अपने हाथ विक्रम के सिर में घुसेड़ दिए, उसके घने, पसीने से चिपके बालों को मसलने लगी। उसकी साँसें अब लगातार, गर्म फुसफुसाहटों में बदल रही थीं। बाहर का शोर अब उनके लिए सिर्फ एक धुंधला सा बैकग्राउंड था। इस सूने कमरे में, दीवार के सहारे, उनकी वर्जित वासना पूरी तरह से उभर चुकी थी, और अब वह नियंत्रण के उस कगार पर पहुँचने ही वाली थी जहाँ से कोई लौटता नहीं।
विक्रम ने अपने मुँह से उसके निप्पल का दबाव छोड़ा, और उसकी जीभ ने अंगिया के गीले हुए कपड़े पर एक लंबा, धीमा घेरा खींचा। मीरा के सिर में एक चक्कर-सा आया, उसकी पकड़ विक्रम के बालों पर और कस गई। "अब… अब बस करो," उसकी आवाज़ एक टूटी हुई गुहार थी, लेकिन उसका शरीर स्पष्ट मना कर रहा था, अपनी जाँघें और खोलते हुए।
"बस क्या?" विक्रम ने उसकी ठुड्डी को पकड़कर अपनी तरफ घुमाया, उसकी आँखों में झाँका। "तुझे अभी तो शुरुआत करनी है।" उसने अपनी वह उँगली, जो अब तक उसकी चूत के ऊपर घिस रही थी, एक तेज, दबाव भरे झटके से अंदर घुसा दी, सलवार और अंदरूनी कपड़े के बीच के रास्ते से। कपड़ा तन गया, उसकी उँगली का एक जोड़ उसके गीले, गर्म शिकन में समा गया।
"आहह!" मीरा का मुँह खुला रह गया, एक गहरी, भर्राई हुई कराह उसके गले से निकली। उसकी आँखें चौंधिया गईं। विक्रम ने उसके होंठों पर अपना अंगूठा रख दिया, उसे चुप कराते हुए, फिर उसी अंगूठे को उसके नीचले होंठ पर रगड़ने लगा। "शांत, बेटा… कोई सुन लेगा।"
उसकी उँगली अंदर एक लयबद्ध गति से चलने लगी, आगे-पीछे, उसके कोमल अंदरूनी हिस्सों को खोजते-बटोरते हुए। हर आगे के धक्के पर मीरा का शरीर एक झटका खाता, उसकी पीठ दीवार पर रगड़ खाती। उसकी साँसें अब फुफकार बन गई थीं, गर्म और तेज। विक्रम ने दूसरा हाथ उसकी अंगिया के नीचे से डाला, पूरी तरह से उसके नंगे स्तन को अपनी खुरदुरी हथेली में ले लिया, निप्पल को उँगलियों के बीच दबाकर मरोड़ा।
"विक्रम… चाचा नहीं… विक्रम…" मीरा बड़बड़ाई, उसकी आँखों में एक अजीब सी पहचान की चमक। उसने अपनी एक जाँँह उठाई और विक्रम की बनियान के नीचे से, उसके पेट के रोंगटों पर फिरते हुए, नीचे उसकी धोती की गाँठ तक पहुँची। उसकी उँगलियों ने कपड़े का स्पर्श पाया, और फिर नीचे, धोती के अंदर एक सख्त, गर्म उभार।
विक्रम की साँस एकदम से रुकी। उसकी आँखें चौड़ी हुईं। "साहसी हो गई न?" उसने गुर्राया और उसकी उँगली ने मीरा के अंदर एक ज़ोरदार घुमाव मारा। मीरा ने अपना सिर पीछे को फेंका, एक मूक चीख उसके गले में फँसी रह गई। उसकी कमर तनकर मेहराब जैसी हो गई, उसका शरीर उस उँगली के इर्द-गिर्द कसने लगा।
फिर, एक आवेग में, विक्रम ने अपना हाथ खींचा। उसने मीरा के सलवार और अंदरूनी कपड़े को एक साथ, जाँघों के पास से, ज़ोर से नीचे खींच दिया। ठंडी हवा का एक झोंका उसकी नंगी त्वचा से टकराया। मीरा ने अपनी आँखें खोलीं। विक्रम उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया था, उसकी नज़रें सीधी उसके बीच के उस खुले, गीले, थोड़ा फैले हुए हिस्से पर गड़ी थीं।
"सुंदर…" उसने फुसफुसाया, और बिना किसी चेतावनी के, अपना सिर आगे कर दिया। उसकी जीभ का गर्म, चौड़ा फलक एक बार में ही उसकी पूरी चूत को, ऊपर से नीचे तक, चाट गया।
मीरा के मुँह से एक तीखी, दबी हुई चीख निकल गई। उसने अपने हाथों से विक्रम के सिर को जकड़ लिया, चाहे धकेलने के लिए, चाहे अपनी तरफ खींचने के लिए-शायद दोनों के लिए। विक्रम की जीभ ने बेरहमी से काम लिया, उसके छोटे, सख्त हो चुके भगशेफ के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हुए, फिर उसके गीले छिद्र में घुसकर अंदर-बाहर का खेल रचते हुए। नमी की आवाज़, हल्की चुपचुपाहट, कमरे में गूंजने लगी।
"मत… ऐसे मत…" मीरा हांफने लगी, उसकी टाँगें काँप रही थीं। विक्रम ने अपने हाथों से उसकी जाँघों को और फैलाया, उसे पूरी तरह से खोल दिया। उसकी जीभ की गति और तेज, और गहरी हो गई। मीरा ने आसमान की तरफ देखा, उसकी आँखों में सितारे-से चमकने लगे। उसके पेट के नीचे एक गर्म, विस्फोटक दबाव बनने लगा, एक ऐसी चरम सीमा की ओर बढ़ रहा था जिसे वह रोक नहीं पा रही थी।
विक्रम ने इसे महसूस किया। उसने एक हाथ ऊपर बढ़ाया और उसके स्तन को दबोच लिया, निप्पल को चुटकी में लेकर खींचा। यह दोहरा हमला था। मीरा की साँसें रुकीं, उसका शरीर लकड़ी की तरह तन गया, और फिर एक ज्वालामुखी फूट पड़ा। एक मूक, ऐंठन भरी चीख के साथ, उसका शरीर विक्रम के मुँह पर एक तेज, लयबद्ध कंपकंपी में झूमने लगा। विक्रम ने अपना मुँह दबाए रखा, उसके सारे रस को चूसते हुए, जब तक कि मीरा की टाँगें कमजोर पड़कर लड़खड़ा नहीं गईं और वह दीवार के सहारे फिसलने नहीं लगी।
वह घुटनों के बल बैठ गई, सांसों से लड़ती हुई। विक्रम उठा, उसकी धोती में एक भारी उभार साफ दिख रहा था। उसने मीरा की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। "अब मेरी बारी," उसने कहा, और अपनी धोती खोल दी।
विक्रम की धोती खुलकर नीचे गिरी। उसका लंड, मोटा और सख्त, हवा में उसके पेट के सामने तनकर खड़ा था, उसकी नसें धड़क रही थीं। मीरा की निगाहें तुरंत उस पर जा ठहरीं, उसकी आँखें फैल गईं। उसने इतना बड़ा, गहरे रंग का और ताकतवर कभी नहीं देखा था। उसकी साँस, जो अभी धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी, फिर से रुक-सी गई।
"देख रही है?" विक्रम ने गुर्राते हुए कहा, अपने आप को थोड़ा और आगे बढ़ाते हुए। "अब तू ही इसे संभाल।"
मीरा ने अनजाने में अपनी जीभ से अपने होंठ गीले किए। उसके हाथ, जो अभी तक अपनी जाँघों पर थे, धीरे से उठे। उसने हिचकिचाते हुए अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और अपनी उँगलियों के पोर उस लंड के गर्म, मखमली सिरे को छूए। एक कंपकंपी उसकी उँगली से होती हुई पूरे शरीर में दौड़ गई। विक्रम ने गहरी साँस भरी, उसकी पलकें झपकीं।
"हौले से नहीं… पूरे हाथ से पकड़," उसने हुक्म दिया, आवाज़ में एक दबी हुई कसक।
मीरा ने अपनी हथेली को उसके लंड के चारों ओर लपेटा, धीरे से दबाया। उसकी गर्मी, उसकी सख्त लचक… यह एहसास उसे चौंधिया गया। उसने अपनी मुट्ठी को ऊपर-नीचे चलाना शुरू किया, एक अनाड़ी, धीमी गति से। विक्रम का सिर पीछे को झुका, उसके गले से एक दबी हुई कराह निकली। "हाँ… बस ऐसे…"
उसने अपना बायाँ हाथ उठाया और मीरा के गाल को थपथपाया, फिर उसके बालों में घुसेड़ते हुए उसका सिर अपनी ओर खींचा। "अब इसे देख… पूरी तरह," उसने फुसफुसाया।
मीरा ने आँखें झुकाईं नहीं। उसकी नज़र उस मोटे लंड पर टिकी रही, जबकि उसकी मुट्ठी की गति धीरे-धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी। उसने अपना अंगूठा सिरे के नीचे के नम, चिपचिपे हिस्से पर रगड़ा। विक्रम का पूरा शरीर तन गया। "अच्छा… बहुत अच्छा," उसने सराहना की।
फिर अचानक, उसने झुककर मीरा के होंठों को अपने होंठों से दबा दिया। यह चुंबन अब कोमल नहीं, बल्कि एक प्रतीक था – दावे का, अधिकार का। उसकी जीभ ने मीरा के मुँह में जबरदस्ती घुसपैठ की, उसकी जीभ से लड़ते हुए, चूसते हुए। मीरा की मुट्ठी की रफ्तार तेज हो गई, वह उस लंड को और जोर से, और तेजी से रगड़ने लगी। उनके बीच की हवा गर्म और भारी हो उठी, केवल चूमने की आवाज़ें और दोनों की तेज साँसें गूंजने लगीं।
विक्रम ने चुंबन तोड़ा, उसकी सांस फूल रही थी। "बस… अब बस," उसने कहा और मीरा का हाथ रोक दिया। उसने उसे खड़ा किया, उसके नीचे तक लटकी हुई सलवार को पूरी तरह उतारकर एक तरफ फेंक दिया। मीरा अब केवल अपनी कमीज़ और बटन खुली अंगिया में थी, जिसके नीचे से उसके स्तन लगभग बाहर झाँक रहे थे। विक्रम ने उसे दीवार की तरफ मोड़ दिया और अपने शरीर से उसके पीछे से सटा दिया। उसका सख्त लंड मीरा के नंगे चुतड़ों के बीच के गीले रास्ते पर टिक गया, अंदर नहीं, बस ऊपर से दबाव बनाते हुए।
"आह…" मीरा ने मुँह खोलकर कराह निकाली, उसने अपने हाथ दीवार पर टिका लिए। विक्रम ने उसकी अंगिया के पल्ले और फिरते, उसके स्तनों को पूरी तरह से बाहर निकाल लिया। उसने अपने दोनों हाथों से उन्हें सामने से दबोचा, मरोड़ा, जबकि अपनी जाँघों से मीरा को आगे-पीछे हिलाना शुरू किया। उसका लंड मीरा की चूत के ऊपरी हिस्से और भगशेफ को रगड़ता हुआ, एक जलन पैदा कर रहा था।
"विक्रम… अंदर… अब अंदर करो," मीरा हांफती हुई बोली, उसकी पीठ उसकी छाती पर रगड़ खा रही थी।
"जल्दी क्या है?" विक्रम ने उसके कान में कहा, अपने दाँतों से उसकी नर्म लोलकी को हल्का सा काटते हुए। "पहले यह रस तो पूरा निकल जाने दो।" उसने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को सीधा मीरा के छिद्र के द्वार पर टिकाया, बस घुसाया नहीं। दबाव इतना तीखा और लुभावना था कि मीरा की आँखों में पानी आ गया। उसने अपने चुतड़ों को पीछे की ओर दबाया, उसे अंदर लेने की कोशिश में, पर विक्रम ने उसे रोके रखा।
"मुझसे वादा कर… कि यह हमारा रहस्य रहेगा," विक्रम ने अचानक गंभीर स्वर में कहा, उसकी गति रुक गई।
मीरा ने सिर हिलाया, उसके बाल उसके पसीने से तर चेहरे से चिपक गए। "वादा… हाँ, वादा।"
यह सुनते ही, विक्रम ने अपने कूल्हों को एक ज़ोरदार धक्के में आगे बढ़ाया। उसका मोटा लंड, एक बार में, मीरा की तंग, गीली चूत के अंदर पूरी तरह से समा गया। मीरा के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली-उसकी साँस ही रुक गई, उसकी आँखें भय और आनंद से फैल गईं, जैसे उसके अंदर एक ज्वाला भर दी गई हो। विक्रम ने गहरी कराह भरी, उसने उसे और कसकर अपने से चिपका लिया, उसकी चूत के अंदरूनी हिलकोरों को महसूस करते हुए जो अब उसके लंड को घेर रही थीं।
वह पल जैसे जम गया। मीरा की चूत ने विक्रम के मोटे लंड को एक जबरदस्त खिंचाव के साथ निगल लिया था, अंदर की गर्म मांसपेशियाँ उस पर कसकर जकड़ बनीं। फिर, एक गहरी साँस के साथ, जीवन लौटा। विक्रम ने कराहते हुए अपना सिर उसकी गर्दन के पास दबा लिया, और धीरे से, एक इंच पीछे हटा। फिर वही धक्का, इस बार थोड़ा और गहरा, थोड़ा और तेज। मीरा की हिचकी जैसी साँस फिर से चलने लगी, उसके होंठ काँपे।
"ओह… भगवान…" उसने फुसफुसाया, उसकी उँगलियाँ दीवार पर खरोंचने लगीं।
विक्रम ने जवाब नहीं दिया। उसने अपने हाथ उसकी कमर से सरकाकर उसके नीचे से उठाए और उसके भरे हुए स्तनों को फिर से अपनी मुट्ठियों में कैद कर लिया। उसने उन्हें अपने हाथों के हिसाब से मोड़ा-तोड़ा, निप्पलों को उँगलियों के बीच दबाकर खींचा, जबकि उसके कूल्हे एक लय पकड़ने लगे। अंदर-बाहर। धीमा, फिर तेज। हर बार जब वह पूरी तरह से अंदर जाता, मीरा का मुँह खुल जाता, एक गूँगी कराह बाहर निकलने को बेताब होती।
उसने अपना मुँह मीरा के कान के पास लगाया। "कितनी तंग है… साली," उसने गुर्राकर कहा, उसकी साँसें गर्म और भारी थीं। "मेरा लंड तेरी चूत में घुसकर फूल गया है।"
यह अश्लील शब्द मीरा के शरीर में एक नई झुरझुरी दौड़ा गया। उसने अपने चुतड़ों को पीछे की ओर और दबाया, उसकी गति से मेल खाते हुए। अब आवाज़ें आने लगी थीं-गीलेपन की चुपचुपाहट, उनके पेटों के टकराने की आवाज, और दोनों की भारी, फुफकारती साँसें। बाहर का शोर अब बिल्कुल धुंधला पड़ चुका था।
विक्रम ने अपना एक हाथ छोड़ा और उसे मीरा के पेट के नीचे, उसके जघन के ऊपर ले गया। उसने अपना अँगूठा वहाँ दबाया, उसके भगशेफ को ढूँढ़ते हुए, जो अब पूरी तरह से उभर आया था। उसने उसे घुमाया, दबाया।
"आह! हाँ… वहाँ…" मीरा चीख उठी, उसकी आँखें एकदम से खुल गईं। उसकी चूत ने विक्रम के लंड को और जोर से कस लिया।
"हाँ… बोलो… और बोलो," विक्रम ने उकसाया, उसकी गति और तेज हो गई। उसका लंड अब पूरी रफ्तार से अंदर-बाहर हो रहा था, मीरा की गीली चूत से चिपचिपी आवाज़ निकल रही थी। उसने उसके बाल पकड़े और उसका सिर पीछे की ओर खींचा, उसकी लंबी गर्दन को नोचते हुए चूमना शुरू कर दिया। निशान छोड़ते हुए।
मीरा अब दीवार पर सहारा नहीं ले पा रही थी। उसका शरीर ढीला पड़ रहा था, आनंद के भार से लड़खड़ाता हुआ। विक्रम ने इसे महसूस किया। उसने अपने धक्कों की रफ्तार कम नहीं की, बल्कि उसे आगे की ओर झुकाते हुए, उसकी पीठ को एक मेहराब की तरह तान दिया। उसने अपना एक हाथ उसके मुँह के पास ले जाकर उसकी उँगलियाँ फैलाईं। "चूस… इन्हें चूस," उसने हुक्म दिया।
मीरा ने आँखें बंद करके उसकी दो उँगलियाँ अपने मुँह में ले लीं, उन्हें अपनी गर्म, नम जीभ से लपेट लिया। वह चूसने लगी, जैसे कोई बच्चा, उसकी आँखों के कोनों से आँसू छलकने लगे। यह दृश्य, और उसके मुँह का गर्म स्पर्श, विक्रम के लिए अंतिम धक्का साबित हुआ। उसकी साँसें तेज हो गईं, उसके धक्के अनियमित और जानवरों जैसे हो गए।
"अब… अब निकलने दो मुझे…" उसने दहाड़ते हुए कहा, उसकी मुट्ठियाँ मीरा के स्तनों को लगभग कुचल रही थीं।
मीरा ने अपना सिर हिलाया, उसकी चूत में एक तेज कंपकंपी दौड़ गई, जैसे वह भी कगार पर पहुँच रही हो। विक्रम ने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया, अपने आप को उसके अंदर पूरी तरह ठूँस दिया, और फिर उसका गर्म वीर्य उसकी गहराइयों में फूट पड़ा। उसकी कराह कमरे में गूंज गई। उसी क्षण, मीरा के शरीर में भी एक लंबा, ऐंठन भरा झटका दौड़ा, वह चिल्लाई, उसकी आवाज़ उसकी उँगलियों में दबकर दम घुटने जैसी हो गई। उसकी चूत ने विक्रम के लंड को जबरदस्ती से थाम लिया, उसके निकलते हुए रस को निचोड़ते हुए।
कुछ पलों तक वे वैसे ही खड़े रहे, एक-दूसरे से सटे हुए, साँसों से हांफते हुए, उनके शरीर एक-दूसरे के पसीने से चिपके हुए। फिर विक्रम धीरे से पीछे हटा। उसका लंड, अब नरम होता हुआ, बाहर निकला, उसके साथ ही सफेद रस की एक धार भी। मीरा ने अपनी आँखें खोलीं और दीवार की तरफ देखा, उसकी जाँघें काँप रही थीं। वह नीचे की तरफ फिसलने लगी, लेकिन विक्रम ने उसे पकड़ लिया। उसने उसे धीरे से मोड़ा और अपनी ओर खींच लिया, उसके चेहरे को अपनी छाती से लगा दिया। उसकी धड़कनें तेज और जोरदार थीं।
कुछ देर तक सन्नाटा रहा, सिवाय उनकी साँसों के। फिर विक्रम ने उसके बाल सहलाए। "अब तू मेरी हो गई," उसने फुसफुसाया, उसके कान के पास। उसकी आवाज़ में अब वासना नहीं, बल्कि एक अजीब सी कोमलता थी।
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसने अपनी बाँहें उसकी कमर के चारों ओर कस दीं, और अपना चेहरा उसके पसीने से तर बदन में और गहरा दबा दिया। बाहर, ढोल अब भी बज रहा था, शादी जारी थी। और उस बंद दरवाज़े के पीछे, एक नया, गुप्त रिश्ता अपने पहले श्वास ले रहा था।
विक्रम का पसीने से तर बदन मीरा के गाल से चिपक रहा था, उसकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। मीरा ने आँखें बंद करके उसकी छाती से लगे रहने का एहसास भरा, उसके शरीर से निकली मर्दाना गंध और अपनी चूत से रिसते उसके वीर्य की गर्माहट में खोई हुई। "तुमने… मुझे भर दिया," उसने एक टूटी हुई फुसफुसाहट में कहा।
विक्रम ने उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फिराईं। "हाँ, और अगली बार और भरूंगा।" उसकी आवाज़ में एक दावेदार कोमलता थी। बाहर से अचानक तेज़ होती ढोल की थाप और हँसी की आवाज़ें आईं। दोनों एकदम सचेत हो गए। विक्रम ने मीरा को हल्का सा अपने से अलग किया। "तुम्हें तैयार होना होगा।"
मीरा ने नीचे देखा। उसकी सलवार टखनों पर लटकी थी, अंगिया बटन खुली हुई, और उसके जघन से विक्रम का रस धीरे-धीरे बह रहा था। एक अजीब सी लाज ने उसे जकड़ा। विक्रम ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। "शर्म मत करो। यह तो सिर्फ शुरुआत है।" उसने कहा और अपनी धोती उठाकर खुद को साफ किया, फिर उसी धोती के एक कोने से मीरा के जाँघों के बीच का रस पोंछा। उसका यह इशारा इतना अंतरंग था कि मीरा की साँस फिर से रुक गई। उसकी उँगलियों का स्पर्श हल्का, पर दावेदार था।
"अब जल्दी करो," विक्रम ने कहा, और खुद धोती बाँधने लगा। मीरा ने काँपते हाथों से अपनी अंगिया के बटन लगाए, फिर सलवार ऊपर खींची। कपड़े उसके नम, संवेदनशील अंगों पर रगड़ खा रहे थे। विक्रम ने दरवाज़े के पास जाकर चुपचाप बाहर झाँका। "रास्ता साफ़ है। पहले तुम जाओ। सीधे बाथरूम की तरफ।"
मीरा ने एक बार उसकी तरफ देखा। विक्रम की आँखों में अब वह जंगली वासना नहीं, बल्कि एक गहरी, शांत चमक थी, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार पर निशाना साधकर संतुष्ट हो। उसने सिर हिलाया और दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली। गलियारे में उजाला था और दूर से गाने की आवाज़ आ रही थी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, उसकी जाँघों के बीच एक हल्का दर्द और गहरी तृप्ति थी।
वह बाथरूम में घुसी और दरवाज़ा बंद करते हुए अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी। उसकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं। शीशे में उसका चेहरा लाल, बाल बिखरे हुए, होंठ थोड़े सूजे हुए नज़र आए। उसने अपनी कमीज़ खोली और अपने स्तनों को देखा-उन पर विक्रम के हाथों के लाल निशान थे, निप्पल कठोर और लाल थे। उसने अपनी उँगली से एक निप्पल को छुआ और एक झुरझुरी महसूस की। फिर उसने अपनी सलवार फिर से खोली और अपनी चूत को देखा-थोड़ी सूजी हुई, लालिमा लिए हुए। उसने पानी चलाया और खुद को साफ करने लगी, पर विक्रम के वीर्य और उसकी अपनी चिपचिपाहट की गंध उसके नथुनों में समा गई।
इसी बीच, कमरे में विक्रम अकेला खड़ा उस जगह को देख रहा था जहाँ मीरा दीवार से सटी हुई थी। उसने जमीन पर पड़ी मीरा की चुनरी की पिन उठाई और उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया। एक खतरनाक मुस्कान उसके होंठों पर खेल गई। उसने कमरे को एक नज़र देखा, सुनिश्चित किया कि कोई सबूत न बचे, और फिर दरवाज़ा बंद करके धीरे से नीचे उतर गया, शादी के जश्न में फिर से सम्मिलित होने के लिए।
मीरा जब बाथरूम से बाहर निकली तो उसने खुद को समेटने की कोशिश की। उसने अपनी चुनरी ठीक की और होंठों पर हल्का सा लगाया। बाहर आते ही उसकी मुलाकात दुल्हन से हुई। "ओह मीरा! तू कहाँ थी? मैं तुझे ढूँढ़ रही थी!"
"बस… थोड़ा सिरदर्द हो रहा था," मीरा ने मुस्कुराने की कोशिश की।
दुल्हन ने उसकी तरफ गौर से देखा। "तेरे होंठ… कुछ ज्यादा ही लाल हैं। और गर्दन पर… क्या दाना है?"
मीरा का दिल धक से रह गया। विक्रम के चूमने के निशान। "कुछ नहीं, शायध मच्छर ने काट लिया।" उसने जल्दी से चुनरी का पल्ला संभाला। तभी उसकी नज़र बरातियों के झुंड में खड़े विक्रम पर पड़ी। वह दूर से ही उसे देख रहा था, एक गहरी, गोपनीय नज़र से। उसकी आँखों ने कहा-'तू मेरी है।' मीरा ने तुरंत नज़रें झुका लीं, पर उसके पेट के नीचे एक गर्म लहर दौड़ गई।
रात भर शादी का जश्न चला। मीरा हर पल उस नज़र को महसूस करती रही, हर बार जब वह उधर देखती, विक्रम कहीं न कहीं से उसे देख रहा होता-कभी पान की दुकान पर, कभी डीजे के पास, कभी अँधेरे में सिगरेट सुलगाते हुए। हर बार उनकी नज़रें मिलतीं और मीरा की चूत एक अजीब सी खुजली से भर उठती।
आखिरकार रात ढलने लगी। बारात विदा होने लगी। मीरा दुल्हन को विदा करने के लिए खड़ी थी। जब दूल्हा-दुल्हन गाड़ी में बैठे, तो विक्रम भी अपनी जीप के पास पहुँचा। उसने मीरा की तरफ एक आखिरी नज़र देखी, और बिना कुछ कहे, अपनी उँगलियों से हवा में एक नम्बर बनाया-'एक'। फिर जीप में बैठ गया। मीरा समझ गई। कल रात। उसकी झोपड़ी। एक का मतलब एक बजे।
गाड़ियाँ रवाना हो गईं। मीरा खड़ी हवेली के बरामदे में, अँधेरे में घुलती जा रही थी। उसके शरीर पर विक्रम के हाथों के निशान अब भी जल रहे थे, और उसकी चूत में उसके लंड की याद ताजा थी। एक निषिद्ध रिश्ता जन्म ले चुका था, और अब वह एक गहरी, अँधेरी नदी में बहने को तैयार थी। उसने अपनी बाँहों को अपने स्तनों पर लपेटा और एक गहरी, काँपती साँस भरी। आगे क्या होगा, वह नहीं जानती थी, पर एक बात जानती थी-वह अब पहले वाली मीरा नहीं रही।