गाँव की गर्मी और पति के दोस्त का राज






PHPWord


🔥 गाँव की गर्मी में पति के दोस्त की नज़रों का खेल

🎭 सुहानी की चूतड़ों पर टिकी नज़रें, जब पति शहर गया तो दोस्त ने पूरी रात उसकी गांड को निहारा। अब हर छूट में उसके निप्पलों का खिंचाव और होंठों का खेल शुरू हो गया है।

👤 सुहानी (25): गोरी, उभरे हुए स्तन, कसी हुई कमर और मोटे चूतड़। शादी के बाद भी वासना की भूख मिटी नहीं। पति का दोस्त उसकी गीली फंतासियों में आता है।

राहुल (28): पति का बचपन का दोस्त, मजबूत बदन, गहरी नज़रें। सुहानी को देखकर उसका लंड तन जाता है। वह जानता है कि यह गलत है पर चूत की गर्माहट के ख्याल से रुक नहीं पाता।

📍 गाँव की झोपड़ी, दोपहर की तपिश। पति काम से शहर गया हुआ है। राहुल आया तो सुहानी अकेली थी। पसीने से भीगी कुर्ती उसके निप्पलों का आकार दिखा रही थी। राहुल की नज़र वहीं अटक गई।

राहुल ने आवाज दी, "सुहानी, पानी दे दो।" सुहानी ने घूंघट सँभाला, पर नज़रें नीची न हुईं। उसने मटके से पानी भरा। जब गिलास देने झुकी तो राहुल की नज़र उसके स्तनों की खाई में चली गई। सुहानी ने महसूस किया, एक अजीब गर्माहट फैली। राहुल ने जानबूझकर उसकी उँगलियाँ छू लीं। "तुम्हारे हाथ बहुत नर्म हैं," उसने कहा। सुहानी ने चौंककर हाथ खींचा, पर मुस्कुरा दी। "तुम भी क्या कहते हो," उसने हँसते हुए कहा। राहुल ने पानी पीया और गिलास लौटाते हुए उसकी कलाई पकड़ ली। "तुम्हारी चूड़ियाँ खनकती हैं तो मेरा दिल धड़कता है।" सुहानी ने इस बार हाथ नहीं खींचा। उसकी साँसें तेज हो गईं। राहुल ने धीरे से उसकी बाँह पर उँगलियाँ फिराईं। "पति तो शहर गया है, तुम अकेली नहीं डरती?" सुहानी ने सिर हिलाया, "तुम हो न।" उसकी आवाज़ में एक काँपन था। राहुल ने करीब आकर उसके कान में फुसफुसाया, "आज रात मैं तुम्हारी चौखट पर पहरा दूँगा।" सुहानी की चूत में एक झुरझुरी दौड़ गई। वह बोली, "ऐसी बातें मत करो।" पर उसकी आँखों ने कुछ और कहा। राहुल ने उसकी ठुड्डी उठाकर निहारा, "तुम्हारे होंठ कितने सुंदर हैं।" सुहानी ने अपने होठों को दबाया। उसकी नज़रें बात कर रही थीं। राहुल ने धीरे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा। सुहानी ने कराहने जैसी आवाज निकाली। "नहीं… यह ठीक नहीं," वह बुदबुदाई। पर उसका शरीर उसकी बात से इनकार कर रहा था। राहुल ने उसे और पास खींच लिया। उनके शरीर एक दूसरे से टकराए। सुहानी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। राहुल के सीने की गर्मी उसे सुलगा रही थी। "कल शाम को तुलसी के पीछे मिलना," राहुल ने कहा और चला गया। सुहानी वहीं खड़ी रही, उसकी चूत गीली हो चुकी थी।

सुहानी की टांगें काँप रही थीं। वह धीरे से दरवाज़े की ओट में खिसकी और अपने सीने पर हाथ रखकर देखा। उसकी धड़कनें अभी भी तेज़ थीं। राहुल के शब्द-'तुलसी के पीछे'-उसके कान में गूंज रहे थे, जैसे कोई गर्म साँस। वह रसोई में गई और पानी का घूँट भरकर पिया, पर गले की सूखन नहीं जा रही थी। उसकी नज़र अपनी गीली कुर्ती पर पड़ी, जहाँ निप्पल साफ़ उभरे हुए थे। एक बेकाबू ख्याल आया-राहुल की मज़बूत उँगलियाँ उन निप्पलों को दबोच रही हैं। उसने आँखें मूँद लीं, एक कराह निकल गई।

शाम ढलने तक वह बेचैन रही। हर आहट पर उसकी चूत सिकुड़ती। आखिरकार, जब साँझ की लालिमा फैली, वह तुलसी के चबूतरे की ओर चल पड़ी। उसने एक ढीली सी साड़ी ओढ़ी थी, पर अंदर से उसकी चोली बिना घुंघट के थी। तुलसी की झाड़ियों का साया गहरा था। वह खड़ी ही थी कि एक गर्म हाथ ने पीछे से उसकी कमर को पकड़ लिया।

"मुझे पता था तुम आओगी," राहुल की फुसफुसाहट उसके गले से लगकर आई। उसकी साँसें सुहानी की गर्दन को छू रही थीं। सुहानी ने करवट ली, उनकी नज़रें टकराईं। राहुल की आँखों में एक नटखट चमक थी। उसने अपना हाथ उसकी साड़ी के पल्लू से होते हुए उसकी जांघ पर सरकाया। "इतनी गर्म क्यों हो, सुहानी?" उसने पूछा।

"तुम… तुम्हारी वजह से," सुहानी ने होंठ काटते हुए कहा। राहुल ने उसकी ठुड्डी पकड़ी और चेहरा थोड़ा और ऊपर उठाया। "ये होंठ तो मुझे चबाने के लिए बने हैं," कहते हुए उसने अपना अंगूठा उसके निचले होंठ पर रखा, हल्के से दबाया। सुहानी की सांस अटक गई। उसने अपनी जीभ से अनजाने में उस अंगूठे को छू लिया। यह देख राहुल की आँखों में आग भड़क उठी।

उसने दूसरे हाथ से सुहानी की चोली के गाँठ खोल दिए। कपड़ा ढीला हुआ और उसके भरे हुए स्तन बाहर झाँकने लगे। ठंडी हवा के छूते ही उसके निप्पल और सख्त हो गए। "अरे बाप रे… क्या चूची है," राहुल ने कंपकंपाती आवाज़ में कहा और बिना देर किए एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया। सुहानी ने एक तीखी कराह निकाली, उसने राहुल के बालों में हाथ फँसा दिए। उसकी गर्म, गीली जीभ निप्पल के चारों ओर चक्कर लगा रही थी, कभी चूसती, कभी दाँतों से हल्का कसती।

"चुप रहो… कोई सुन लेगा," राहुल ने मुँह हटाकर फुसफुसाया, पर उसका दूसरा हाथ सुहानी की साड़ी के अंदर सरक चुका था। उसकी उँगलियाँ उसके चुतड़ों की गर्म गद्दी पर मालिश करने लगीं, फिर उस खाँचे की ओर बढ़ीं जहाँ से गीली गर्माहट रिस रही थी। सुहानी ने अपनी जांघें थोड़ी खोल दीं, एक साफ़ निमंत्रण। राहुल की उँगली उसकी चूत के ऊपरी हिस्से पर फिरने लगी, क्लिट को ढूँढ़ते हुए। जैसे ही उसने वह नर्म बटन दबाया, सुहानी का शरीर ऐंठ गया। "हाँ… वहीं… ओह राहुल," वह दबी हुई कराह में बुदबुदाई।

राहुल ने उसे तुलसी के चबूतरे की ओर धकेला, उसकी पीठ नम दीवार से टिक गई। उसने सुहानी की साड़ी को घुटनों तक सरका दिया और अपने घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया। "पहले तो मैं इस मधु का स्वाद लूँ," उसने कहा और अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच धंसा दिया। सुहानी ने आसमान की ओर देखा, तारे टिमटिमा रहे थे, पर उसकी दुनिया में अब सिर्फ़ वह जीभ थी जो उसकी चूत की गर्म सुरंग में उतर-चढ़ कर लपलपा रही थी। उसकी उँगलियाँ दीवार को कुरेदने लगीं, शरीर में झुरझुरी की लहर दौड़ गई। राहुल ने उसकी गांड को मज़बूती से पकड़ा और और तेज़ी से चाटना शुरू किया, उसकी कराहों को निगलते हुए। सुहानी ने अपने आप को रोकना चाहा, पर शरीर ने आत्मसमर्पण कर दिया-एक जोरदार झटके के साथ उसकी चूत सिकुड़ी और गर्मी फूट पड़ी। वह हांफने लगी, पैरों में जान नहीं थी। राहुल ने चेहरा उठाया, उसकी ठुड्डी गीली थी। "अभी तो यह शुरुआत है, सुहानी," उसने एक शैतानी मुस्कुराहट के साथ कहा और खड़ा होकर अपनी पैंट का बटन खोलने लगा।

राहुल की पैंट घुटनों तक खिसक गई। उसका लंड तनी हुई नसों के साथ सुहानी की ओर उभरा हुआ था, गर्म हवा में थोड़ा फड़कता हुआ। सुहानी की नज़र उस पर चिपक गई, आँखें फैली हुईं, मुँह से एक हल्की सी आह निकल गई। "इतना… बड़ा," उसने बुदबुदाया, जैसे खुद से कह रही हो।

राहुल ने आगे बढ़कर उसकी जांघों के बीच अपने घुटने टिका दिए। उसने सुहानी की साड़ी के पल्लू से उसका पेट ढका, पर स्तन अभी भी खुले हुए थे। "डर लग रहा है?" राहुल ने उसकी नाभि पर हल्का सा चुटकी काटते हुए पूछा।

"नहीं… बस…" सुहानी की बात पूरी नहीं हुई क्योंकि राहुल ने अपने लंड का सिरा उसकी गीली चूत के ऊपर रख दिया, बिना अंदर घुसे, बस दबाया। एक गर्म, नम संपर्क। सुहानी का सिर दीवार से टकराया, उसने अपनी जांघें और खोल दीं। "अंदर… दालो ना," वह हांफती हुई बोली।

"जल्दी क्या है," राहुल ने नटखट अंदाज़ में कहा। उसने लंड को ऊपर-नीचे करते हुए उसकी चूत की लेईदार गर्मी से बाहरी हिस्से को भिगोया, क्लिट के ऊपर गोल-गोल घुमाया। सुहानी की कराहें गहरी होती गईं। उसने राहुल के कंधों पर हाथ रख दिए, नाखून गड़ाने लगी। "ऐसे ही… ऐसे ही नहीं… पूरा चाहिए," वह गिड़गिड़ाई।

राहुल ने एक हाथ से उसकी गांड को खींचा, दूसरे हाथ से अपना लंड सीधा किया। "तू ही बता, कितना चाहिए?" उसने कान में कहा और धीरे-धीरे दबाव बढ़ाने लगा। सुहानी की चूत के होठ उस मोटे सिरे को चूसने लगे, थोड़ा-थोड़ा अंदर खींचते हुए। फिर एक झटके में, राहुल ने कमर आगे की और पूरा लंड अंदर धंसा दिया।

सुहानी का मुँह खुला रह गया, एक लंबी, दबी हुई चीख निकली। अंदर की तंग, गर्म गद्दी ने राहुल के लंड को चारों ओर से लपेट लिया। "हरामजादी… कितनी तंग है," राहुल कराहा और थोड़ा रुका, दोनों के शरीर का रोमांच महसूस करते हुए। फिर उसने धीरे-धीरे चलाना शुरू किया, हर धक्के पर सुहानी की पीठ दीवार से रगड़ खाती।

सुहानी ने आँखें बंद कर लीं, उसकी दुनिया में अब सिर्फ़ वह लय थी-अंदर-बाहर, गहरा, भरपूर। राहुल का हर ज़ोरदार धक्का उसके गर्भ तक जाता हुआ महसूस होता। उसने अपने पैर राहुल की कमर पर लपेट दिए, उसे और गहराई तक खींचते हुए। "ज़ोर से… और ज़ोर से," वह फुसफुसाई।

राहुल ने गति तेज़ की। उसके वंडे की आवाज़ हवा में गूंजने लगी, चूत के भीगे हुए शब्दों के साथ मिलकर। उसने सुहानी के एक निप्पल को मुँह में ले लिया, दूसरे को उँगलियों से मसलने लगा। सुहानी का सिर पागलों की तरह हिल रहा था, उसके बाल बिखर गए थे। "मैं… मैं निकलने वाली हूँ," वह चिल्लाने लगी।

"रुक," राहुल ने गर्जना की और उसकी गर्दन पर दाँत गड़ा दिए। उसने सुहानी को दीवार से हटाकर जमीन पर लिटा दिया, खुद उसके ऊपर। अब धक्के और भी बेरहम थे। सुहानी की चूत से पानी की धारा-सी बहने लगी, जमीन गीली हो गई। राहुल ने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं और अंतिम प्रहार किए। सुहानी का शरीर काँप उठा, एक लंबा, गहरा झटका उसकी रीढ़ से होता हुआ चूत में फूटा। उसकी कराहें रात की खामोशी में घुल गईं।

राहुल ने भी एक कंपकंपी महसूस की, उसने लंड को और गहराई में धकेला और गर्म रस उड़ेल दिया। सुहानी के अंदर भरते उस तरल की गर्माहट ने उसे एक बार फिर मरोड़ दिया। दोनों हांफते रहे, पसीने और शरीर की गंध में लिपटे हुए।

थोड़ी देर बाद, राहुल ने खुद को खींचा और बैठ गया। सुहानी अभी भी जमीन पर पड़ी थी, आँखें बंद, होठों पर एक थकी हुई मुस्कान। राहुल ने उसकी जांघ पर हाथ फेरा। "अब डर लगेगा?" उसने पूछा।

सुहानी ने आँखें खोलीं। "तुम्हारे साथ? कभी नहीं," उसने कहा और बैठकर उसके होठों को चूम लिया, एक नम, नमकीन चुंबन। दूर से कुत्ते की भौंकने की आवाज़ आई। सुहानी चौंकी, "अब तुम जाओ, कोई आ सकता है।"

राहुल ने कपड़े सँभाले। "कल फिर मिलेंगे?" उसने कहा। सुहानी ने सिर हिलाया, एक गुप्त मुस्कान के साथ। वह उठी, साड़ी समेटी। राहुल जाने लगा, तो उसने पीछे से उसकी बाँह पकड़ी। "राहुल… यह हमारा राज है," उसने कहा।

"हमेशा के लिए," राहुल ने जवाब दिया और अंधेरे में खो गया। सुहानी वहीं खड़ी रही, उसकी चूत में अभी भी उसके लंड की गर्मी धड़क रही थी।

सुहानी की चूत में अभी भी उसके लंड की गर्मी धड़क रही थी। अगली सुबह, जब पहली किरणें आँगन में फिसल रही थीं, सुहानी चूल्हे के पास बैठी रोटी बना रही थी। तभी दरवाज़े की चिक खनकी। राहुल ने सिर झुकाकर अंदर प्रवेश किया, उसकी नज़रें सीधी सुहानी के झुके हुए कंधों पर टिक गईं, जहाँ से चोली का पल्लू थोड़ा सरक गया था।

"कल रात की गर्मी अभी तक नहीं उतरी?" राहुल ने धीमी, भरी हुई आवाज़ में पूछा, और बिना इंतज़ार किए उसके पास आकर बैठ गया। उसका हाथ सुहानी की नंगी पीठ पर फिरा, पसीने की नमी को छूता हुआ। सुहानी ने एक झटका खाया, पर रोटी सेंकना नहीं रोका। "तुम… इतनी सुबह?" उसने कहा, उसकी साँसें फिर से तेज़ होने लगी।

राहुल ने अपना मुँह उसके कान के पास लाया, उसके बालों को होंठों से छुआ। "तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया," उसने फुसफुसाया, और अपनी उँगली उसकी कमर पर बंधी चोली के फीते पर रख दी। एक हल्का खिंचाव देकर उसने गाँठ ढीली कर दी। सुहानी ने सीना ताना, चोली का कपड़ा थोड़ा और खिसक गया। "रोटी जल जाएगी," वह बुदबुदाई, पर उसका हाथ राहुल की जांघ पर जा पहुँचा।

राहुल ने उसका चेहरा अपनी ओर मोड़ा, उनकी नज़रें मिलीं। "रोटी से ज्यादा तो तुम जल रही हो," उसने कहा और अपना अंगूठा उसके निचले होंठ पर रखकर हल्का दबाया। सुहानी ने आँखें मूंद लीं, उसकी जीभ ने अनायास ही उस अंगूठे को छू लिया। यह देख राहुल ने उसकी ठुड्डी पकड़ी और उसे पीछे की ओर झुकाया, गर्दन की नसों को अपने होंठों से टटोलने लगा। सुहानी की साँस फूलने लगी, उसने रोटी का सामान एक तरफ रख दिया।

राहुल ने उसे धीरे से चूल्हे से दूर खींचा, और अपनी गोद में बिठा लिया। सुहानी की पीठ उसके सीने से टकराई, उसने महसूस किया कि राहुल का लंड फिर से तन चुका है। "आज तुम मुझे खिलाओगी," राहुल ने उसके कान में कहा, और अपने हाथ उसकी चोली के अंदर सरका दिए। उसकी उँगलियाँ सीधे निप्पलों पर जा पहुँचीं, उन्हें घुमा-घुमाकर दबाने लगीं। सुहानी ने सिर पीछे को झटका, एक गहरी कराह निकल गई।

"चुप, कोई सुन लेगा," राहुल ने मज़ाक किया, पर उसकी उँगलियाँ और तेज़ हुईं। दूसरे हाथ से उसने सुहानी की घुटनों तक सरकी साड़ी को और ऊपर सरका दिया, उसकी जांघों के मुलायम मांस को बेरहमी से दबोचा। सुहानी ने अपनी टाँगें थोड़ी और खोल दीं, एक स्पष्ट निमंत्रण। राहुल की उँगली उसकी चूत के बाहरी होंठों पर फिसलने लगी, जो पहले ही गीले हो चुके थे। "कल रात के बाद भी इतनी गर्म?" उसने हैरानी भरी आवाज़ में पूछा।

"तुम्हारी वजह से… हमेशा," सुहानी हांफती हुई बोली, और अपने हाथ पीछे करके राहुल के जांघों पर रख दिए, उसके कड़े लंड को महसूस किया। राहुल ने एक तेज झटके के साथ उसकी चोली उतार दी, उसके भारी स्तन हवा में झूलने लगे। उसने आगे झुककर एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया, जबकि दूसरा हाथ सुहानी की चूत की ओर बढ़ा। उसकी दो उँगलियाँ बिना रुके अंदर घुस गईं, गर्म और तंग मांस में खो जाते हुए।

सुहानी चिल्लाने ही वाली थी कि राहुल ने उसका मुँह अपने हाथ से ढक लिया। "शांत," उसने आदेश दिया, और उँगलियाँ तेजी से चलाने लगा। सुहानी का शरीर उछलने लगा, उसकी चूत से गीली आवाज़ें निकल रही थीं। राहुल ने उसके निप्पल को दाँतों से कसकर दबाया, जिससे सुहानी में एक नई ऐंठन दौड़ गई। वह तेजी से सांस लेने लगी, उसकी आँखों में पानी भर आया।

"अब," राहुल ने कहा और उसे आगे की ओर झुकाया, घुटनों के बल बिठा दिया। खुद उठकर उसके पीछे खड़ा हो गया। उसने सुहानी के चुतड़ों को मज़बूती से पकड़ा, अपना लंड उसकी गीली चूत के द्वार पर रगड़ने लगा। "माँग," उसने

"माँग," उसने गर्दन पर गर्म साँस फेंकते हुए दोहराया।

"तुम… तुम्हारा सब कुछ," सुहानी हांफती हुई बोली, और अपने चुतड़ों को पीछे की ओर धकेल दिया। यही इशारा काफी था। राहुल ने कमर पर जोर दिया और अपना लंड उसकी गीली चूत के भीतर धँसा दिया। एक साथ, गहरा और पूरा। सुहानी के मुँह से दबी हुई चीख निकली, उसने अपना सिर नीचे झुका लिया, हाथ जमीन पर टिका दिए। राहुल ने झटके से खींचा और फिर जोर से धकेला, उसकी गांड की गद्दी अपने पेट से टकराई।

"हाँ… ऐसे ही… ओह राम," सुहानी कराह उठी, उसकी चूत तेजी से सिकुड़ रही थी। राहुल ने एक हाथ से उसकी लटकती चूचियाँ पकड़ीं, दूसरे से उसकी कमर को कसकर पकड़ लिया। हर धक्के के साथ सुहानी आगे की ओर झटका खाती, उसके स्तन हवा में लहराने लगते। चूल्हे की आग उनके पसीने से चमकती त्वचा पर नारंगी रोशनी फेंक रही थी।

राहुल ने गति धीमी की, बस अंदर घुमाते हुए। "बोलो, किसकी चूत है यह?" उसने कान में कहा, होंठ उसकी गर्दन को चूमते हुए।

"तेरी… सिर्फ तेरी, राहुल," सुहानी ने मुंह घुमाकर उसकी ओर देखा, आँखों में पानी और पुकार थी। राहुल ने उसके होंठों पर जबरदस्ती चुंबन ठोंक दिया, जीभ अंदर घुसेड़ दी। इसी बीच उसकी कमर ने फिर जोर पकड़ा, धक्के तेज और गहरे होने लगे। सुहानी की कराहें चुंबन में दबने लगीं।

वह उसे और नीचे झुकाता गया, जब तक कि उसका सीना जमीन से नहीं टकरा गया। अब राहुल पूरी तरह उस पर लेट गया, उसकी पीठ पर अपना वजन डालते हुए। उसने सुहानी के बाल पकड़े और उसका सिर थोड़ा उठाया। "देख, कैसे चोद रहा हूँ तुझे," वह गुर्राया। सुहानी ने आँखें खोलीं और अपने सामने पड़ी एक टूटी ईंट में अपना धुंधला प्रतिबिंब देखा-बिखरे बाल, भटकती आँखें, और उसके पीछे राहुल का तनाव भरा चेहरा।

राहुल का एक हाथ आगे सरककर उसकी चूत के ऊपरी हिस्से पर आया, जहाँ उसका लंड अंदर-बाहर हो रहा था। उसने अंगूठे से क्लिट को दबाया और घुमाया। सुहानी का शरीर अकड़ गया, एक तीखी चीख उसके गले से निकलने ही वाली थी कि राहुल ने उसका मुँह हाथ से दबा दिया। "शोर मत कर, पड़ोसी जाग जाएँगे," उसने दबी हँसी के साथ कहा, और अपनी गति और बढ़ा दी। अब धक्के इतने बेलगाम थे कि सुहानी का शरीर जमीन पर आगे-पीछे खिसकने लगा।

सुहानी की चूत में एक ज्वाला सी धधक उठी, वह उसकी लय में खो चुकी थी। उसने अपने हाथ पीछे करके राहुल की जांघों को खींचा, उसे और गहरा करने के लिए उकसाया। राहुल की साँसें उसके कान में गर्म तूफान की तरह बज रही थीं। "मैं… मैं निकलने वाली हूँ," वह हाथ के अंदर से हांफी।

"रुक," राहुल ने कहा और अचानक रुक गया, बिल्कुल अंदर डूबा हुआ। उसने सुहानी को पलट दिया, उसकी पीठ जमीन से टिकी। सुहानी की आँखें विस्फारित थीं, शरीर पूरी तरह समर्पण में झूल रहा था। राहुल ने उसकी टाँगें चौड़ी की और फिर से प्रवेश किया, पर इस बार धीरे-धीरे, हर इंच को महसूस करते हुए। "अब निकल," उसने आदेश दिया।

यह आज्ञा ही काफी थी। सुहानी का शरीर ऐंठ गया, उसकी चूत में एक लहरदार संकुचन शुरू हो गया। वह चिल्लाई, पर राहुल ने उसके होंठ चूस लिए, उसकी आवाज़ को अपने अंदर निगल लिया। उसकी रिलीज़ की लहरों ने राहुल के लंड को और उत्तेजित कर दिया। वह कुछ और तेज, कुछ और गहरे धक्के देकर खुद भी फूट पड़ा, गर्म तरल की धारा उसकी चूत की गहराइयों में भरते हुए।

दोनों कुछ देर तक स्थिर पड़े रहे, केवल साँसों का कलरव हवा में मिल रहा था। फिर राहुल ने खुद को निकाला और बगल में लेट गया। सुहानी ने आँखें खोलीं, सीने का उतार-चढ़ाव धीमा पड़ रहा था। "तुम्हारे बिना अब एक पल भी नहीं रहा जाएगा," वह बुदबुदाई।

राहुल ने उसके पेट पर बिखरे पसीने को हाथ फेरकर साफ किया। "फिर कभी नहीं जाना पड़ेगा," उसने कहा, और उठकर अपनी पैंट की तलाश करने लगा। तभी बाहर से पैरों की आहट सुनाई दी। दोनों जम गए। आवाज़ साफ़ थी-कोई आँगन की ओर बढ़ रहा था।

दोनों की साँसें रुक गईं। राहुल ने त्वरित नज़र से चारों ओर देखा-आँगन में छिपने की कोई जगह नहीं थी, सिवाय चूल्हे के पास पड़े लकड़ी के ढेर के। उसने सुहानी को एक झटके में खींचकर उस ओर धकेल दिया, खुद उसके ऊपर झुक गया, दोनों का शरीर लकड़ियों की ओट में समा गया। सुहानी की नंगी छाती राहुल के सीने से दबी, उसकी धड़कनें एक दूसरे से टकरा रही थीं।

पैरों की आहट नज़दीक आती गई। "सुहानी?" एक बुढ़िया की आवाज़ आई, पड़ोसिन मुन्नी दाई। "बेटी, थोड़ा नमक तो दे देना।"

सुहानी ने राहुल की आँखों में देखा, डरी हुई, पर उसकी आवाज़ स्थिर रखी। "जी दाई, आ जाऊँ?" वह बोली, पर राहुल ने उसकी कमर को कसकर पकड़ लिया, उसे हिलने नहीं दिया।

"नहीं बेटा, मैं ही ले आती हूँ। तू चूल्हे पर बैठी होगी," मुन्नी दाई की आवाज़ और नज़दीक आई। उनकी परछाईं आँगन के दरवाज़े पर पड़ी।

इसी बीच राहुल का हाथ, जो सुहानी की पीठ पर था, नीचे सरककर उसके नंगे चुतड़ों पर आ गया। उसने एक नटखट मुस्कान बिखेरी और उसकी गांड के मुलायम गोलों को जोर से दबोचा। सुहानी ने आँखें विस्फारित कर दीं, एक कराह गले में ही रुक गई। उसने राहुल का हाथ पकड़कर हटाना चाहा, पर वह और जोर से दबाने लगा।

मुन्नी दाई अब रसोई के दरवाज़े के बाहर खड़ी थीं। "अरे, यहाँ तो रोटी जली पड़ी है। सुहानी? कहाँ गई बेटी?"

राहुल ने अपना मुँह सुहानी के कान के पास लगाया। "बोलो, नमक कहाँ रखा है?" उसने बेहद धीमे स्वर में कहा, और साथ ही अपनी एक उँगली उसकी चूत के भीगे होंठों के बीच से फिरने लगी, बिना अंदर घुसे, बस ऊपर-नीचे। सुहानी ने अपने दाँतों से होठ दबा लिए, शरीर में एक जबर्दस्त कंपन दौड़ गया।

"नमक… नमक बिल्कुल कोने वाले डिब्बे में है," सुहानी ने जितना संभव हो सका स्थिर आवाज़ में जवाब दिया, पर उसकी आवाज़ का अंतिम हिस्सा हल्का सा काँप गया क्योंकि राहुल की उँगली ने अचानक उसकी चूत के संकरे द्वार पर दबाव डाला।

"अच्छा बेटी, मैं ले जाती हूँ। तू काम से लौटी तो मिलती हूँ," मुन्नी दाई की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होने लगी। उनके कदमों की आहट मद्धिम पड़ गई।

पर राहुल ने रुकने का नाम नहीं लिया। खतरा टलते ही उसने अपनी वही उँगली थोड़ी और अंदर धकेल दी, आधी इंच भर। सुहानी ने अपना सिर राहुल के सीने पर गिरा दिया, एक लंबी, दमित साँस छोड़ी। "पागल हो क्या? वो अभी गई भी नहीं," वह फुसफुसाई।

"तभी तो मज़ा आ रहा है," राहुल ने कहा और उसकी गर्दन चूमते हुए उसकी चूत में उँगली का दबाव बढ़ा दिया। वह उँगली अंदर-बाहर होने लगी, धीरे-धीरे, चिपचिपी आवाज़ करते हुए। सुहानी ने अपनी उँगलियाँ राहुल की पीठ में घोंप दीं, उसकी कमीज़ को मुट्ठी में भींच लिया। उसकी साँसें गर्म और तेज थीं, जैसे अभी-अभी दौड़कर आई हो।

"वो लौट सकती है… हमें यहाँ से हटना चाहिए," सुहानी ने कहा, पर उसका शरीर विरोध नहीं कर रहा था। उसकी जांघें खुल गई थीं, राहुल के हाथ को और गहराई तक आमंत्रित कर रही थीं।

"तब तक एक छोटा सा टेस्ट तो ले ही लेते हैं," राहुल बुदबुदाया और अपनी उँगली पूरी तरह अंदर धंसा दी, फिर तुरंत दूसरी उँगली लगा दी। सुहानी की चूत तंग थी, गर्म और सिकुड़ी हुई। उसने अपना माथा राहुल के कंधे पर टिका दिया, मुँह खोलकर साँस लेने लगी। राहुल ने उँगलियाँ मरोड़ीं, एक गोलाकार गति में, उसके अंदर के नर्म मांस को उत्तेजित करते हुए।

दूर, गली में मुन्नी दाई के किसी से बात करने की आवाज़ आई। यह सुनते ही सुहानी में एक नई हड़बड़ी दौड़ गई, पर साथ ही एक अजीब उत्तेजना भी। खतरे का डर और शारीरिक सुख का मेल उसे और भी गीला कर रहा था। राहुल ने यह महसूस किया और अपनी उँगलियों की गति तेज कर दी।

"छोड़ो… नहीं तो मैं चिल्ला दूँगी," सुहानी ने धमकी दी, पर उसकी आवाज़ में दर्द नहीं, वासना थी।

"चिल्ला दो, सबको बता दो कि राहुल तेरी चूत में उँगलियाँ घुमा रहा है," वह चिढ़ाते हुए बोला और अपना अंगूठा उसके क्लिट पर दबा दिया, जोर से घुमाया।

सुहानी का शरीर ऐंठ गया। उसने अपना मुँह राहुल के कंधे पर दबा लिया ताकि कोई आवाज़ न निकले। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ने लगी, राहुल की उँगलियों को चूसते हुए। वह काँपने लगी, एक गहरी, मूक झड़ी की कगार पर खड़ी थी। राहुल ने उसकी यह हालत देखी और उसके कान में फुसफुसाया, "आज रात, गोबर के ढेर के पीछे। मैं तेरे अंदर अपना सारा माल उड़ेलूँगा।"

यह वादा ही काफी था। सुहानी के अंदर एक सुनामी सी उठी, वह राहुल की उँगलियों पर झरने लगी, शरीर में लगातार झटके दौड़ते रहे। राहुल ने उसे कसकर पकड़े रखा, उसकी हर कंपकंपी को महसूस किया, जब तक कि वह शिथिल नहीं पड़ गई।

फिर उसने धीरे से उँगलियाँ निकालीं और सुहानी के मुँह के पास ले गया। "सफाई करो," उसने आदेश दिया। सुहानी ने आँखें खोलीं, उसकी नज़रों में अभी भी धुंध थी। फिर उसने राहुल की उँगलियाँ अपने होंठों में ले लीं और चूसकर साफ किया, एक लंबी, धीमी गति में। राहुल ने उसके बाल सहलाए।

"अब उठो, और कपड़े संभालो," राहुल ने कहा, और खुद लकड़ियों के ढेर से सरककर बैठ गया। सुहानी ने अपनी चोली और साड़ी समेटी, उसके हाथ काँप रहे थे। पर उसके होठों पर एक विजयी मुस्कान थी। खतरा अभी टला नहीं था, पर वासना ने एक नया रास्ता खोल दिया था।

रात गहराते ही सुहानी गोबर के ढेर के पीछे वाले खेत के कोने में पहुँच गई। चारों ओर सन्नाटा था, केवल झींगुरों की आवाज़ और दूर कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। वह एक पेड़ के सहारे खड़ी थी, उसकी साड़ी हवा में लहरा रही थी। तभी एक हाथ ने पीछे से उसकी आँखें ढक लीं। "किसका इंतज़ार कर रही थी?" राहुल की गहरी आवाज़ ने उसकी रीढ़ में करंट दौड़ा दिया।

सुहानी ने मुड़कर उसे देखा। राहुल ने केवल एक लुंगी पहन रखी थी, उसका ऊपरी धड़ नंगा था, मांसपेशियाँ चाँदनी में चमक रही थीं। "तुम्हारा," उसने कहा और अपने होंठ उसके सीने पर रख दिए। राहुल ने उसके बालों में हाथ फेरा, फिर उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। "आज कोई नहीं बचाएगा तुझे," उसने कहा और उसके होंठों पर जबरदस्ती चुंबन ठोंक दिया। यह चुंबन हिंसक था, भूखा। सुहानी ने आत्मसमर्पण कर दिया, उसकी जीभ ने राहुल की जीभ का स्वागत किया।

राहुल ने उसे पेड़ के तने से सटाकर दबोच लिया। उसके हाथों ने सुहानी की साड़ी के ब्लाउज के बटन तोड़ दिए। कपड़ा फटा और उसके स्तन बाहर आ गए। चाँदनी में उसके निप्पल काले और सख्त दिख रहे थे। "इन चूचियों को तो मैं दिन-रात चूसना चाहता हूँ," राहुल बुदबुदाया और झुककर एक को अपने मुँह में ले लिया, दूसरे को उँगलियों से मरोड़ने लगा। सुहानी ने सिर पीछे को फेंका, एक लंबी कराह निकल गई।

फिर राहुल ने उसे धीरे से घास पर लिटा दिया। उसने सुहानी की साड़ी को पूरी तरह खोल दिया, उसके नंगे शरीर पर चाँदनी फैल गई। उसकी नज़रें उसकी चूत पर टिक गईं, जो पहले से ही गीली और खुली थी। "तू तो पूरी तैयार बैठी थी," उसने कहा और अपनी लुंगी उतार फेंकी। उसका लंड पहले से ही कड़ा और लंबा था, नसें उभरी हुईं।

वह उसके पैरों के बीच आ गया। "आज मैं तेरी चूत को कभी न भरने वाली याद दिलाऊँगा," राहुल ने कहा और अपने लंड का सिरा उसकी गीली चूत के द्वार पर रखकर घुमाने लगा। सुहानी ने अपनी जांघें और चौड़ी कर दीं, उसकी एड़ियाँ जमीन में धंस गईं। "बस अब मत तरसाओ," वह गिड़गिड़ाई।

राहुल ने धीरे से दबाव डाला। लंड का मोटा सिरा चूत के भीतर प्रवेश करने लगा। सुहानी ने आँखें मूंद लीं, उसके होंठ काँपने लगे। राहुल ने एक झटके में आधा लंड अंदर धंसा दिया। सुहानी की साँस रुक गई, उसने राहुल के बाजू पकड़ लिए। "पूरा… सारा देना," वह हांफी।

राहुल ने कमर से जोर लगाया और पूरा लंड अंदर डाल दिया। सुहानी चिल्लाई, पर राहुल ने उसका मुँह अपने हाथ से दबा लिया। "शांत," उसने कहा और गति शुरू की। हर धक्का गहरा और भरपूर था। सुहानी की चूत से चिपचिपी आवाज़ें निकल रही थीं, उसकी गांड घास पर रगड़ खा रही थी।

राहुल ने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं और कोण बदल दिया। अब हर प्रहार सीधा उसके गर्भाशय के द्वार से टकराता। सुहानी का शरीर उछलने लगा, उसकी चूचियाँ हवा में काँप रही थीं। "हाँ… ठीक वहीं… ओह राहुल!" वह चीखने लगी। राहुल ने उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ा और और तेज़ी से चोदना शुरू किया। उसका पसीना सुहानी के पेट पर गिर रहा था।

सुहानी ने अपने हाथों से घास उखाड़ी, वह क्लाइमेक्स के कगार पर पहुँच चुकी थी। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ने लगी। "मैं निकलने वाली हूँ!" उसने चेतावनी दी। राहुल ने गति और बढ़ा दी, उसका सीना सुहानी के स्तनों से टकराने लगा। "साथ निकलेंगे," वह गुर्राया।

फिर वह आया, एक जबर्दस्त झटका। सुहानी की चूत में गर्मी की लहर फूट पड़ी, उसका शरीर ऐंठ गया, उसकी चीख रात में खो गई। राहुल ने भी गहरी कराह भरी और अपना गर्म तरल उसकी गहराइयों में उड़ेल दिया। धक्के धीमे होते गए, पर दोनों एक दूसरे से चिपके रहे।

कुछ देर बाद राहुल ने खुद को निकाला और बगल में लेट गया। सुहानी साँस लेने की कोशिश कर रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। राहुल ने उसे अपनी ओर खींचा। "रो क्यों रही है?" उसने पूछा।

"क्योंकि यह गलत है… और मैं इसे फिर चाहूँगी," सुहानी ने कहा और उसकी छाती से चिपक गई। राहुल ने उसके बाल सहलाए। "जब तक तेरा पति लौटे, हर रात तुझे यही याद दिलाता रहूँगा," उसने वादा किया।

वे उठे, कपड़े संभाले। सुहानी ने फटा हुआ ब्लाउज अपने सीने से लगाया। राहुल ने उसे एक चुंबन दिया, कोमल इस बार। "कल फिर," वह बोला और अंधेरे में विलीन हो गया। सुहानी खड़ी रही, उसकी चूत में उसका वीर्य टपक रहा था, एक गुनाहगार गर्माहट जो अब उसकी पहचान बन चुकी थी।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *