🔥 पति ने ही बुलाया दोस्त को मेरी चूत तोड़ने…
🎭 गाँव की गर्मियों में, पति के शहर जाते ही, उसका नटखट दोस्त मेरी देह का हर कोना नापने आता है। पति के गुप्त आदेश पर, वह मेरी वासना को चरम पर ले जाने का खेल रचता है, जहाँ हर छूट जानलेवा तनाव से भरी है।
👤 प्रिया (22): घने काले बाल, मखमली गोरी त्वचा, भरी हुई चूचियाँ, कसी हुई कमर और मजबूत चुतड़ों वाली। शादी के बाद भी अतृप्त कामना की आग में जलती है, जो पति का दोस्त देखकर भड़क उठती है।
राहुल (26): पति विकास का बचपन का दोस्त, खेतों में काम करता है, मजबूत बदन, आँखों में शैतानी, हरकतों में नटखटपन। विकास की गुप्त इच्छा जानकर प्रिया को रिझाने का खेल शुरू करता है।
📍 सेटिंग/माहौल: छोटा सा गाँव, आम का बाग़, दोपहर की चिलचिलाती धूप। पति शहर गया हुआ है। राहुल का आना-जाना आम बात है, पर आज उसकी नज़रों में एक नया खेल है।
🔥 कहानी शुरू: दोपहर की गर्मी में मैं आँगन में चारपाई पर लेटी थी। पसीने से मेरी साड़ी का रेशमी ब्लाउज चिपक रहा था, चूचियों के उभार साफ़ दिख रहे थे। तभी किवाड़ की चिक खनकी। "भाभी, अकेली हो?" राहुल की आवाज़ ने मेरे शरीर में करंट सा दौड़ा दिया। वह अंदर आया, उसकी नज़रें सीधे मेरे उभारों पर टिक गईं। "विकास भैया ने कहा है… तुम्हारी देखभाल करने को," उसने मुस्कुराते हुए कहा, आवाज़ में एक अलग ही मिठास। मैं घबराकर उठ बैठी, साड़ी सँभाली। "क्या… क्या कहा उन्होंने?" राहुल करीब आया, उसके हाथ ने मेरा कंधा छुआ। "कहा… तुम्हें रिलैक्स करने को। तनाव में हो तुम।" उसकी उँगलियों की गर्माहट ने मेरी रूह तक कँपकँपी पैदा कर दी। मैं हिल नहीं पा रही थी। उसने धीरे से मेरी ठुड्डी पकड़कर मेरा चेहरा उठाया। "डरो मत… ये सब तुम्हारे पति की इच्छा है।" फिर उसने मेरे होंठों के पास अपना चेहरा लाकर कान में फुसफुसाया, "वो जानना चाहते हैं… तुम कितनी गर्म हो सकती हो।" उसकी साँसें मेरे कान को गुदगुदी कर रही थीं। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह मेरी एक लट पकड़कर सूँघने लगा। "चलो, आज पहला पाठ शुरू करते हैं।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। मेरा शरीर उसके स्पर्श के आगे ढहता चला गया। वर्जना और वासना के बीच एक खतरनाक खेल का पहला पड़ाव शुरू हो चुका था।
उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे चारपाई से उठाया और आँगन के छायादार कोने की ओर ले चला, जहाँ आम के पेड़ की घनी डालियाँ धूप को रोक रही थीं। उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर एक अजीब कसाव के साथ थीं, जो आज्ञा देने वाली थी पर स्पर्श में नर्मी भी छिपी थी। "यहाँ… ज़रा ठंडी हवा लगेगी," उसने कहा, और मेरी पीठ को पेड़ के मोटे तने से सटा दिया। उसका शरीर अब सीधा मेरे सामने था, इतना करीब कि उसके कमीज़ के बटन मेरे ब्लाउज को छू रहे थे।
"पहला पाठ… शरीर की भाषा समझना," राहुल ने धीरे से कहा, और उसकी नज़रें मेरे होठों से होती हुई मेरी गर्दन पर टिक गईं। उसने अपना अंगूठा उठाकर मेरे होठों के कोने को सहलाया, फिर नीचे सरकाकर मेरी गर्दन की नब्ज पर रख दिया। "देखो… धड़कन इतनी तेज़," उसने मुस्कुराते हुए फुसफुसाया, "ये झूठ नहीं बोलती, भाभी।" मेरी साँसें अटकी हुई थीं। उसने अपना दूसरा हाथ मेरी कमर पर रखा, उँगलियाँ धीरे से मेरी पीठ के निचले हिस्से पर घूमने लगीं, साड़ी के पल्लू के ऊपर से ही एक खिंचाव पैदा कर रही थीं।
फिर उसने अचानक अपना सिर झुकाया और मेरे कंधे की नंगी त्वचा पर, ब्लाउज के फीते के पास, अपने गर्म होंठ रख दिए। एक लंबी, गर्म साँस छोड़ी। मेरा शरीर सिहर उठा। "राहुल… नहीं," मैंने कराहते हुए कहा, लेकिन मेरे हाथ उसे धक्का देने के बजाय उसकी बाँहों पर टिके रहे। "श्श्श… बस महसूस करो," उसने कान में गुंजन भरी आवाज़ में कहा, और उसके होंठ मेरे कंधे पर हल्के-हल्के चूमने लगे, हर चुंबन के साथ नीचे सरकते हुए, ब्लाउज के नेकलाइन के किनारे तक।
उसका हाथ अब मेरी कमर से उठकर मेरे पेट पर आया, फिर ऊपर सरकता हुआ मेरे स्तनों के नीचे पहुँच गया। मैंने एक तीखी साँस भरी। उसकी हथेली का गर्म दबाव मेरी चूची के नीचे महसूस हो रहा था, बस एक परत रेशमी कपड़े की दूरी पर। "तुम्हारे पति ने कहा था… तुम्हारी चूचियाँ बहुत संवेदनशील हैं," उसने मेरे कान में कहते हुए, अपनी हथेली को हलके से घुमाया, जिससे मेरा निप्पल कपड़े के अंदर कड़ा होकर उभर आया। मैंने अपनी आँखें मूँद लीं, एक दमित कराह निकल गई।
"आँखें खोलो, प्रिया," उसने आज्ञा दी। मैंने धीरे से पलकें उठाईं। उसकी शैतानी आँखें सीधे मेरी आँखों में घुस रही थीं। "देखो, मैं कुछ नहीं कर रहा… बस तुम्हारे शरीर की बात सुन रहा हूँ।" और तभी, उसने अपनी उँगली का इशारा बदला और अंगूठे से सीधे मेरे कपड़े के ऊपर से निप्पल को दबाया, एक हल्की, घूमती हुई गति में। एक ज्वाला मेरी रीढ़ में दौड़ गई। मेरे घुटने कमज़ोर पड़ने लगे।
वह मुस्कुराया, अपना मुँह मेरे मुँह के इतना करीब लाया कि हमारी साँसें मिलने लगीं। "दूसरा पाठ… सच्ची इच्छा को स्वीकार करना।" उसके होंठ मेरे होंठों से बाल-बाल बच रहे थे, हर शब्द पर उनका स्पर्श होता प्रतीत होता था। "तुम चाहती हो न, कि मैं इस ब्लाउज के फीते खोल दूँ? इस चिपचिपी गर्मी में इसे उतार फेंकूँ?" मैं कोई जवाब नहीं दे पाई, बस उसकी ओर देखती रही, मेरा शरीर उसकी हथेली के दबाव में पिघलता जा रहा था। उसने अपना हाथ और दबाया, मेरी चूची को अपनी उँगलियों में ले लिया, कपड़े के अंदर ही निप्पल को चिकोटी कसते हुए। मेरा सिर पीछे की ओर झटका, तना हुआ गला पेड़ के तने से टकराया।
"हाँ… बस इतना ही काफी है पहले दिन के लिए," उसने अचानक कहा, और अपना हाथ हटा लिया। शरीर पर से उसका दबाव कम हुआ और एक अजीब खालीपन छा गया। उसने मेरी ठुड्डी फिर से पकड़ी। "विकास भैया को बताना होगा कि तुमने पहला टेस्ट पास कर लिया।" वह पीछे हट गया, लेकिन उसकी नज़रें अब भी मेरे स्तनों पर चिपकी हुई थीं, जहाँ रेशमी ब्लाउज अब निप्पलों के उभार से चिपक कर पूरी तरह से आकार दे रहा था। "कल… हम दूसरे पाठ पर काम करेंगे।" और इतना कहकर वह मुड़ा, धीरे-धीरे आँगन से बाहर की ओर चला गया, मुझे पेड़ से सटी, साँसें अभी भी तेज़, शरीर में एक नई जलन लिए हुए।
उसके जाने के बाद भी मेरा शरीर उसी जगह सटा रहा, जैसे पेड़ से चिपक गया हो। कानों में उसकी फुसफुसाहट गूंज रही थी, और जहाँ उसकी उँगलियों ने निप्पल को दबाया था, वहाँ एक अजीब सी गुदगुदी भन्नाहट छूट गई थी। मैंने धीरे से अपना हाथ उठाया और ब्लाउज के ऊपर से अपनी चूची को छुआ। कपड़ा गीला था-पसीने से या कुछ और से, मैं समझ नहीं पा रही थी। दिल की धड़कन अब भी नाटकीय रूप से तेज़ थी।
अगली सुबह, गर्मी और भी भीषण थी। मैं आँगन में बैठी मटके से पानी पी रही थी कि फिर वही आवाज़-"भाभी, दूसरा पाठ याद है न?" राहुल दरवाज़े पर खड़ा था, आज उसने सफेद बनियान पहनी थी, जिससे उसकी मजबूत भुजाएँ और चौड़ी छाती साफ़ उभर रही थी। उसकी नज़रें सीधे मेरे हाथों पर पड़ीं, जो मटका पकड़े हुए थीं। "प्यास लगी है?" वह मुस्कुराया, और बिना इजाज़त अंदर आ गया।
वह इतना करीब आ गया कि उसके शरीर की गर्मी मुझे महसूस होने लगी। उसने मेरे हाथ से मटका ले लिया, और उसी जगह से, जहाँ मैंने होंठ लगाए थे, उसने घूँट भरा। उसकी आँखें मेरी आँखों में घुसी रहीं, गले का हरक कंठ निगलता हुआ साफ़ दिख रहा था। "तुम्हारा पानी… बहुत मीठा है," उसने कहा, और मटका वापस करने के बजाय, उसने अपनी उँगली डालकर बची हुई बूँदें निकालीं, फिर वही गीली उँगली अपने होंठों पर रखकर चाटी।
"आज… हम touch की भाषा सीखेंगे," उसने कहा, और अचानक उसने अपना हाथ मेरी कमर के पीछे से लपेट दिया, मुझे अपनी ओर खींच लिया। हमारे पेट एक दूसरे से सट गए। मेरी साड़ी का पल्लू हिला, और मेरी नंगी त्वचा उसकी बनियान के खुरदरे कपड़े से रगड़ खाने लगी। "तुम्हारा दिल फिर तेज़ धड़क रहा है," उसने मेरे कान में कहा, अपना मुँह मेरे बालों में दबाए हुए। उसकी साँसें मेरी गर्दन को गर्म कर रही थीं।
उसका दूसरा हाथ मेरे पीठ के निचले हिस्से पर चला गया, मेरे चुतड़ों के ऊपरी हिस्से को, साड़ी के अंदर से, एक मजबूत पकड़ में ले लिया। उसने मुझे और दबाया, जिससे मेरा धड़ उसकी ओर और मुड़ गया। "इस हिस्से में… बहुत ताकत है," उसने फुसफुसाया, और अपनी उँगलियों से मेरी गांड की मांसपेशियों को कसते हुए दबाने लगा, एक rhythm में, जैसे कोई मालिश कर रहा हो, पर हर दबाव के साथ एक नटखट इरादा साफ़ झलकता था।
मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया, एक कराह मेरे गले में फँस गई। उसने मेरे चुतड़ों को पकड़कर मुझे हल्का-सा ऊपर उठाया, फिर नीचे दबाया, जिससे मेरा जाँघों का हिस्सा उसके जाँघों से रगड़ खाने लगा। वहाँ, उसकी लंबी पतलून के अंदर, एक सख्त उभार साफ़ महसूस हो रहा था। मेरी साँस रुक सी गई। "होश में रहो, प्रिया," उसने कहा, और अपना एक हाथ मेरे सिर के पीछे से ले जाकर मेरे बालों की चोटी पकड़ ली, एक कोमल खिंचाव देते हुए, मेरा चेहरा ऊपर उठाया।
उसके होंठ अब मेरी गर्दन के बीचों-बीच, गरदन की नस पर थे। उसने जीभ से हल्का सा स्पर्श किया, फिर दाँतों से कोमल कश लिया। मेरा पूरा शरीर ऐंठ गया। "ये… ये निशान…" मैंने हाँफते हुए कहा। "तुम्हारे पति को दिखाने के लिए," उसने जवाब दिया, और उस जगह को चूमते हुए, अपनी गर्म जीभ से सहलाने लगा।
फिर, बहुत धीरे से, उसने मेरे ब्लाउज के फीते की ओर अपना हाथ बढ़ाया। "आज का पाठ… कपड़ों की बाधा को दूर करना।" उसकी उँगलियाँ फीते के गाँठ पर पहुँचीं। एक-एक करके, उसने गाँठें खोलनी शुरू कीं। हर गाँठ खुलने पर मेरा स्तन थोड़ा और खुलता गया, रेशमी कपड़ा अलग होकर हवा में लहराया। ठंडी हवा का स्पर्श मेरे निप्पलों पर बिजली सा दौड़ गया। उसने आखिरी गाँठ खोली, और ब्लाउज के दोनों पल्लू अलग हो गए, मेरे स्तन पूरी तरह से उसकी नज़रों के सामने आ गए, केवल एक पतली सी साड़ी की चुन्नट ने निप्पलों को ढँक रखा था।
राहुल ने एक गहरी, तृप्त साँस ली। "बहुत… बहुत सुंदर," उसने बुदबुदाया। उसने अपना सिर झुकाया और अपने होंठों से, सीधे मेरे बाएँ निप्पल के ऊपर से, उस पतले कपड़े को हटाते हुए, एक लंबा, गर्म चुंबन लगाया। कपड़ा गीला होकर चिपक गया, निप्पल का कड़ा आकार उभर आया। उसने जीभ से घेरा बनाया, फिर हल्के से चूसा। मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मैंने उसके कंधों पर हाथ टिका दिए, स्वयं को संभालने के लिए। वह दाएँ स्तन की ओर बढ़ा, उसी अद्भुत नर्मी के साथ, पर आज उसमें एक तीव्रता थी, एक दावेदारी। हर चूसने, हर दाँतों के हल्के कटने के साथ, मेरे निचले पेट में एक गहरा, दर्दनाक आनंद उमड़ने लगा। वह जानता था कि वह मेरे शरीर का नक्शा पढ़ रहा है, और हर प्रतिक्रिया उसे और बेधड़क बना रही थी।
उसने मेरे दाएँ निप्पल को अपने दाँतों के बीच में हल्का सा दबाया, एक ऐसा दर्द जो सीधे मेरे चूत तक जाता हुआ महसूस हो रहा था। मेरी एक कराह उसके मुँह में दब गई। उसने अपना सिर उठाया, उसकी आँखें अब धुंधली और गहरी लग रही थीं। "अब… चलो थोड़ा और आगे बढ़ते हैं," उसने कहा, और उसके हाथ मेरी कमर से सरककर मेरे साड़ी के पल्लू के किनारे पर आए।
उसकी उँगलियों ने साड़ी की चुन्नट को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की ओर खींचना शुरू किया। ठंडी हवा मेरी जाँघों पर लहराई। मैंने बेहोशी में अपना हाथ उसकी कलाई पर रख दिया, लेकिन वह रुका नहीं। "श्श्श… बस देखो," उसने फुसफुसाया, और साड़ी का कपड़ा मेरे घुटनों, फिर जाँघों को उघाड़ता हुआ ऊपर चढ़ने लगा। मेरी चूत पर लगी हुई नमी अब खुली हवा में चुभन पैदा कर रही थी।
उसने पल्लू को मेरी कमर पर रोक दिया, मेरे निचले पेट और जाँघों का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह से नंगा हो गया था। उसकी नज़रें वहाँ टिक गईं, जहाँ मेरे बालों का गुच्छा नमी से चमक रहा था। "कितनी… गर्म है यहाँ," उसने बुदबुदाया, और अपना अंगूठा वहाँ रख दिया, बिल्कुल ऊपर, मेरी चूत की ओपनिंग के ठीक ऊपर। उसने कोई दबाव नहीं डाला, बस वहीं टिका रहा, उसकी गर्माहट मेरी त्वचा में समा रही थी। मेरा पूरा ध्यान उस एक इंच के स्पर्श पर केंद्रित हो गया।
फिर उसने अपनी तर्जनी उठाई और मेरी चूत के ऊपरी होंठ पर, बिल्कुल बीच में, एक लंबवत रेखा में नीचे की ओर सरकाई। कपड़े से मुक्त, गीली त्वचा पर उसकी उँगली का स्पर्श इतना तीखा था कि मैं झटके से उछल पड़ी। "सहलाने दो," उसने कहा, और उसने वही उँगली फिर से ऊपर से शुरू करते हुए, हल्के से दबाव के साथ, मेरी पूरी स्लिट को नापा, ठीक उस जगह पर रुकते हुए जहाँ से गर्म तरल रिस रहा था। उसने उँगली को वहाँ घुमाया, फिर मेरी नज़रों के सामने उठा दिया। उँगली का अगला हिस्सा चमकदार और गीला था। उसने मुस्कुराते हुए उसे अपने होंठों के बीच में ले लिया और धीरे से चाटा। "तुम्हारा स्वाद… शहद से भी मीठा है, भाभी।"
मैं हाँफने लगी, मेरे हाथ अब उसके बालों में खोदे जा रहे थे। उसने फिर से अपना हाथ नीचे किया, इस बार दो उँगलियों से। उसने मेरी चूत के होंठों को अलग किया और उसकी नोक मेरे छेद के बाहर टिका दी। "राहुल… प्लीज," मैंने अनजाने में गिड़गिड़ाई। "प्लीज क्या, प्रिया?" उसने पूछा, अपनी उँगली को बस इतना घुसाया कि सिर्फ़ पोर अंदर जाए। "इसको अंदर आने दो? या रुक जाऊँ?" उसने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा। मैं कुछ नहीं बोल पाई, बस अपनी पलकें झपकाती रही। यह देखकर वह मुस्कुराया और उँगली को धीरे से, एक टेढ़ी गति से, पूरी तरह से अंदर डाल दिया।
एक गहरी, भरी हुई कराह मेरे गले से निकली। अंदर की गर्मी और तंगी ने उसकी उँगली को चूस लिया। उसने गति देनी शुरू की, आराम से, उँगली को बाहर निकालते और फिर से घुसाते हुए। उसका अंगूठा ऊपर, मेरे क्लिट पर घूमने लगा। "ये रही… तुम्हारी असली भाषा," उसने कर्कश स्वर में कहा, और अपना मुँह मेरे मुँह पर जमा दिया, मेरी हर कराह और सिसकी को अपने अंदर खींचते हुए। उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ने लगी, जबकि नीचे उसकी उँगली तेजी से चल रही थी, अब एक और उँगली के नोक को दबाव डालकर अंदर धकेलने की कोशिश कर रही थी।
मेरी पीठ मेड़े से रगड़ खा रही थी, मेरे पैर जमीन पर टिके रहने के बजाय हवा में लटकने लगे थे। वह मेरी चूत में दो उँगलियाँ घुमा रहा था, एक गोलाकार, खोदने वाली गति में, जिससे अंदर की गहराई तक एक दर्दनाक आनंद फैल रहा था। उसने मेरा पल्लू और ऊपर खींचा, मेरी गांड के निचले हिस्से को भी उजागर कर दिया। उसकी दूसरी हथेली वहाँ आई और उसने मेरे एक चुतड़ को जोर से दबाया, उँगलियाँ मेरी चूत के पास से होकर मेरी गांड के छेद के ठीक ऊपर वाली नर्म त्वचा पर आ टिकीं।
"विकास भैया सही कहते हैं… तुम एक ज्वाला हो," उसने मेरे होंठों के बीच में गुर्राया, और उसकी उँगलियों की गति और तेज हो गई, अब वह पूरी लंबाई में आ-जा रही थीं, गीलेपन की आवाज़ हवा में गूंजने लगी। मैं उस पर लटक गई, मेरी चेतना सिर्फ़ उसके हाथों की गति और निचले पेट में जमा हो रही उस विस्फोटक गर्मी पर टिकी थी, जो तेजी से फैल रही थी और किसी भी क्षण फूटने को तैयार थी।
उसकी उँगलियों के तेज़ होते हर थपथपाहट के साथ मेरे भीतर की गाँठें टूटने लगीं। मेरी साँसें फूलकर छोटी-छोटी हाँफों में बदल गईं। उसने मेरी ठुड्डी पकड़कर मेरा चेहरा अपनी ओर घुमाया, उसकी नज़रें मेरी आँखों में गड़ गईं। "देखो मुझे… जब तुम फूटो," उसने आज्ञा दी, और उसके अँगूठे ने मेरे क्लिट पर एक तेज, घूमता दबाव डाला।
वह विस्फोट अचानक, अथक और पूरे शरीर को झकझोर देने वाला था। एक लंबी, कंपकंपी कराह मेरे गले से फूटी और मेरा धड़ उसकी उँगलियों पर झटके से अकड़ गया। मेरी चूत उसकी उँगलियों को जकड़ते हुए तेजी से सिकुड़ी। राहुल ने गुर्राते हुए अपनी गति धीमी कर दी, पर रुकी नहीं, बल्कि मेरे ओर्गास्म की लहरों को और लंबा खींचते हुए कोमल थपथपाहट जारी रखी। "बस… बस यही… पूरी तरह बह जाओ," वह फुसफुसाया, और उसने मेरे होंठों को अपने होंठों से दबा दिया, मेरी सिसकियों को निगलता चला गया।
धीरे-धीरे मेरे शरीर का तनाव कम हुआ। उसने अपनी उँगलियाँ बाहर निकालीं, जो अब पूरी तरह चमकदार और लसदार थीं। उसने उन्हें मेरी आँखों के सामने धीरे से हिलाया, फिर अपनी जीभ से साफ़ किया। "दूसरा पाठ पूरा हुआ," उसने कहा, पर उसकी आँखों में संतुष्टि नहीं, बल्कि और गहरी भूख थी। उसकी नज़र मेरी अभी भी खुली हुई, काँपती चूत पर टिकी थी।
उसने मुझे पेड़ से थोड़ा अलग किया और अपने घुटनों के बल नीचे उतर आया। उसकी हथेलियों ने मेरी जाँघों को पकड़ा और उन्हें थोड़ा और चौड़ा किया। "अब… तीसरा पाठ," उसने कहा, और बिना किसी चेतावनी के, उसने अपना मुँह मेरी चूत पर जमा दिया।
गर्म, नम जीभ का पहला स्पर्श मेरे ठंडे पड़ चुके शरीर में एक नया झटका दौड़ा गया। उसने लंबी, चौड़ी लकीरें खींचनी शुरू कीं, ऊपर से नीचे तक, मेरी पूरी स्लिट को गीला करता हुआ। फिर उसने अपने होंठों से मेरे चूत के होंठों को पकड़ा और कोमलता से चूसा। हर चूसने के साथ एक अजीब सी खिंचाव की sensation मेरे पेट के निचले हिस्से तक जाती। मैंने अपने हाथ उसके घने बालों में धँसा दिए।
वह अपनी नोकीली जीभ लेकर मेरे छेद के चारों ओर चक्कर लगाने लगा, कभी दबाते हुए, कभी बस हल्का सा टैप करते हुए। फिर उसने जीभ की नोक को अंदर धकेलने की कोशिश की, थोड़ा, और थोड़ा और। यह उसकी उँगलियों से अलग, नरम पर गहरा एहसास था। मेरी एड़ियाँ जमीन में गड़ गईं और मैंने अपनी गांड को उसके मुँह की ओर थोड़ा और धकेला। उसने एक गहरी सराहना भरी आवाज़ निकाली और अपने हाथों से मेरे चुतड़ों को और खोलते हुए, अपनी जीभ को और गहराई तक पहुँचाया।
कुछ ही पलों में वह फिर से मेरे क्लिट पर लौट आया, अब पूरी एकाग्रता से उस पर ही केंद्रित हो गया। वह जीभ से तेज, छोटे-छोटे हल्के स्पर्श करता, फिर उसे अपने होंठों के बीच लेकर तेजी से चूसता। नया सैलाऊ उमड़ने लगा, पहले से भी तेज और बेकाबू। मेरे घुटने काँपने लगे। "राहुल… मैं फिर…" मेरी आवाज़ एक फुसफुसाहट थी।
उसने जवाब नहीं दिया, बस अपनी नाक मेरी चूत से रगड़ते हुए, अपनी गति और तेज कर दी। दूसरा ओर्गास्म एक सुनामी की तरह आया, मुझे पेड़ से सटाकर झकझोरता हुआ। मैं चिल्लाई, लेकिन उसने अपना मुँह हटाया नहीं, बल्कि मेरी तरंगों को चूसता रहा, जब तक कि मेरा शरीर थककर लटक नहीं गया।
वह उठ खड़ा हुआ, उसके होंठ चमक रहे थे। उसने अपने पतलून का बटन खोला और ज़िप नीचे की। उसकी लंड बाहर आई, कड़ी, मोटी और नसों से उभरी हुई। उसने इसे अपने हाथ में लिया और मेरी चूत के गीले होंठों पर टिका दिया, सिर्फ़ सिरे से हल्का दबाव देते हुए। "अब आखिरी पाठ, प्रिया… असली चीज़। तुम्हारा पति जानना चाहता है कि तुम किसी और के लंड में कैसी लगती हो।"
उसके लंड का गर्म सिरा मेरी चूत के नम होंठों पर बस ऐसे ही टिका रहा, एक अधूरा वादा। उसने कोई जल्दबाजी नहीं की, बस अपनी निगाहें मेरी आँखों में गड़ाए रखीं, मेरे चेहरे पर हर भाव को पढ़ता रहा। मेरी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं, निचले पेट में एक और ऐंठन उठ रही थी, जैसे मेरा शरीर स्वयं उस अधूरे स्पर्श से तृप्ति माँग रहा हो।
"डर रही हो?" उसने धीरे से पूछा, अपने लंड को बस इतना हिलाया कि वह मेरी स्लिट के ऊपर एक नन्ही, गीली रेखा खींच गया। मैंने सिर हिलाया, फिर इनकार में सिर हिलाया, अपनी भावनाओं में खोई हुई। उसकी एक हथेली मेरे गाल पर आई। "जो तुम्हारा पति चाहता है… वो तुम भी तो चाहती हो, न?" उसने कहा, और आखिरकार, उसने अपने कूल्हों को आगे बढ़ाया।
उस लंड के सिरे ने मेरे छेद के तंग मुंह पर दबाव डाला, एक सेकंड के लिए रुका, फिर धीरे से अंदर की गर्मी में समा गया। केवल एक इंच, पर वह इंच मेरे भीतर की हर नस को जगा गया। मेरा मुँह खुला रह गया, एक मूक कराह हवा में लटक गई। उसकी आँखें अब तंग हुईं, संतुष्टि की एक झलक उनमें तैर गई। "कितनी… गर्म और तंग है," उसने कर्कश स्वर में कहा, और उसने अपने हाथों से मेरे चुतड़ों को मजबूती से पकड़ा।
फिर, एक लंबी, नियंत्रित गति में, उसने और अंदर धकेला। यह उसकी उँगलियों से कहीं ज्यादा मोटा, कहीं ज्यादा भरने वाला था। मेरी चूत के अंदर की मांसपेशियाँ अनायास सिकुड़ीं, उसकी लंबाई को अपनाने की कोशिश करते हुए। वह पूरी तरह अंदर तक नहीं गया, बस आधा। उसने रुककर मुझे एडजस्ट होने का समय दिया, उसकी साँसें भी भारी हो रही थीं। उसका माथा मेरे माथे से टकराया। "सही लग रहा है न, भाभी?" उसने फुसफुसाया।
मैं हाँ में सिर हिला पाई, मेरे हाथ उसकी पीठ पर चले गए, उसकी पसली से उभरी नसों को महसूस करते हुए। यह स्वीकृति थी। उसने एक गहरी साँस ली और फिर, अपने कूल्हों को पीछे खींचा, लगभग बाहर तक, फिर वही धीमी, जानबूझकर बनाई गई गति से वापस अंदर आया। हर thrust के साथ, वह थोड़ा और गहरा जाता। उसकी गति एक सम्मोहक rhythm बनाती गई-आराम से, फिर भी हर बार अंदर जाते हुए एक दावेदारी के साथ।
उसका एक हाथ मेरी कमर से ऊपर सरककर मेरे उलझे हुए ब्लाउज में घुसा और मेरे निप्पल को पकड़ लिया। उसने उसे जोर से दबाया, दबाव को अपने thrusts के साथ सिंक्रोनाइज़ किया। दर्द और आनंद की एक नई लहर ने मुझे घेर लिया। मेरी कराहें अब लगातार निकल रही थीं, हर बार जब वह मेरी गहराई को छूता। "हाँ… ऐसे ही… अपनी आवाज़ छोड़ो," वह गुर्राया, और उसकी गति में थोड़ी तेजी आई।
उसका लंड अब पूरी तरह से अंदर जा चुका था, हर बार मेरी चूत की गहराई तक पहुँचता, एक ऐसी जगह जिसे मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मेरी पीठ की छाल से रगड़ खाकर त्वचा लाल हो रही थी, पर उस दर्द का एहसास दब गया था उस आनंद के आगे जो मेरे भीतर बढ़ रहा था। उसने मेरे पैरों को और चौड़ा किया, मुझे थोड़ा और ऊपर उठाया, और एक नए एंगल से thrust करना शुरू किया, जिससे उसका लंड सीधा मेरी गर्दन के निचले हिस्से में टकराने लगा। एक तीखी, मीठी चुभन ने मुझे चौंका दिया। मेरे नाखून उसकी पीठ में घुस गए।
"वाह… यहाँ है न तुम्हारी असली चाभी?" उसने कहा, और उसने उसी जगह पर लगातार target करना शुरू कर दिया, छोटे, तेज thrusts देते हुए। मेरा शरीर बेतहाशा झटके खाने लगा, एक और ओर्गास्म तेजी से निर्माण हो रहा था, पहले के दोनों से कहीं ज्यादा शक्तिशाली। "रुको… मैं फिर…" मैं हाँफी।
"नहीं," उसने दबी हुई गुर्राहट में कहा, उसकी गति अब भी नियंत्रित थी पर और भी गहरी होती जा रही थी। "इसे और रोको… महसूस करो कि कैसे मैं तुम्हें भर रहा हूँ।" उसने मेरा चेहरा पकड़ा और मेरे होंठ चाटे। "तुम्हारा पति कल फोन करेगा… और तुम्हें बताना होगा कि कैसा लगा।"
यह सोचकर, कि विकास इस सबके बारे में जानता है और चाहता है, एक अजीब सी वर्जित उत्तेजना ने मुझे और भर दिया। मैंने उसे अपनी पूरी ताकत से चूमा, मेरी जीभ उसके मुँह में घुस गई। वह हैरान रह गया, फिर जवाब दिया, हमारे चुंबन की हिंसा हमारे नीचे के जोड़ से मेल खाने लगी। उसकी thrusts अब लयबद्ध नहीं रह गई थीं, बल्कि जानवरों जैसी, भूखी और अनियंत्रित होती जा रही थीं। पेड़ का तना हमारे वजन से हिल उठा, पत्तियाँ सरसराईं।
मैंने अपनी एड़ियाँ उसकी पीठ के निचले हिस्से पर जमा दीं, उसे और अंदर खींचा। यह इशारा उसके लिए आखिरी संकेत था। उसकी एक लंबी, कंपकंपी कराह निकली और उसने मुझे जकड़ लिया, मेरी चूत की गहराई में गर्म फुहारों का सैलाऊ छोड़ते हुए। यह एहसास ही मेरे लिए ट्रिगर बना। मेरा ओर्गास्म एक ऐसी तीव्रता के साथ आया जिसने मेरी दृष्टि को सफेद कर दिया, मेरा गला बैठ गया एक लंबी, भरी हुई चीख में। मेरी चूत उसके लंड के इर्द-गिर्द तेजी से सिकुड़ी, उसकी हर last drop निचोड़ते हुए।
हम दोनों सांसों से हाँफते रहे, पसीने और शरीरों से चिपके हुए। उसने धीरे से अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। कुछ देर बाद, उसने खुद को वापस खींचा, मेरी चूत से निकलते हुए एक नम, गर्म sensation छोड़ गया। उसने अपनी पतलून सँभाली, पर उसकी नज़रें मुझसे नहीं हटीं। मैं पेड़ से सटी खिसक कर बैठ गई, मेरे घुटने काँप रहे थे।
"तीसरा पाठ पूरा," उसने कहा, उसकी आवाज़ फिर से वही नटखट, नियंत्रित स्वर में लौट आई थी। "कल… फिर मिलेंगे। विकास भैया को रिपोर्ट देना न भूलना।" और वह मुड़ा, ठीक पिछली बार की तरह, आँगन से बाहर चला गया, मुझे टूटी हुई, भरी हुई और एक नए सवाल के साथ छोड़ गया-कल वह मेरे साथ और क्या करेगा?
अगली शाम को बारिश हो रही थी, बूँदों की तड़तड़ाहट छत पर गूंज रही थी। मैं अपने कमरे में अकेली बैठी थी, पर शरीर का हर रोम पिछले दिन की यादों से झुलस रहा था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई, इतनी मद्धम कि बारिश की आवाज़ में दब सी गई। मैंने दरवाज़ा खोला तो राहुल खड़ा था, बारिश में भीगा हुआ, उसकी कमीज़ उसके शरीर से चिपकी थी, हर मांसपेशी का उभार साफ़ दिख रहा था। "अंदर आने दोगी, भाभी?" उसकी आवाज़ में वही नटखट अंदाज़ था। मैं बिना कुछ कहे हट गई।
वह अंदर आया और दरवाज़ा स्वयं बंद कर दिया। कमरे में केवल एक दीया जल रहा था, जिससे उछलती-कूदती छायाएँ दीवारों पर नाच रही थीं। "आज का पाठ… बारिश की रिमझिम के साथ," उसने कहा, और अपनी गीली कमीज़ उतारकर फर्श पर फेंक दी। उसका नंगा धड़, छाती पर बिखरे बाल, पेट पर उभरी नसें-सब कुछ इतना raw और demanding था। वह करीब आया, उसके शरीर से बारिश की सोंधी गंध और पुरुषों वाली गर्म भाप उठ रही थी। उसने मेरी ठुड्डी पकड़ी, "आज कोई पाठ नहीं, कोई खेल नहीं। बस तुम और मैं। तुम्हारा पति शहर से फोन पर बोला… आज जो मर्जी हो करो।"
यह कहकर उसने मुझे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया। उसके होंठ सीधे मेरे होंठों पर जा टिके, चुंबन इतना गहरा और दावेदारी भरा कि मेरी साँसें उखड़ गईं। उसकी जीभ ने मेरे मुँह के हर कोने को नाप लिया। उसके हाथों ने मेरी साड़ी के बटन खोल दिए, कपड़ा एक झटके में उतर गया। अब मैं पूरी तरह नंगी थी, केवल उसकी नज़रों के सामने। उसकी आँखों ने मेरे हर अंग का भोग लगाया। "आज मैं तुम्हारी हर इंच जमीन पर कब्जा करूँगा," उसने गुर्राते हुए कहा।
वह मेरे ऊपर आ गया, उसके वजन ने मुझे बिस्तर में दबोच लिया। उसका लंड, जो पहले से ही कड़ा और नसों से उभरा हुआ था, मेरी जाँघों के बीच में रगड़ खा रहा था। उसने मेरे स्तनों को अपने हाथों में ले लिया, जोर से दबाया, फिर मुड़कर दोनों निप्पलों को एक साथ अपने मुँह में भर लिया। दाँतों और जीभ का वह खेल मेरे तंत्रिका-तंत्र को झकझोर गया। मैं कराह उठी, मेरी पीठ मेड़े से उभर आई।
फिर वह नीचे सरका। उसके चुंबनों ने मेरे पेट, नाभि, जाँघों के भीतरी हिस्से का सफर तय किया। जब उसका मुँह मेरी चूत के पास पहुँचा, तो उसने एक लंबी, तृप्त साँस ली। "आज तो तुम पहले से ही इतनी गीली हो," उसने कहा, और बिना देर किए अपनी जीभ पूरी लंबाई में फेर दी। पर आज वह इत्मीनान से नहीं चाट रहा था। उसकी गति तेज और लालसापूर्ण थी, जैसे कोई भूखा शेर शिकार चाट रहा हो। उसने मेरी चूत के होंठ चूसकर फैला दिए और अपनी जीभ की नोक मेरे छेद में घुसा दी, गोल-गोल घुमाते हुए। फिर उसने अपनी दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं, जबकि जीभ मेरे क्लिट पर नाच रही थी। यह triple sensation थी-अंदर उँगलियों का घूमना, ऊपर जीभ का तेज स्पर्श, और उसके दूसरे हाथ का मेरी गांड की खाल को नचोचना। मैं बिस्तर पर बेतहाशा सिर हिलाने लगी, मेरे हाथों ने चादर के कोने मुट्ठियों में भींच लिए।
मैं दो बार चरम पर पहुँच चुकी थी, मेरा शरीर पसीने से लथपथ था, जब उसने खुद को ऊपर खींचा। "अब बस मत करना," उसने हाँफते हुए कहा, और अपने लंड को मेरी चूत के द्वार पर टिका दिया। आज कोई धीरज नहीं था। एक जोरदार झटके के साथ, उसने पूरी लंबाई और मोटाई मेरे अंदर उतार दी। एक जंगली चीख मेरे गले से निकली। उसने मेरे पैरों को अपने कंधों पर डाल लिया, मेरी गांड बिस्तर से उठ गई, और वह एक ऐसे angle से thrust करने लगा जो पहले कभी नहीं था। हर धक्का गहरा, हर धक्का मेरी चूत की गहराई को चीरता हुआ। आवाज़ें गीली और जोरदार थीं-हमारी हाँफें, चादर का सरसराना, बारिश का शोर, और उसके जाँघों के मेरी जाँघों से टकराने की आवाज़।
उसकी गति अब तूफानी थी। वह मुझे जकड़े हुए था, उसकी नज़रें मेरी आँखों में चुभ रही थीं। "बोलो… किसकी चूत है ये?" वह गुर्राया। मैं चुप रही। उसने और जोर से धक्का दिया। "बोलो!" "तुम्हारी…!" मेरी आवाज़ टूटी हुई निकली। यह सुनकर उसकी आँखों में एक विजयी चमक दौड़ गई। उसकी गति और तेज हो गई, अब वह पागलों की तरह धकेल रहा था। मेरी चूत में जमा हुआ आनंद फिर से उबलने लगा, एक ऐसी ऊँचाई पर ले जा रहा था जहाँ से लौटना मुश्किल था। "मैं… मैं आ रही हूँ…" मैं चिल्लाई।
"मेरे साथ," उसने दबी हुई गुर्राहट में कहा, और उसने एक अंतिम, गहरा धक्का दिया, अपना सारा वजन मेरे ऊपर डालते हुए। मैंने उसकी लंड की गहराई में गर्म फुहारों का सैलाऊ महसूस किया, और यही sensation मेरे लिए काफी था। मेरा शरीर एक लंबे, अनवरत झटके में अकड़ गया, मेरी चीख दबी रह गई उसके होंठों में, जो फिर से मेरे ऊपर थे। मेरी चूत उसके लंड के इर्द-गिर्द तेजी से धड़क रही थी, उसकी हर last drop चूसते हुए।
कितनी देर तक हम ऐसे ही पड़े रहे, पता नहीं। धीरे-धीरे हमारी साँसें सामान्य हुईं। उसने खुद को निकाला और साथ ही एक गर्म धार मेरी जाँघों पर बह निकली। वह बगल में लेट गया, एक हाथ मेरे पेट पर रखे हुए। बारिश का शोर फिर सुनाई देने लगा। "विकास भैया कल लौट रहे हैं," उसने अचानक कहा, आवाज़ में कोई भावना नहीं। मेरा दिल एकदम थम सा गया। उसने मेरी तरफ देखा, उसकी शैतानी मुस्कान फिर लौट आई थी। "पर मैं दूर नहीं जा रहा, भाभी। ये खेल… बस शुरुआत है।" यह कहकर वह उठा, अपने कपड़े उठाए, और बिना पीछे देखे कमरे से निकल गया।
मैं नंगी पड़ी रही, शरीर पर उसके निशान, अंदर उसकी गर्मी, और दिल में एक गहरा, वर्जित सच-यह खेल अब कभी नहीं रुकने वाला था। बारिश की आवाज़ अब सूनी लग रही थी।