हवेली की रातों में गूँजती सिसकियाँ






PHPWord


🔥 चौबारे की चुप्पी में चुभती चाहत

🎭 गाँव की उजाड़ हवेली में दो तनहा दिल… एक अनजान अतिथि और घर की विधवा मालकिन… रातों की सूनी सन्नाटे में उभरती सिसकियाँ, दरवाज़ों की चिरकन, और एक ऐसी वासना जो दीवारों को पार कर जाती है।

👤 अंशुल (28): शहर से लौटा युवक, लंबा-गठा बदन, अधखुली कमीज़ से झांकते सख्त सीने, अकेलेपन में डूबी कामुक कल्पनाएँ।

👤 रेवा (26): विधवा, बंद घुंघरू, कसी साड़ी में उभरे मादक curves, आँखों में छलकती भूख, स्पर्श के लिए तरसता शरीर।

📍 सेटिंग: सावन की रात, बंद पड़ी हवेली का ऊपरी मंजिल कमरा, बारिश की सरसराहट, बिजली के कटे तारों का अँधेरा।

🔥 कहानी शुरू: बारिश ने हवेली को घेर रखा था। अंशुल कमरे में अकेला लेटा, रेवा की चूड़ियों की खनक सुन रहा था। दीवार पतली थी। "लगता है बिजली कटी रहेगी," रेवा की आवाज़ सिसकी सी आई। अंशुल ने दरवाज़ा खोला। टॉर्च की रोशनी में रेवा की भीगी चोली चमक उठी। "डर लग रहा है," उसने कहा, निप्पल साफ़ उभरे हुए। अंशुल का गला सूख गया। उसने कंबल दिया, उंगलियाँ छू गईं। एक झटके में रेवा ने पकड़ लिया उसका हाथ। "तुम्हारे हाथ… गर्म हैं," वह फुसफुसाई, उसकी कलाई को अपने गाल से सहलाते हुए। बाहर बिजली कड़की। टॉर्च गिर गया। अँधेरे में साँसें तेज़ हुईं। रेवा की उंगलियाँ अंशुल के सीने पर फिरने लगीं, बटन खुल गए। "मैं…" अंशुल का स्वर भरा हुआ था। "चुप," रेवा के होंठ उसके कान के पास फिसले, "आज रात… बस सुनने दो…" उसकी हथेली ने अंशुल के पेट के नीचे का तनाव महसूस किया। दीवार के पार से आती खाँसी की आवाज़ ने उन्हें झटका दिया। रेवा सहमकर सट गई, उसके स्तन अंशुल की पीठ से दब गए। "कल… गोदाम में गेहूँ तोलने आना," वह एक जलती हुई चुंबन छोड़कर चली गई। अंशुल वहीं काँपता रहा, उसकी गांड पर उसके नाखूनों के निशान गहरे होते जा रहे थे।

अगली सुबह गोदाम की धूल-भरी हवा में गेहूँ की महक तैर रही थी। अंशुल ने लकड़ी के भारी दरवाज़े को खिसकाया तो अंदर का अर्धअंधेरा उसे निगलने को आतुर लगा। रेवा पहले से ही एक कोने में खड़ी थी, सफ़ेद साड़ी के बजाय आज एक तंग सलवार-कमीज़ पहनी हुई, जिस पर गेहूँ के भूसे के कण चिपके थे। उसकी नज़रें सीधी अंशुल पर टिक गईं, एक अदृश्य धागे की तरह जो उसे अपनी ओर खींच रहा था।

"आ गए?" रेवा की आवाज़ में एक नटखट मिठास थी। वह एक बोरे के पास बैठ गई, जानबूझकर अपनी टाँगों को फैलाते हुए। "इन बोरों का वज़न करना है। मेरे पास आओ… संख्या बताओ।"

अंशुल ने घुटनों के बल बैठने की कोशिश की, लेकिन रेवा ने तुरंत अपना हाथ बढ़ाया और उसकी कलाई पकड़ ली। "इतनी दूर क्यों? गेहूँ गिनने में मदद करो।" उसने अंशुल का हाथ खींचकर बोरे पर रख दिया, उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों से लपेटते हुए। उनकी हथेलियों के बीच गेहूँ के दाने दब गए, एक अजीब सी रगड़ पैदा करते हुए।

रेवा की साँसें उसके गले के पास महसूस हो रही थीं। "तुम्हारी उँगलियाँ… कल रात से काँप रही हैं," वह फुसफुसाई, अपने होंठ उसके कान के पास ले जाते हुए। उसका दूसरा हाथ अंशुल की पीठ पर चला गया, नीचे सरकते हुए कमर तक पहुँचा और फिर हल्के से उसकी गांड पर दबाव डाला। अंशुल की साँस अटक गई।

"रेवा…" उसने कहना चाहा, लेकिन रेवा ने अपनी उँगली उसके होंठों पर रख दी।

"चुप। गिनती करो। एक… दो…" वह गिनती करने लगी, लेकिन उसकी उँगलियाँ अंशुल की कलाई से होती हुई उसकी बाँह पर चढ़ने लगीं, कमीज़ की बाँह को ऊपर चढ़ाते हुए। उसकी नाखूनों की रेखाएँ उसकी त्वचा पर एक गर्म राह छोड़ गईं। फिर अचानक, उसने अंशुल का चेहरा अपनी ओर मोड़ा। उनकी नाकें छू गईं। "तेरा… दिल बहुत तेज़ धड़क रहा है। गोदाम की पूरी हवा थर्रा रही है।"

अंशुल ने अपनी आँखें बंद कर लीं, रेवा की गर्म साँसें उसके होंठों को नम कर रही थीं। रेवा ने दूरी मिटा दी। उसके होंठ अंशुल के होंठों से नहीं, बल्कि उसकी ठुड्डी पर, फिर गर्दन पर टिके, हल्के से चूमते हुए नीचे सरकने लगे। उसका एक हाथ अंशुल के सीने पर था, कमीज़ के बटन खोलते हुए। "कल रात… बस एक स्वाद था," वह बुदबुदाई, उसके कंधे को अपने दाँतों से हल्का सा कसते हुए।

तभी बाहर से किसी के चलने की आहट आई। रेवा ने तुरंत अपना सिर उसकी छाती पर टिका दिया, जैसे गेहूँ का एक दाना नाप रही हो। उसकी हथेली अंशुल के पेट के नीचे स्थिर हो गई, वहाँ के तनाव को महसूस करते हुए जो कपड़ों के भीतर स्पष्ट था। आहट दूर हो गई।

रेवा ने अपना सिर उठाया, उसकी आँखों में एक चुनौती भरी चमक थी। "डर गया?" उसने मुस्कुराते हुए कहा। फिर, अचानक उठकर, उसने अपनी सलवार के ऊपरी हिस्से पर लगे भूसे को झाड़ा, जिससे उसके स्तनों का आकार एक पल के लिए और उभर आया। "दोपहर को… पीछे वाले कुएँ पर आना। वहाँ… पानी ठंडा है।" इतना कहकर वह चल दी, लेकिन दरवाज़े पर मुड़कर एक लंबी, भरी नज़र से देखा, जो एक नया वादा था। अंशुल वहीं बोरों के बीच खड़ा रहा, उसकी कमीज़ खुली हुई, शरीर पर रेवा के होंठों के नम निशान, और मन में एक गहरा, तेज होता हुआ क्षोभ।

दोपहर की तपती धूप में कुएं का पत्थर ठंडा था। अंशुल वहाँ पहुँचा तो रेवा पहले से ही कुएं के किनारे बैठी हुई थी, पैर पानी में डुबोए। उसकी सलवार की घुटनों तक की पट्टियाँ भीगी हुई थीं, जिनसे पानी के बूँदें टपक रही थीं। "देर कर दी," उसने बिना मुड़े कहा, अपने पैरों से पानी की लहरें बनाते हुए। उसकी पीठ की कमीज़ पसीने से चिपकी थी, ब्रा के पट्टों का उभार साफ़ दिख रहा था।

अंशुल नज़दीक गया। रेवा ने अचानक अपना हाथ पानी में डाला और एक ठंडा छींटा उसकी तरफ़ उछाला, जो सीधा उसकी गरदन पर जा लगा। "गरम हो गए हो न?" वह मुस्कुराई। फिर उसने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया और अंशुल के पैंट के घुटने को पकड़कर खींचा, "आओ, बैठो यहाँ। पानी… ताज़ा कर देगा।"

अंशुल उसके बगल में बैठ गया, अपने पैर पानी में डालते हुए। रेवा ने तुरंत अपना भीगा हुआ पैर उसके पैर के ऊपर रख दिया, उंगलियों से उसकी पिंडली को हल्के से रगड़ना शुरू किया। "तुम्हारी नसें… कैसे फड़क रही हैं," वह फुसफुसाई, अपना शरीर थोड़ा और झुकाते हुए। उसकी बाँह अंशुल की जांघ से सट गई।

फिर उसने एक कलश उठाया जो पास में पड़ा था, उसे पानी से भरा और अचानक अंशुल के सिर के ऊपर उड़ेल दिया। ठंडे पानी की धारा अंशुल के बदन से होती हुई उसकी कमीज़ को चिपका दिया। रेवा की आँखें तुरंत उसकी भीगी छाती पर टिक गईं, निप्पलों के कड़े होने का आकार देखती हुईं। "अरे… बहुत गरम थे तुम," वह हँसी, लेकिन उसकी हँसी में एक दमक थी।

वह आगे बढ़ी, अपनी उँगली से अंशुल के सीने पर बहते पानी के रास्ते को ट्रेस करते हुए, नाभि तक जाते हुए। "यहाँ… पानी जमा हो गया है," उसने कहा और अपनी हथेली से उसके पेट के निचले हिस्से को दबाया, जहाँ कपड़ा तनाव से भरा हुआ था। अंशुल ने एक गहरी साँस ली।

रेवा ने अपना चेहरा और नज़दीक लाया, उसकी नम भौंहों को अपने होंठों से छुआ। "तुम्हारी साँसें… गरम हैं," वह बुदबुदाई, उसके कान के परले को अपने दाँतों से हल्का सा काटते हुए। उसका हाथ अंशुल की जांघ पर चला गया, अंगूठे से अंदरूनी हिस्से को दबाते हुए, एक slow, circular motion में। "कुएं का पानी ठंडा है, लेकिन तुम… तो अभी भी उबल रहे हो।"

अचानक वह उठ खड़ी हुई, अपनी भीगी सलवार पैरों से लिपटी हुई। "चलो, अंदर चलते हैं," उसने कहा, अंशुल का हाथ पकड़कर खींचते हुए। उसने उसे हवेली के पिछवाड़े में स्थित एक छोटे, अंधेरे कमरे में ले गई, जहाँ पुराने सामान पड़े थे। दरवाज़ा बंद करते ही, उसने अंशुल को एक दीवार से सटा दिया।

"अब… कोई नहीं सुन सकता," रेवा ने कहा, अपने होंठ उसकी गर्दन पर दबाते हुए। उसने अपने हाथों से अंशुल की कमीज़ को ऊपर खिसकाया, उसके सीने के बालों को महसूस किया। फिर उसने अपने घुटने को उसकी जांघों के बीच में रखा, हल्का सा दबाव डाला। "तुम्हारा लंड… कितना कड़ा है," वह सीधे शब्दों में कही, अपनी जांघ से उसके उभार को रगड़ते हुए।

उसने अंशुल का हाथ लेकर अपनी कमीज़ के बटन पर रखा। "खोलो," उसने आँखों में एक चुनौती के साथ कहा। जैसे ही अंशुल ने बटन खोले, रेवा ने अपनी चूचियों को उसकी हथेलियों में दबा दिया, एक लंबी, कराहती साँस छोड़ते हुए। "हाँ… ऐसे ही," वह फुसफुसाई, उसके मुंह को अपने स्तनों की ओर दबाते हुए।

बाहर से किसी के बोलने की आवाज़ आई। रेवा ने तुरंत अंशुल का मुँह अपने स्तनों से दबा लिया, उसे चुप कराते हुए। उसकी उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं, जबकि दूसरा हाथ उसकी पीठ के नीचे सरककर उसके चुतड़ों को कसकर दबाने लगा। आवाज़ें दूर हो गईं।

रेवा ने उसे थोड़ा ऊपर खींचा, उसके होंठों को एक जलते हुए, नम चुंबन देते हुए। "आज रात…" वह उसके होंठों पर ही बोली, "मेरे कमरे में आना। दरवाज़ा खुला रहेगा।" इतना कहकर वह अचानक दूर हट गई, अपनी कमीज़ बटन लगाते हुए, उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी चमक के साथ। अंशुल दीवार से सटा खड़ा रहा, उसके शरीर पर रेवा के नाखूनों के निशान, मन में एक उफनती हुई आग, और पैंट में एक दर्द भरा तनाव।

अंशुल की साँसें अभी भी तेज़ थीं जब वह रेवा के कमरे के सीखचों वाले दरवाज़े के सामने खड़ा था। दरार से एक टिमटिमाती हुई मोमबत्ती की रोशनी झांक रही थी। उसने धीरे से धक्का दिया और दरवाज़ा चुपचाप खुल गया, जैसे वह उसकी प्रतीक्षा में ही हो।

कमरा गर्म और महकदार था। रेवा खिड़की के पास खड़ी थी, बाल खुले हुए, एक पतला सा कपड़ा शरीर पर लिपटा हुआ। उसने मुड़कर देखा, आँखों में वही ज्वलंत चुनौती। "सोचा था… शायद नहीं आओगे," वह धीमे स्वर में बोली, अपनी जगह से हिले बिना।

अंशुल ने दरवाज़ा बंद किया। ताला खटखटाया नहीं। रेवा की नज़रें उसके शरीर पर चल रही थीं, हर मांसपेशी का अध्ययन करती हुईं। वह धीरे-धीरे उसके पास आई, उसके सीने पर अपनी हथेली रख दी। "दिल… अब भी तूफानी है," उसने कहा, अपना माथा उसके कंधे से टिकाते हुए। उसके शरीर की गर्मी उसके पतले कपड़े से होकर अंशुल तक रिस रही थी।

फिर उसने अपना हाथ नीचे सरकाया, अंशुल के पेट के निचले हिस्से पर, जहाँ उसकी पैंट तनाव से भरी हुई थी। उसने अपनी उँगलियों से हल्का दबाव डाला, एक गोलाकार गति में। "यहाँ… सारी गर्मी जमा है न?" वह फुसफुसाई। उसके होंठ अंशुल की गर्दन के नीचे वाले हिस्से को छूने लगे, नम चुंबनों की एक श्रृंखला छोड़ते हुए जो नीचे छाती की ओर बढ़ी।

अचानक वह घुटनों के बल बैठ गई, उसकी आँखें ऊपर अंशुल की आँखों से जा मिलीं। उसने धीरे से पैंट का बटन खोला, ज़िप नीचे खींची। अंशुल ने एक ठंडी साँस भरी। रेवा ने अपना चेहरा उसके अंदरूनी कपड़े के उभार पर रख दिया, गर्म साँसों से उसे गरमाते हुए। "मैंने सोचा था… तुम्हारा लंड मुझे याद कर रहा होगा," उसने कहा, अपने होंठों से कपड़े के पार हल्का सा दबाव बनाते हुए।

वह खड़ी हुई और अपने शरीर से लिपटा कपड़ा ढीला किया। वह नीचे सरक गया, उसके भरे हुए स्तन, पतली कमर और चौड़े चुतड़ों को उजागर करता हुआ। उसने अंशुल का हाथ लेकर अपनी चूची पर रखा। निप्पल पहले से ही कड़े थे। "देखो… तुम्हारे लिए कितनी भूखी हूँ," वह कराही।

अंशुल ने आख़िरकार आवाज़ पाई। "रेवा… हम…" लेकिन उसने अपनी उँगली उसके होंठों पर रख दी।

"आज रात 'हम' नहीं है। बस तुम… और मैं… और यह आग," उसने कहा, उसके मुँह को अपने स्तनों पर वापस ले जाते हुए। उसने अपने हाथों से उसके बाल पकड़े, उसे अपने शरीर में डूबोया। फिर उसने उसकी पैंट और अंदरूनी कपड़े नीचे खींचे, उसके कड़े लंड को अपनी जांघ से सटाया। दोनों के बीच का घर्षण एक जलती हुई गर्मी पैदा कर रहा था।

वह उसे बिस्तर की ओर धकेलने लगी, उनके शरीर कभी अलग नहीं हुए। पलंग पुराना था, चरमराया। रेवा उसके ऊपर आ गई, अपने घुटनों को उसकी जांघों के दोनों ओर रखते हुए। उसने अपने शरीर को ऊपर-नीचे हिलाया, उसके लंड को अपने गीले चूत के बाहरी हिस्से पर रगड़ते हुए। "ऐसा लगता है… जैसे तुम मेरे अंदर हो," वह हांफी, अपना सिर पीछे झुकाते हुए।

उसने अपना एक हाथ उनके बीच की जगह पर ले जाया, अपनी उँगलियों से अपने चूत के होंठ फैलाए और अंशुल के लंड के सिर को अपनी गर्म, नम दरार से सहलाया। "तुम्हारा… इतना गर्म है," वह बुदबुदाई, उसके ऊपर झुककर उसके होंठ चूमने लगी। यह चुंबन भावुक और लालसापूर्ण था, उनकी जीभें आपस में लड़ने लगीं।

रेवा ने अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठाई, अपने शरीर को सही जगह पर लाने के लिए। उसने अंशुल की आँखों में देखा, एक क्षण को रुकी, जैसे अंतिम बाधा पार करने से पहले। उसकी साँसें अटकी हुई थीं। फिर, एक धीमी, जानबूझकर गति में, वह नीचे उतरी, उसके लंड को अपने अंदर लेते हुए। एक लंबी, कंपकंपी कराह निकल गई उसके गले से। वह पूरी तरह से बैठ गई, उसे पूरा निगलते हुए।

"आह… हाँ… बिल्कुल ऐसा ही," वह फुसफुसाई, उसके ऊपर स्थिर होकर। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा आनंद में तन गया था। फिर उसने हिलना शुरू किया – धीमी, गहरी, घूमती हुई गतियाँ, हर बार उसे पूरी तरह से अपने अंदर ले जाते हुए। उसके स्तन हिल रहे थे, निप्पल अंशुल की छाती से रगड़ खा रहे थे।

अंशुल के हाथ उसकी गांड पर चले गए, उसे कसकर पकड़ते हुए, उसके हर मूवमेंट में उसकी मदद करते हुए। रेवा की गति धीरे-धीरे तेज़ होने लगी, उसकी साँसें छोटी और हांफती हुई हो गईं। "तुम… अंदर… बहुत गहरे जा रहे हो," वह टूटी हुई आवाज़ में बोली, अपने नाखून उसके कंधों में गड़ाते हुए। कमरे में सिर्फ़ उनकी हांफने और शरीरों के टकराने की आवाज़ गूंज रही थी, मोमबत्ती की लौ उनके उछलते हुए सायों से नाच रही थी।

रेवा की गति अब अनियंत्रित हो चली थी, उसकी एड़ियाँ अंशुल की जाँघों में गड़ते हुए। उसने अपनी आँखें खोलीं, उनमें एक जंगली, अधीर चमक थी। "देखो… तुम कैसे मेरे अंदर फड़क रहे हो," वह हाँफी, एक हाथ अपने पेट के निचले हिस्से पर रखकर, जहाँ उसका अंग अंदर-बाहर हो रहा था। उसने अपने दूसरे हाथ से अंशुल का चेहरा पकड़ा, उसके होंठों पर एक काटूचुंबन जड़ दिया, उसकी जीभ को चूसते हुए।

फिर वह अचानक रुक गई, सिर्फ़ अपने भीतरी मांसपेशियों को कसती हुई, उसके लंड को एक गर्म, नम चपेट में लेते हुए। अंशुल की कराह निकल गई। "अरे… रुक जाते हो?" रेवा ने नटखट मुस्कान के साथ कहा, अपने चुतड़ों को हल्का-सा घुमाते हुए। उसने अपना शरीर थोड़ा पीछे झुकाया, अपने हाथों से अपने स्तनों को दबाया, निप्पलों को उँगलियों के बीच दबोचते हुए। "तुम्हारी नज़रें… मेरी चूचियों पर चिपकी रहती हैं," वह फुसफुसाई, "आज पूरी रात… तुम्हें इन्हें चूसने दूंगी।"

वह फिर से चलने लगी, लेकिन इस बार और भी तेज़, और भी गहरा। उसने अंशुल के हाथों को अपने चुतड़ों से हटाकर अपनी कमर पर लगा दिए। "कसकर पकड़ो… मुझे," उसकी साँसें टूट रही थीं। अंशुल ने उसकी कमर को पकड़ा और उसे ऊपर-नीचे धकेलना शुरू किया, हर धक्के में उसे और गहराई तक ले जाते हुए। रेवा का सिर फिर से पीछे झुक गया, गर्दन की नसें तनी हुईं। उसके होंठों से लार की एक पतली धारा निकलकर उसकी छाती पर गिरी।

"हाँ… ऐसे ही… बस ऐसे ही," वह चीख़ने-सी लगी, उसके नाखून अब उसकी पीठ में घुस रहे थे। उसकी चाल अब लयबद्ध नहीं रही, बल्कि एक उन्मत्त, भूखी धड़कन में बदल गई। अंशुल ने उसे पलटने की कोशिश की, लेकिन रेवा ने उसके कंधों को ज़ोर से दबोचा। "नहीं… आज मैं ऊपर रहूँगी," उसने आँखों में एक दावे के साथ कहा, "मैं तुम्हारी सारी गर्मी… सारा ज़हर… खुद में भर लेना चाहती हूँ।"

उसने अपनी एक उँगली उनके जुड़ाव के स्थान पर ले जाई, अपने चूत के होंठों को फैलाया ताकि वह देख सके कि कैसे उसका लंड गीले, गुलाबी मांस में प्रवेश कर रहा है और बाहर निकल रहा है। "देखो… कैसे तुम मुझे भर रहे हो," वह बुदबुदाई, अपनी उँगली उसके अंडकोषों पर ले जाते हुए, उन्हें हल्के से दबाते हुए। अंशुल का शरीर ऐंठ गया।

रेवा की साँसें अब फुफकार में बदल गईं। उसने अपनी गति को और तेज़, और हिंसक बना दिया, पलंग की चरचराहट कमरे में गूंज उठी। "मैं… मैं आ रही हूँ…" वह चिल्लाई, उसका शरीर काँपने लगा, उसकी आँखें रोएँदार हो गईं। उसने अंशुल का मुँह खोलकर चूमा, उसकी कराहनों को निगलते हुए। फिर, एक लंबी, कंपकंपी चीख़ के साथ, उसका शरीर अकड़ गया, उसकी चूत की मांसपेशियाँ अंशुल के लंड को ज़बर्दस्ती से थाम लेने लगीं, एक गर्म बाढ़ उसके अंदर बहने लगी।

वह उस पर गिर पड़ी, उसका पसीना से तर शरीर अंशुल से चिपक गया। "अब… तुम्हारी बारी है," वह उसके कान में फुसफुसाई, अपनी जीभ से उसके कान का परदा चाटते हुए। उसने अपने चुतड़ों को फिर से हिलाना शुरू किया, धीमी, लेकिन दृढ़ गतियों में, उसके भीतर के सिकुड़न का फायदा उठाते हुए। "मेरे अंदर… सब कुछ उड़ेल दो," उसने आग्रह किया, अपने होंठ उसकी गर्दन पर दबाते हुए। अंशुल का शरीर तन गया, उसकी पीठ मेहराब सी उठी। रेवा ने उसे और कसकर अपने में भर लिया, उसकी कराह को अपने मुँह में लेते हुए, जबकि उसका गर्म तरल उसकी चूत की गहराइयों में धड़धड़ाता हुआ उतरा।

रेवा का शरीर अंशुल पर भारी पड़ा था, पर उसकी उँगलियाँ अब भी सक्रिय थीं। वह धीरे से उसके सीने से उठी, उसके होंठों पर अपनी अँगुली रखकर बोली, "शांत… अभी तो बस शुरुआत हुई है।" उसने अपने चुतड़ों को हल्का सा घुमाया, अभी भी उसके नरम होते लंड को अपनी गर्माहट में दबाए हुए। "तुम्हारी गर्मी अभी भी मेरे अंदर धड़क रही है," वह मुस्कुराई, अपना माथा उसके माथे से टिकाते हुए।

उसने अचानक अपना सारा वजन एक तरफ़ ले लिया और अंशुल को पलट दिया, अब वह नीचे थी और वह ऊपर। उसकी आँखों में एक नया शैतानीपन था। "अब तुम्हारी बारी है… मुझे देखो," उसने कहा, अपने हाथों से उसके कंधों को कसकर पकड़ते हुए। उसकी टाँगें अंशुल की कमर के इर्द-गिर्द लिपट गईं, एड़ियाँ उसकी गांड को दबाने लगीं। "फिर से… लेकिन इस बार धीरे-धीरे। हर इंच महसूस करते हुए।"

अंशुल ने खुद को उसके अंदर धकेला, अब भी नम और संवेदनशील मांसपेशियों ने उसे एक नई तरह की चुभन से भर दिया। रेवा की आँखें चौंधियाने लगीं। "हाँ… ऐसे ही," वह फुसफुसाई, अपने नाखून उसके पीठ के निचले हिस्से में गड़ाते हुए। उसने अपने स्तनों को उसकी ओर उभारा, निप्पल उसकी छाती को खरोंचने लगे। "मेरी चूचियाँ देखो… तुम्हारे लिए फिर से कड़ी हो रही हैं।"

वह एक हाथ उनके बीच ले गई, अपनी उँगली से अपने चूत के होंठ फैलाते हुए, ताकि अंशुल देख सके कि कैसे उसका लंड धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रहा है। "यहाँ… तुम मुझे फिर से भर रहे हो," उसकी साँसें तेज थीं। उसने अपनी उँगली को घुमाया और अंशुल के अंडकोषों को सहलाया, हल्के से दबाते हुए, जिससे उसका शरीर एक झटके में तन गया।

"रेवा…" अंशुल का स्वर भरा हुआ था।

"चुप," उसने कहा, अपनी जीभ से उसके होंठों का रसास्वादन लेते हुए। "बस महसूस करो।" उसने अपनी एड़ियों से उसकी गांड पर दबाव बढ़ाया, उसे और गहराई तक ले जाने के लिए मजबूर करते हुए। फिर उसने अपनी गति को बदला, अपने चुतड़ों को गोल-गोल घुमाते हुए, एक मंथन सी गति पैदा कर दी। "तुम्हारा लंड… मेरे अंदर घूम रहा है… हर कोने को छू रहा है," वह हांफने लगी।

उसने अचानक अपनी टाँगें खोल दीं, उन्हें पलंग पर फैला दिया, जिससे अंशुल और गहरे उतर गया। रेवा का मुँह खुला रह गया, एक मूक चीख निकल गई। उसने अंशुल के हाथ पकड़े और उन्हें अपने स्तनों पर रख दिया। "दबाओ… जोर से," उसने आग्रह किया। जब उसने दबाया, तो रेवा की आँखें लुढ़क गईं, उसने अपने दाँतों से अपने निचले होंठ को दबा लिया।

फिर उसने अंशुल को नीचे खींचा, उसके कान के पास अपना मुँह ले जाते हुए। "सुनो… मैं कैसे गीली हो रही हूँ… तुम्हारे लिए," वह बुदबुदाई, उनके जुड़ाव से आती हल्की चपचपाहट की ओर इशारा करते हुए। उसकी हाँफती साँसें उसके कान में गर्मी भर रही थीं। "अब तेज… मुझे तोड़ दो।"

अंशुल की गति तेज हो गई, हर धक्का पहले से ज्यादा जोरदार। रेवा के स्तन हवा में हिलने लगे, उसकी कराहें ऊँची और बेलगाम होती गईं। उसने अपनी उँगलियाँ उसके बालों में फँसा लीं, उसे अपनी ओर खींचते हुए एक जंगली चुंबन दिया। "मैं फिर… फिर आ रही हूँ," वह चीखी, उसका शरीर काँप उठा, उसकी चूत की मांसपेशियाँ स्खलन के लिए तेजी से सिकुड़ने लगीं। यह लहर पहले से भी ज्यादा तीव्र थी, उसकी आँखों में आँसू आ गए, जबकि वह अंशुल के मुँह में अपनी चीख दबाने की कोशिश कर रही थी। उसकी टाँगें उसकी कमर के चारों ओर कसकर लिपट गईं, उसे अपने अंदर की गहराइयों में कैद कर लिया, यह महसूस करते हुए कि कैसे उसकी अपनी लय फिर से जाग रही थी।

अंशुल की साँसें अब गहरी, खींचती हुई गर्जनाओं में बदल चुकी थीं। रेवा के दूसरे उफान ने उसे और भी अधीर कर दिया था, उसकी पकड़ उसकी कमर पर लौह जैसी कस गई। "अब… अब नहीं रोक सकता," वह कराहा, उसकी गर्दन में अपना मुँह दबाते हुए।

"रुको," रेवा ने आँखें खोलकर आज्ञा दी, उसके चेहरे पर एक अद्भुत शक्ति थी। उसने अपनी टाँगें और कसकर लपेटीं, अपने चुतड़ों को थोड़ा ऊपर उठाया और फिर अचानक नीचे गिराते हुए, उसे अपनी चूत की सबसे गहरी थाह में झटके से खींच लिया। "इसी गहराई में… मुझे दाग दो," वह बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में गरजी।

यह आग्रह, उसकी आँखों में छलकती वासना का अंतिम छोर, अंशुल के लिए अंतिम धक्का था। उसका शरीर एकदम से अकड़ गया, एक लंबी, गूँजती हुई कराह उसके गले से निकली। रेवा ने तुरंत अपने होंठ उसके मुँह पर जमा दिए, उसकी सारी आवाज़, सारी ऐंठन को निगल लिया। उसने अपनी भीतरी मांसपेशियों को बार-बार कसा, एक लयबद्ध स्पंदन में, जैसे वह उसके लंड से उसकी हर बूँद निचोड़ रही हो। अंशुल का स्खलन गर्म, लंबा और अथाह था, जो रेवा की गहराइयों में अनवरत धड़धड़ाता हुआ उतरा। वह उस पर लुढ़क गया, अपना सारा भार उस पर डालते हुए, जबकि उसकी चूत अभी भी उसके नरम होते अंग को मधुर ऐंठनों से थामे हुए थी।

मिनिटों तक वे सिर्फ साँस लेते रहे, उनके शरीर चिपके हुए, पसीने से लथपथ। मोमबत्ती की लौ अब धूमिल होकर टिमटिमा रही थी। अंततः रेवा हिली, उसने धीरे से अपने चुतड़ों को घुमाया, अंशुल का लंड अपने से निकलते हुए, एक गर्म, नम सन्नाटा छोड़ता हुआ। वह उसके बगल में लेट गई, उसकी बाँह उसकी छाती पर फेंक दी। उनकी नज़रें छत से टकराईं, साथ-साथ उठती-गिरती साँसों की लय में।

"अब…" रेवा ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी उँगली अंशुल के सीने पर गोल-गोल घूमने लगी, "…तुम्हारी गर्मी मेरे अंदर ठंडी हो रही है।" उसकी आवाज़ में अब वह उन्माद नहीं, बल्कि एक खालीपन था, जैसे कोई तूफान थम गया हो।

अंशुल ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन रेवा ने अपनी उँगली उसके होंठों पर रख दी। "मत बोलो," उसने कहा, अपना सिर उसके कंधे पर टिकाते हुए। "बोलोगे तो… यह सच हो जाएगा। और मैं… मैं अभी सच बर्दाश्त नहीं कर सकती।"

बाहर, सावन की रात की नम हवा ने खिड़की से झाँका, उनके गर्म शरीरों पर एक सिहरन सी दौड़ गई। रेवा ने कंबल उन दोनों पर खींच लिया। उसका हाथ अंशुल के पेट पर रुका, उसकी नाभि के पास, जहाँ उनकी गर्मी मिल रही थी। "कल सुबह," वह धीरे से बोली, जैसे खुद से बात कर रही हो, "तुम्हें जल्दी निकल जाना होगा। गोदाम में गेहूँ के नए बोरे आ रहे हैं।"

यह वास्तविकता का एक ठंडा झोंका था, जो अभी-अभी बिते उन्माद के बाद एक कँटीली लकीर खींच गया। अंशुल ने अपना हाथ उठाया और उसके बालों में, उसकी गर्दन के पास फँसी चिपचिपी लटों में, उँगलियाँ फेरीं। रेवा ने अपनी आँखें बंद कर लीं, एक लंबी, काँपती साँस छोड़ी।

"रेवा…" उसने आख़िरकार फुसफुसाया।

"चुप," उसने फिर कहा, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। उसने अपना चेहरा उसकी छाती में छुपा लिया। "बस… अभी के लिए बस यहीं रहो।"

वे इसी तरह पड़े रहे, समय बीतता गया। मोमबत्ती जलकर राख हो गई, कमरा पूरी तरह अँधेरे में डूब गया, सिर्फ़ चाँदनी की एक धुँधली रेखा दरार से आकर उनके उलझे हुए पैरों पर पड़ी। निषिद्ध का स्वाद, उनकी चुप्पी में, उनकी धड़कनों में, और उस नम, गर्म हवा में मिला हुआ था जो अब धीरे-धीरे ठंडी पड़ रही थी। जैसे हवेली की पुरानी दीवारों ने एक और गहरा रहस्य सोख लिया था, जो हमेशा के लिए उसकी नींव में दफ़न हो गया।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *