अंधेरी लिफ्ट में बंधा वादा






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🔥 चारदीवारी में फँसी वासना: लिफ्ट में दो देहों का नटखट खेल

🎭 एक अधूरी लिफ्ट, बुझे हुए बल्ब, और दो अनजान शरीर जो एक दूसरे की गर्माहट में खोने को बेताब हैं। वह हर सांस में एक नया राज़ छुपाए बैठी है, और वह हर पल उस राज़ को अपने होंठों से उतारने को आतुर।

👤 अंजलि – २४ वर्ष, गोरी चमड़ी पर नीले नसों का जाल, कसी हुई कमर और उभरे हुए स्तन जो उसके ढीले कुर्ते में भी दिख जाते हैं। उसकी आँखों में एक अधूरी तृष्णा छुपी है।

👤 राहुल – २८ वर्ष, मजबूत भुजाएँ और चौड़े सीने वाला, उसकी नज़रों में एक सुलगती हुई आग है जो अंजलि के हर हिलने पर भड़क उठती है।

📍 एक पुराने आवासीय भवन की खराब लिफ्ट, रात के साढ़े ग्यारह बजे, बाहर बारिश की हल्की फुहार। लिफ्ट अचानक रुक गई है और अंदर का लाइट फ्लिकर करके बुझ गया है।

🔥 लिफ्ट का पंखा चलना बंद हो गया। अचानक की खामोशी में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ गूंज रही थी। अंजलि ने अपने आप को दीवार से सटा लिया। राहुल ने अपनी घड़ी की ओर देखा, "शायद पावर कट है।" उसकी आवाज़ थोड़ी कर्कश थी। अंजलि ने हाँ में सिर हिलाया, पर उसकी नज़रें राहुल के सीने पर टिकी थीं। वह जानती थी यह खतरनाक है, पर उसकी देह एक अजीब सी गर्माहट महसूस कर रही थी। राहुल ने अपना फोन निकाला, टॉर्च जलाई। रोशनी सीधे अंजलि के चेहरे पर पड़ी। वह झिझक कर मुड़ गई, पर रोशनी ने उसके गीले कुर्ते के अंदर झांक लिया। राहुल की सांस रुक सी गई। "ठंड लग रही है?" उसने पूछा। अंजलि ने अपने होंठ काटे, "नहीं… बस… डर लग रहा है।" उसकी आवाज़ एक काँपती हुई फुसफुसाहट थी। राहुल एक कदम आगे बढ़ा। लिफ्ट की तंग जगह में अब उनके बीच सिर्फ एक हाथ का फासला था। उसने टॉर्च नीचे की ओर कर दी। रोशनी में अंजलि के पैरों की उंगलियाँ नज़र आईं, जो नर्वस होकर मुड़ रही थीं। "तुम्हारा हाथ काँप रहा है," राहुल ने कहा और बिना किसी इजाज़त के उसका हाथ पकड़ लिया। अंजलि ने एक तीखी सांस भरी, पर अपना हाथ नहीं खींचा। उसकी उंगलियाँ राहुल की उंगलियों में उलझ गईं। "यह गलत है," वह बुदबुदाई। "शायद," राहुल ने कहा, और उसके हाथ को अपनी हथेली में कसकर दबा दिया, "पर अब रुकना मुश्किल लगता है।"

राहुल की हथेली का ताप अंजलि की कलाई में रिसने लगा। उसकी उंगलियाँ हल्के से खिसकीं, अंजलि की हथेली के नर्म मांस को सहलाते हुए। "मुश्किल है… पर नामुमकिन नहीं," अंजलि ने फुसफुसाया, उसकी सांसें तेज़ हो चली थीं। राहुल ने टॉर्च फ़र्श पर रख दी, ऊपर की ओर उठती रोशनी ने दोनों के शरीरों की लम्बी छायाएँ दीवार पर बना दीं। अचानक अंधेरे में, स्पर्श और ज़्यादा तीखा महसूस हुआ।

उसने अपना दूसरा हाथ उठाया और अंजलि के गीले कुर्ते के किनारे को, उसके कूल्हे के पास, बड़ी हल्की उंगलियों से छू लिया। कपड़ा पतला था। अंजलि का शरीर एक झटके से तन गया। "रुको…" वह बोली, पर उसकी आवाज़ में दम नहीं था। राहुल ने उसकी इस मौन इजाज़त को पढ़ लिया। उसकी उंगलियाँ कुर्ते के अंदर सरक गईं, उसके निचले पेट की कोमल त्वचा पर पहुँचीं। वहाँ का ताप उसे जलाने लगा।

"तुम काँप रही हो," राहुल ने उसके कान के पास गरमाहट भरे स्वर में कहा। उसकी सांसों की गर्मी अंजलि की गर्दन पर पसलीने लगी। अंजलि ने आँखें मूंद लीं, अपना सिर पीछे की ओर, दीवार पर टिका दिया। उसकी आंतरिक आवाज़ चिल्ला रही थी 'रुक जा', पर उसका शरीर एक अलग भाषा बोल रहा था। राहुल का हाथ और ऊपर खिसका, उसके पेट के मुलायम उभार को पार करते हुए, उसकी पसलियों के नीचे तक पहुँच गया। उसकी उंगली ने अचानक ब्रा के नीचे के कपड़े का कड़ापन महसूस किया।

अंजलि की सांस रुकी। राहुल ने अपना माथा उसके कंधे से टिका दिया, उसकी गर्दन की महक को सूंघते हुए। "बस एक छूआ…" वह बुदबुदाया, "…फिर रुक जाऊंगा।" यह झूठ था, और दोनों जानते थे। अंजलि के होंठ फड़के। उसने अपना हाथ उठाया और राहुल की छाती पर, उसकी शर्ट के बटनों के पास रख दिया। एक इनकार नहीं, बल्कि एक संतुलन। राहुल ने ब्रा के हुक को अपनी उंगली से टटोला, लेकिन खोला नहीं। बस उसके नीपल के ऊपर से, कपड़े के पार, हल्का दबाव दिया।

अंजलि के मुंह से एक हल्की कराह निकल गई, जिसे वह तुरंत दबाना चाहती थी। उसने अपने दांतों से निचला होंठ दबा लिया। राहुल ने वह कराह सुन ली। उसका हाथ अचानक रुक गया। उसने अपना सिर उठाया और अंजलि की आँखों में देखा, जो अब खुली थीं और अंधेरे में चमक रही थीं। "डर गई?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ में एक चुनौती थी। अंजलि ने सिर हिलाया, "नहीं… बस सोच रही थी… अगर लिफ्ट चलने लगी तो?" यह सवाल उन दोनों के बीच की गर्म हवा में एक ठंडी लकीर खींच गया।

राहुल की उंगली उसके निप्पल के ऊपर से हट गई। उस सवाल ने एक पल का विराम दिया। "तो फिर," उसने कहा, अपना माँह अंजलि के कान के करीब लाते हुए, "उससे पहले का हर पल और कीमती हो जाता है।" उसकी बात समाप्त होते ही, लिफ्ट का एक मोटर हल्का सा खरखराया और फिर चुप हो गया। दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगे, डरे हुए, फिर राहुल के होंठों पर एक नटखट मुस्कान खेल गई।

अंजलि ने अपना हाथ उसकी छाती से खिसकाकर उसकी गर्दन तक ले आया, उसकी नब्ज़ की तेज़ धड़कन महसूस करते हुए। "तुम भी तो काँप रहे हो," उसने पहली बार चुनौती देते हुए कहा। राहुल ने उसकी कलाई पकड़ ली और उसका हाथ अपने होंठों तक ले गया। उसने उसकी उंगलियों के पोरों पर एक गर्म चुंबन रखा, फिर धीरे से उन्हें अपने दाँतों से कसकर। अंजलि की कराह इस बार दबी नहीं, बल्कि उसके गले से एक गहरी सांस बनकर निकली।

उसने अपना सिर हटाया और राहुल की आँखों में झाँका, जहाँ वासना अब बिल्कुल साफ़ जल रही थी। "बस इतना ही?" अंजलि ने फुसफुसाया, उसकी उंगलियाँ अब उसके गीले कुर्ते के नीचे से, राहुल के हाथ को और ऊपर, अपने स्तन की ओर ले जा रही थीं। राहुल ने उसका मार्गदर्शन स्वीकार कर लिया। उसकी हथेली ने अंततः ब्रा के कपड़े को दबाया और नीचे से उसके भरे हुए, गर्म अंग को अपनी मुट्ठी में समेट लिया।

अंजलि की पलकें झपक गईं। उसने अपनी ठुड्डी ऊपर उठाई, गर्दन की नसें तन गईं। राहुल ने अंगूठे से निप्पल के कड़े होते सिरे को रगड़ा। कपड़े के पार हल्का सा खिंचाव, एक तीखी गर्माहट। "यह… यह गलत है," उसने फिर वही शब्द दोहराए, पर इस बार उसकी आवाज़ में एक प्रार्थना थी, एक इजाज़त माँगने जैसी। राहुल ने उत्तर दिया, अपने दूसरे हाथ से उसकी कमर को अपनी ओर खींचते हुए, दोनों देहों के बीच का अंतराल मिटाते हुए। "सब कुछ गलत है आज रात," वह बुदबुदाया, "तो फिर एक गलती और?"

उनके पेट एक दूसरे से सट गए। राहुल का लंड, अब सख्त हो चुका था, अंजलि की नाभि के नीचे दबाव बनाने लगा। अंजलि ने एक तीखी सांस भरी, उसकी हिलती हुई छाती ने राहुल की हथेली में और भराव दिया। बाहर बारिश की बूंदों की आवाज़ तेज़ हुई, लिफ्ट की दीवारों पर एक ठंडी कंपकंपी दौड़ गई। पर अंदर की गर्माहट उस सब पर भारी पड़ रही थी। राहुल का मुँह अब उसकी गर्दन के मुलायम कोने में था, गीली त्वचा को होंठों से सहलाता हुआ। अंजलि की उंगलियाँ उसके बालों में उलझ गईं, खींची नहीं, बस टिकी रहीं।

राहुल का हाथ अंजलि के कमर के नीचे खिसककर उसकी जांघ के मुलायम अंदरूनी हिस्से पर आ गया। उसकी उंगलियों ने सलवार की पतली सिलाई को रगड़ा। "तुम्हारी यह सलवार…" उसने गर्दन चूमते हुए फुसफुसाया, "…बहुत पतली है।" अंजलि ने अपनी आँखें खोल दीं, उसकी नज़र लिफ्ट के दरवाज़े के बटनों पर टिक गई, जो अभी भी बुझे हुए थे। एक पल को उसे बाहर की दुनिया याद आई, पर राहुल के दाँतों का हल्का कसाव उसकी त्वचा पर उस याद को धो गया।

उसने अपना घुटना हल्का सा उठाया, अनजाने में ही, राहुल के कमजोर घुटने को छूते हुए। यह एक अनौपचारिक निमंत्रण था। राहुल ने उसकी सलवार के ऊपरी हिस्से को, कूल्हे के करीब, अपनी हथेली से दबाया और धीरे से खींचा। कपड़ा तन गया। अंजलि की सांस फिर से रुकी। "मत…" वह बोली, लेकिन उसका शरीर आगे की ओर झुक गया, अपने स्तन को उसकी हथेली में और दबाने लगा।

राहुल ने अपना मुंह उसके कान तक ले जाकर कहा, "एक ही शब्द… 'रुको'… बोल दो।" यह चुनौती सीधी थी। अंजलि ने होंठों को बंद रखा। उसकी चुप्पी में हाँ थी। उसकी उंगलियाँ सलवार के नेक को नीचे धकेलने लगीं, अंजलि के पेट के निचले हिस्से की गर्म त्वचा पर सरकते हुए। ठंडी हवा का एक झोंका उस जगह को छू गया, और अंजलि कसमसा उठी।

"ठंड लग रही है?" राहुल ने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा, अपना माथा उसके माथे से टिकाते हुए। "नहीं…" अंजलि की आवाज़ लड़खड़ाई, "…बस… तुम्हारी उंगलियाँ… बहुत गर्म हैं।" उसने अपना हाथ राहुल की कमर पर डाला और उसकी शर्ट के अंदर घुसा दिया। उसकी पीठ की गर्म, थोड़ी पसीने से तर त्वचा को छूकर वह एक क्षण को ठिठक गई।

राहुल ने एक गहरी सांस भरी। उसकी उंगली अब उसके अंतर्वस्त्र के किनारे पर खड़ी थी, बस एक इंच का फासला बचा था उस गुप्त गर्मी तक। उसने दबाव दिया, कपड़े को अंदर धकेलते हुए, उसके बालों वाली नर्म जगह को रगड़ा। अंजलि का मुंह खुला रह गया, एक मौन कराह उसके गले में अटक गई। उसकी आँखों में एक डर था, पर उसके नीचे एक तीव्र उत्सुकता भी सुलग रही थी।

बाहर बारिश ने जोर पकड़ा। लिफ्ट की धातु एक लंबी, कराहती सी आवाज़ करके हिली। दोनों जम गए, एक दूसरे में सटे हुए, यह सोचते हुए कि कहीं यह चलने तो नहीं वाली। कुछ सेकंड का सन्नाटा छाया रहा। फिर राहुल ने अपना सिर हटाया और अंजलि के होंठों की ओर देखा, जो अब हल्के से काँप रहे थे। उसने उन्हें अपने अंगूठे से सहलाया। "अगर अभी लाइट आ गई…" उसने कहा।

अंजलि ने जवाब दिया, अपनी उंगलियों को उसकी पीठ पर नीचे खिसकाते हुए, उसके पैंट के बेल्ट तक ले आते हुए। "तो फिर…" उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक नया, साहस भरा शोर था, "…हमें इस एक पल का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए।" और उसने अपने होंठों को आगे बढ़ाया, राहुल के होंठों के पास, बिना छुए, बस उनकी गर्म सांसों का आदान-प्रदान करते हुए। यह एक औरत की पहली सक्रिय चुनौती थी। राहुल की आँखें चौंधिया गईं।

राहुल ने उस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपना सिर हल्का आगे किया। उनके होंठों के बीच का मिलीमीटर का फासला एक जलती हुई खाई बन गया। अंजलि की सांसें उसके मुंह में समा रही थीं। "तुम ही बताओ… कितना इस्तेमाल?" राहुल ने फुसफुसाया, उसकी उंगली अंततः अंदरूनी कपड़े के किनारे को पार कर गई और उस गर्म, नम त्वचा की रेशमी रेखा को छू लिया।

अंजलि का शरीर एकदम सख्त हो गया, फिर एक लहर-सी दौड़ गई। "ओह…" उसकी आवाज़ एक लंबी सिसकी में बदल गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, अपना माथा राहुल के कंधे पर गिरा दिया। राहुल की उंगली ने कोमलता से खोजा, उस नर्म घुमाव को, जहाँ उसकी योनि की गर्मी शुरू होती थी। कपड़ा अब बीच में आ गया था, एक पतली, परेशान करने वाली रुकावट।

"यह… रुकावट है," अंजलि ने काँपती आवाज़ में कहा, उसकी उंगलियाँ राहुल के बेल्ट की बकल को बेतरतीब से टटोलने लगीं। राहुल ने अपना हाथ हटाया नहीं। उसने अपना अंगूठा वहीं दबाया, एक गोलाकार, हल्का दबाव देते हुए। "हर रुकावट… एक वादा है," उसने उसके कान में कहा।

अचानक अंजलि ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में आंसूओं की चमक नहीं, बल्कि एक गहरा संकल्प था। उसने राहुल का हाथ पकड़ा और उसे अपनी सलवार के अंदर, सीधे अपने अंतर्वस्त्र के ऊपर से, दबा दिया। "तो फिर वादा पूरा करो," वह बोली, उसकी नज़र सीधी और चुनौती भरी।

राहुल हैरान रह गया। उसकी हथेली ने अब बिना किसी अवरोध के उसकी गर्मी को महसूस किया। उसने अपनी उंगलियों को हल्का सा हिलाया, कपड़े के पार से ही उसके बुलबुले को रगड़ा। अंजलि ने अपने दाँतों से होंठ दबा लिया, एक मूक कराह उसके नथुनों से निकलकर हवा में मिल गई। उसने राहुल की बेल्ट खोल दी, बटन पर अपनी उंगली चलाई।

लिफ्ट फिर से खरखराई, और इस बार लाइटें एक झटके में जल उठीं। चमकती रोशनी ने अचानक उनकी गुप्त दुनिया को नग्न कर दिया। दोनों पलक झपकाकर एक दूसरे से चिपक गए। राहुल का हाथ अंजलि की सलवार में फंसा रहा। अंजलि का हाथ उसके पैंट के बटन पर। एक सेकंड की जमी हुई दहशत।

फिर लाइटें फिर से बुझ गईं। गहरा अंधेरा वापस लौट आया, उन पर कृपा करते हुए। सन्नाटा और भी भारी हो गया। राहुल ने एक गहरी, हिलती हुई सांस भरी। "वादा…" उसने कहा, और अपनी उंगलियों से अंजलि के अंतर्वस्त्र का किनारा पकड़कर, एक हल्के, दृढ़ खिंचाव से, एक तरफ खिसका दिया।

कपड़े के हटते ही ठंडी हवा ने उस गुप्त स्थान को छुआ, पर तुरंत राहुल की हथेली की जलन ने उसे ढक लिया। अंजलि ने एक तीखी सांस भरी, उसकी उंगलियाँ राहुल की पीठ पर दब गईं। राहुल की उंगली ने नर्म बालों के बीच की गर्म, चिकनी गुफा को टटोला। एक कोमल दबाव। अंजलि का सिर पीछे को धड़क से दीवार से टकराया। "अरे…" उसकी कराह अब दबी नहीं, बल्कि लिफ्ट की धातु में गूंजने लगी।

राहुल ने अपना मुंह उसके खुले होंठों पर लगाया, पर चूमा नहीं। बस उसकी सांसें चुराईं। उसकी उंगली हल्के से अंदर की ओर सरकी, योनि के नम प्रवेश द्वार की रेशमी रेखा को चिपचिपाहट से भरा हुआ महसूस किया। "तुम… बिलकुल तैयार हो," वह गरमाहट में बुदबुदाया। अंजलि ने जवाब दिया, अपनी जांघों को थोड़ा और खोलते हुए, उसकी उंगली को और गहराई तक आमंत्रण देते हुए।

तभी लिफ्ट का मोटर फिर खरखराया, और एक जोरदार झटका लगा। दोनों एक दूसरे को पकड़कर संतुलन बनाने लगे। राहुल का हाथ अनचाहे ही और अंदर चला गया। अंजलि की आँखें फैल गईं, एक संक्षिप्त चुभन, फिर एक गहरी, डूबती हुई तृप्ति। उसने राहुल के कंधे में अपने दाँत गड़ा दिए, दर्द को रोकते हुए।

लिफ्ट फिर स्थिर हुई। सन्नाटा लौटा। राहुल की उंगली अब उसके अंदर थी, एक गर्म, सिकुड़ती हुई मांसलता में घिरी हुई। उसने हिलना शुरू किया, धीरे-धीरे, एक आना-जाना। अंजलि की सांसें रुक-रुककर आने लगीं। उसने अपना हाथ राहुल के पैंट के अंदर डाला, उसके कठोर लंड को मुट्ठी में लिया। गर्मी और कसाव ने राहुल को कराहने पर मजबूर कर दिया।

"बस… इतना ही नहीं," अंजलि ने फुसफुसाया, उसकी हथेली ऊपर-नीचे चलने लगी। उसकी उंगलियों के इस हमले ने राहुल को बेकाबू कर दिया। उसने अपनी दूसरी उंगली अंजलि की चूत के द्वार पर टिका दी, दबाव बढ़ाया। अंजलि का शरीर कड़ा हुआ, फिर एक ढीलापन आया। वह उसके हाथ में पिघलने लगी।

उनकी सांसें एक दूसरे में गुम हो गईं, होंठ अब स्पर्श के बिना ही काँप रहे थे। राहुल ने अपना माथा उसके माथे से टिकाया, आँखें बंद कर लीं। यह अब केवल स्पर्श का खेल था-उंगलियों का आगे-पीछे, हथेली का रगड़, अंदर की गर्म लहरें। बाहर बारिश का शोर मद्धिम पड़ गया, जैसे दुनिया सिमटकर इसी तंग, अंधेरे डिब्बे में आ गई हो।

अचानक अंजलि ने राहुल का हाथ रोका। "रुको… मैं…" उसकी आवाज़ घबराई हुई थी। राहुल ने उंगलियाँ स्थिर कर दीं। "क्या हुआ?" उसने पूछा, डरते हुए कि वह पीछे हट रही है। अंजलि ने उसकी आँखों में देखा, अंधेरे में चमकती दो चिंगारियाँ। "मैं… मैं आने वाली हूँ," वह काँपती हुई बोली। यह स्वीकारोक्ति उसके गालों पर लाली ले आई, पर उसने शर्म से नहीं, बल्कि एक उत्तेजित चुनौती से आँखें नहीं चुराईं।

राहुल की सांस फंस गई। उस स्वीकार ने उसकी देह में एक नया आवेग भर दिया। "आ जा," वह गहराई से बुदबुदाया और अपनी उंगलियों का गति तेज़ कर दी, अंदर-बाहर का नम खेल। अंजलि की पकड़ उसके लंड पर और कस गई, उसकी हथेली का रगड़ उसे पागल करने लगा।

उसने अपना मुंह अंजलि के होंठों पर गिरा दिया, आखिरकार। चुंबन हिंसक और भूखा था, दांतों का हल्का कटाव, जीभ का जबरदस्ती प्रवेश। अंजलि ने कराहते हुए उसकी जीभ को स्वीकार किया, उसका सारा शरीर एक तीखे तनाव की ओर बढ़ने लगा। राहुल का अंगूठा उसके निप्पल पर मढ़ा हुआ कपड़ा रगड़ने लगा, जबकि उसकी दूसरी उंगली उसकी चूत के अंदर गहरे एक तेज गति से चलने लगी।

"मैं… मैं…" अंजलि के वाक्य टूट गए। उसकी आँखें लुढ़क गईं, शरीर में एक ज्वार सा उठा। राहुल ने उसकी इस कगार पर खड़ी हालत को महसूस किया। उसने अपनी उंगलियाँ रोक दीं, बस अंदर डालकर स्थिर कर दीं। "नहीं… मत रोको…" अंजलि विलाप कर उठी।

"कहो… मेरा नाम," राहुल ने उसके होंठ चूसते हुए आदेश दिया। "राहुल…" वह फुसफुसाई, और यह नाम उसकी चूत में एक नई सिकुड़न ले आया। उसी क्षण राहुल ने फिर से हिलाना शुरू किया, तेज, लयबद्ध। अंजलि का सिर पीछे धड़कता रहा, उसके गले से गहरी, दबी हुई चीखें निकलने लगीं। उसकी उंगलियाँ राहुल के लंड पर इतनी तेजी से चलीं कि उसकी सांस फूलने लगी।

अचानक अंजलि का पूरा शरीर एक लंबी, कंपकंपी में फंस गया। उसकी चूत राहुल की उंगलियों को जकड़ने लगी, गर्म तरलता की एक लहर बाहर झोंक दी। वह चीखना चाहती थी, पर राहुल के मुंह ने उसकी आवाज निगल ली। उसका शरीर ढीला पड़ गया, सिर्फ हल्की सिहरन भर रह गई।

राहुल ने अपनी उंगलियाँ बाहर खींचीं और अंजलि का हाथ हटाकर अपना पैंट नीचे खिसकाया। उसका लंड बाहर आते ही अंजलि की नम चूत के द्वार से टकराया। "अब मेरी बारी," वह भारी सांस लेता हुआ बोला। अंजलि ने आँखें खोलीं, थकी हुई, पर समर्पित। उसने अपनी जांघें और खोल दीं।

राहुल ने अपने लंड को उसकी गर्माहट के द्वार पर रगड़ा, एक बार, दो बार। फिर एक धक्के में अंदर घुस गया। अंजलि की आँखें फिर से फैल गईं, भर आईं। भीतर का खिंचाव तीखा था, पर तुरंत ही एक पूर्णता की गर्मी ने उसे ढक लिया। राहुल ने एक गहरी सांस भरी, फिर हिलना शुरू किया। धीरे-धीरे पहले, फिर गति बढ़ाते हुए।

लिफ्ट की दीवारें उनकी टक्कर के थपेड़ों से हिलने लगीं। अंजलि की कराहें अब बेलगाम थीं, हर धक्के पर एक नया स्वर। राहुल ने उसकी चूची को कपड़े से निकालकर अपने मुंह में ले लिया, चूसना शुरू कर दिया। दोहरी उत्तेजना ने अंजलि को फिर से कगार पर पहुंचा दिया। उसकी नाखून राहुल की पीठ में घुस गईं।

राहुल की गति तेज और अनियंत्रित हो गई। उसका सारा शरीर तनाव से भर गया। "मैं… निकलने वाला हूँ…" वह दहाड़ा। अंजलि ने अपनी एड़ियों से उसकी कमर को और खींचा, उसे और गहरे में ले जाते हुए। एक आखिरी, जोरदार धक्का, और राहुल का लंड उसकी चूत के भीतर स्खलित हो गया। गर्मी की लहर ने अंजलि को फिर से कंपकंपा दिया, उसकी अपनी चरम सीमा दोबारा छू ली।

दोनों एक दूसरे में सटे, हांफते रहे। लिफ्ट में सिर्फ उनकी सांसों और बारिश की आवाज थी। धीरे-धीरे वासना का तूफान शांत हुआ। राहुल ने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। अंजलि की आँखों से आंसू की एक बूंद गिरी, पर वह दुख की नहीं, विस्मय की थी। उसने राहुल के बालों में उंगलियाँ फेरी।

तभी लिफ्ट का मोटर जोर से गूंजा और रोशनी स्थिर होकर जल उठी। लिफ्ट हिली और नीचे की ओर चलने लगी। दोनों तुरंत अलग हुए, हड़बड़ाहट में कपड़े संभालने लगे। आँखें मिलीं-शर्म, डर, और एक अटूट बंधन की चमक से भरी हुई। दरवाज़ा खुला। बाहर का उजाला चुभ रहा था। बिना कुछ कहे, वे अलग-अलग दिशाओं में चले गए, पर उस अंधेरे में बंधा वादा हमेशा के लिए उनकी चुप्पी में कैद हो गया।


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