अँधेरी रात और विधवा भाभी की सात साल की भूख






PHPWord


🔥 अँधेरी रात का गर्म साया

🎭 गाँव की उस सूनी कोठरी में जहाँ हर छूआँ नाजायज़ था… जहाँ एक विधवा की चाहत और एक जवान मजदूर की हिम्मत के बीच खेल रहा था खतरनाक खेल।

👤 मीरा, उम्र छब्बीस, मखमली साँवली त्वचा, घने काले बाल, भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के भीतर अक्सर बेचैन हो उठतीं। विधवा होने के बाद की सात साल की भूख उसकी आँखों में तैरती।

अमर, उम्र बाईस, कसा हुआ पतला शरीर, मजदूरी करते हुए पसीने से चमकता हुआ। उसकी नज़रें हमेशा मीरा के चुतड़ों और गांड के घुमाव पर अटकी रहतीं।

📍 गर्मियों की एक उमस भरी रात, गाँव के सबसे सुनसान कोने में मीरा की कच्ची कोठरी। बाहर बारिश होने वाली थी, हवा में बेचैनी और शरीरों में एक अजीब सी गर्माहट।

🔥 कहानी शुरू:

मीरा चरखा कात रही थी जब अमर दहलीज पर आ खड़ा हुआ। "भाभी, कुआँ से पानी भर आया।" उसकी आवाज़ में एक कंपन था। मीरा ने सिर नहीं उठाया, पर उसकी नज़रें अमर के पसीने से तर बाजुओं पर चिपक गईं। "अंदर रख दो," उसने फुसफुसाया। अमर मटका लेकर अंदर आया। उसके जाते हुए मीरा की नज़र उसकी पीठ की मांसपेशियों और नीचे की ओर सरकते कपड़ों पर ठहर गई। हवा का एक झोंका दीया बुझा गया। अँधेरे में दोनों की साँसें रुक सी गईं। "भाभी, दिया…" अमर की आवाज़ करीब से आई। मीरा ने महसूस किया उसकी गर्म साँस अपने गले को छू गई। उसने हाथ बढ़ाया तो अचानक अमर का हाथ उस पर आ टिका। दोनों के हाथों का वह खिंचाव, उंगलियों का कसना… मीरा के होंठों से एक हल्की कराह निकल गई। अमर ने धीरे से उसकी कलाई पकड़ ली। "तुम… तुम क्या कर रहे हो?" मीरा की आवाज़ लड़खड़ा गई, पर वह हाथ नहीं छुड़ा पाई। अमर ने अपना माथा उसके कंधे से टिका दिया। "सात साल से देख रहा हूँ भाभी… तुम्हारे स्तनों का हिलना… तुम्हारे होंठों का खेल…" मीरा का शरीर सिहर उठा। उसकी चूत में एक गर्म लहर दौड़ गई। बाहर बारिश की पहली बूंदें गिरने लगीं। अमर का दूसरा हाथ उसकी कमर पर फिरा, नाभि के नीचे तक जाते हुए। मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। यह गलत था, नर्क में जाने जैसा… पर उसकी देह तो सात साल से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। अमर के होंठ उसकी गर्दन के पास मंडराने लगे। "कोई देख लेगा…" मीरा ने कसमसाते हुए कहा। "सारा गाँव सो रहा है," अमर ने फुसफुसाकर कहा और उसके कान की लौ को अपने दाँतों से कसकर पकड़ लिया।

मीरा की एक लंबी कराह अँधेरी कोठरी में गूँजी, उसका शरीर अमर के दाँतों के उस नटखट कसाव में पूरी तरह ढील गया। "छोड़… अरे… छोड़ो ना," उसकी आवाज़ दमित थी, पर उसकी गर्दन पीछे की ओर झुक गई, उस कष्टदायी आनंद को और गहरा करने के लिए। अमर ने धीरे-धीरे अपने दाँत खोले, पर उसके होंठ उसी नरम लौ पर चिपके रहे, एक गीला, गर्म चुंबन देते हुए जो मीरा की रीढ़ में बिजली सी दौड़ा गया। उसका हाथ, जो अब तक मीरा की कलाई को कसकर पकड़े हुए था, ढीला पड़ा और उसकी उंगलियाँ उसकी हथेली पर रेंगती हुई, अँगूठे से हल्के-हल्के गोल-गोल घेरे बनाने लगीं।

बाहर बारिश तेज़ हो गई, फर्श पर गिरती बूंदों की ताल के साथ ही अमर के दूसरे हाथ ने मीरा की कमर पर अपनी पकड़ मज़बूत की। उसकी उंगलियाँ साड़ी के मोटे कपड़े को भेदती हुई, उसके निचले पेट की कोमल त्वचा तक पहुँच गईं। मीरा ने अपनी आँखें जबरदस्ती बंद कर लीं, पर उसकी साँसें अब तेज़ और भारी थीं, उसके स्तनों का उठाव हर श्वास के साथ और स्पष्ट हो रहा था। "तुम… तुम्हारी हिम्मत…" वह बुदबुदाई, पर उसके हाथ ने, अपने आप ही, अमर के पसीने से तर बाजू पर चिपक कर रह गए।

अमर ने अपना मुँह उसके कान से हटाकर, उसकी गर्दन के उस नाजुक हिस्से पर लगा दिया जहाँ नब्ज तेज़ी से धड़क रही थी। उसकी साँस की गर्माहट ने मीरा के रोम-रोम को सिहरा दिया। "भाभी… यह सब… तुम्हारा ही तो है," उसने फुसफुसाया, और अपने होंठों को नीचे सरकाते हुए, उसने साड़ी के पल्लू के ऊपर के हिस्से को, जहाँ से मीरा की गोलाई झलक रही थी, अपने दाँतों से हल्का सा खींचा। कपड़े का खिंचाव मीरा के संवेदनशील निप्पलों पर पड़ा और उसके मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। उसकी चूत में एक तेज़ ऐंठन सी उठी, गर्म और गीली।

अमर का हाथ अब उसकी नाभि के नीचे से और भी नीचे सरकने लगा, उसकी साड़ी की चुन्नट में खो जाते हुए। मीरा ने अपनी जाँघों को अनजाने में ही सख्त कर लिया, एक अंतिम विरोध जो उसकी देह की तीव्र चाहत के आगे बेबस था। "रुक… रुको," उसने हाँफते हुए कहा, लेकिन उसकी अपनी हथेली अमर के सीने पर जा पड़ी, उसके गर्म, कठोर मांस को महसूस करते हुए। अमर ने पल्ले के खिंचाव को छोड़ा और इस बार अपना पूरा का पूरा हथेली भर हाथ मीरा के स्तन पर रख दिया। उसकी उँगलियाँ उस भारी, मखमली गोलाई में धँस गईं। मीरा का सिर पीछे की ओर झटका सा गया, उसके होंठ खुल गए।

"देख रहा हूँ… सात साल से यही सपना देख रहा था," अमर बुदबुदाया, और अपने अँगूठे ने कपड़े के ऊपर से ही, उसके निप्पल के कड़क होते उभार पर एक जानबूझकर, धीमा चक्कर लगाया। मीरा के शरीर में एक ज्वाला सी लपक उठी। उसने अपनी बाँहें अमर के गले के पास लपेट लीं, उसे और नज़दीक, और गहराई से अपने शरीर से दबाने की कोशिश में। अब दोनों के बीच कोई जगह नहीं बची थी, सिर्फ गीले कपड़ों का घर्षण, पसीने की चिपचिपाहट और दो देहों की वह जलती हुई इच्छा थी जो बारिश की आवाज़ में डूबी हुई, हर पल और उग्र होती जा रही थी।

अमर का हाथ उसके स्तन पर एक दृढ़, दावेदारी भरी पकड़ बनाए हुए था। मीरा की साँसें फुफकार में बदल गईं जब उसने अपना मुँह खोला और अमर की गर्दन की तरफ बढ़ा, उसकी त्वचा पर हल्के से अपने दाँत गड़ा दिए। यह एक प्रतिक्रिया थी, एक पश्चाताप रहित जवाब। अमर के कंधे की मांसपेशियाँ उसके होंठों के नीचे तन गईं और उसके मुँह से एक गहरी, दबी हुई कराह निकली। "भाभी…" उसने कहा, और उसका हाथ मीरा की पीठ के नीचे सरक गया, उसकी गांड के मुलायम घुमाव को अपनी हथेली में समेट लिया, उसे अपने कड़क लंड की ओर दबाया जो अब उसके मोटे कपड़ों के पीछे स्पष्ट रूप से उभर आया था।

मीरा ने उस कठोरता को महसूस किया और उसकी चूत में एक नया स्पंदन हुआ, गीला और जरूरी। उसने अपनी ठुड्डी अमर के कंधे से हटाकर, सीधे उसकी आँखों में देखा। अँधेरे में भी वह चमक साफ थी। "तुम… तुम्हारा…" वह बोल नहीं पाई। अमर ने जवाब में अपना सिर हिलाया और उसके पल्लू के गाँठ को खोलने लगा, उँगलियाँ बेताब लेकिन निपुण। कपड़ा ढीला हुआ और मीरा के स्तन का ऊपरी हिस्सा, उसकी गोलाई और गहरी खाई का एक हिस्सा, अचानक रात की हवा के संपर्क में आ गया। उसकी त्वचा पर रोंगटे खड़े हो गए।

"इतने साल… इतने साल इस कपड़े के पीछे छुपी इस चीज़ के लिए तरसता रहा," अमर बुदबुदाया और अपना सिर झुकाकर, उसने अपने गर्म होंठ उसी उजले हिस्से पर रख दिए। मीरा का शरीर बिजली के एक नए झटके से काँप उठा। उसके हाथ अमर के बालों में फँस गए, उसे अपनी ओर दबाए रखा। अमर के होंठ ने एक नरम, गीला चुंबन दिया, फिर दाँतों का हल्का सा कसाव। उसकी जीभ ने त्वचा का स्वाद चखा – पसीना, गर्मी और एक बेहोश सी खुशबू।

अमर का दूसरा हाथ, जो अब तक उसकी गांड को मसल रहा था, अब साड़ी की चुन्नटों के भीतर और गहराई में चला गया। उसकी उँगलियाँ उसकी जाँघ के आंतरिक भाग को छू गईं, उस नाजुक, गर्म त्वचा को जहाँ से मीरा की अपनी गर्मी रिस रही थी। मीरा की जाँघें अनैच्छिक रूप से थोड़ी और खुल गईं, एक मूक निमंत्रण। अमर की साँसें तेज हो गईं। उसकी उँगली ने वहाँ एक कोमल, खोजभरी गोलाई बनाई, साड़ी के अंदरूनी कपड़े को भीगा हुआ महसूस किया।

"यह… यह सब गीला है, भाभी," उसने उसके कान में फुसफुसाया, उसकी लौ को अपनी जीभ से छुआ। मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं, शर्म और वासना से डूबी हुई। उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर केवल एक हल्की सिसकारी निकली। अमर की उँगली ने उस भीगे हुए कपड़े पर दबाव डाला, सीधे उसके चूत के ऊपर से। एक ऐंठन ने मीरा के पेट के निचले हिस्से को जकड़ लिया। उसने अपना माथा अमर के सीने से टिका लिया, अपने शरीर को उस हल्के, दबाव भरे स्पर्श में ढालते हुए।

बारिश की आवाज़ अब एक लगातार गड़गड़ाहट थी, उनकी हर साँस, हर कराह को छुपा रही थी। अमर ने अपना मुँह उसके स्तन से हटाया और उसके होंठों की ओर देखा। उसकी नज़रें एक सवाल पूछ रही थीं। मीरा ने कुछ नहीं कहा, बस अपने होंठों को थोड़ा सा खोला, आँखें अर्ध-बंद। यही काफी था। अमर ने उसके होंठों पर जबरदस्ती नहीं की। उसने पहले अपने अँगूठे से उसके निचले होंठ को सहलाया, उसकी नमी को महसूस किया, फिर धीरे से, बड़े धैर्य से, अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

यह चुंबन विस्फोटक था। इसमें सात साल की दबी हुई भूख थी। मीरा के हाथ अमर की पीठ पर कस गए, उसकी कमीज को मुट्ठियों में बांधते हुए। अमर की जीभ ने उसके दाँतों का दरवाजा खटखटाया और मीरा ने तुरंत उसे अंदर आने दिया। उनकी जीभों का संगम नमकीन, जरूरी और अराजक था। अमर का हाथ, जो अब तक उसकी चूत पर दबाव बनाए हुए था, अब रुक-रुक कर हल्के घेरे लगाने लगा, हर घूमती उँगली मीरा को उसकी ओर और धकेलती गई। उसकी हिचकी भरी साँसें अब अमर के मुँह में खो रही थीं। दोनों के शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे, पसीने और वासना से सने हुए, हर पल एक नई, अनकही सीमा को पार करते हुए।

अमर के होंठों से अलग होते ही मीरा की सांस फूलने लगी। उसकी जीभ अभी भी अपने होंठों पर अमर के स्वाद का अनुभव कर रही थी। अमर का हाथ, जो उसकी चूत पर चक्कर काट रहा था, अब रुका नहीं। उसकी उंगली ने भीगे हुए कपड़े के नीचे से एक सटीक, दबाव भरा घेरा बनाया, सीधे उसके चट के उभार पर। मीरा का शरीर ऐंठ गया, उसने अपनी मुट्ठियाँ अमर की कमीज में और कस कर भींच लीं।

"अमर…" उसका नाम पहली बार उसके होंठों से निकला, एक टूटी हुई फुसफुसाहट। यह सुनकर अमर के चेहरे पर एक विजयी सी झलक दौड़ गई। उसने अपना माथा उसके माथे से टिका दिया, उनकी नाकें आपस में छू रही थीं। "बोलो, भाभी… क्या चाहिए तुम्हें?" उसने उसे और परेशान करते हुए पूछा, अपनी उंगली को हल्का सा दबाते हुए। मीरा ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी पुतलियाँ अँधेरे में चौड़ी थीं। वह कुछ नहीं बोली, बस अपने नितंबों को हल्का सा ऊपर उठाया, उस दबाव की ओर।

यह देखकर अमर के गले से एक गुर्राहट निकली। उसने अपना दूसरा हाथ उठाया और मीरा के साड़ी के पल्लू को और खोलने लगा। कपड़ा अब ढीला हो चुका था, और उसके एक हल्के से खिंचाव से मीरा का दायाँ स्तन पूरी तरह से बाहर आ गया, भारी और लटकता हुआ, उसका काला निप्पल अँधेरे में भी कड़ा हुआ दिख रहा था। रात की हवा का स्पर्श पाते ही मीरा सिहर उठी। अमर ने तुरंत अपना मुँह उस ओर झुकाया। इस बार उसने चूमा नहीं। उसने अपनी जीभ से उस निप्पल के चारों ओर एक बड़ा, धीमा घेरा बनाया, गर्म और गीला।

"हाँ… ओह…" मीरा का सिर पीछे को गिर गया। उसकी एक बाँह अमर के सिर को पकड़े हुई थी, दूसरी उसकी पीठ पर नीचे की ओर सरक रही थी, उसके नितंबों के घुमाव को महसूस करते हुए। अमर ने निप्पल को अपने होंठों के बीच ले लिया और धीरे-धीरे चूसना शुरू किया, एक लयबद्ध खिंचाव जो मीरा की चूत से सीधा जुड़ा हुआ था। हर चूस के साथ उसकी योनि में एक गर्म ऐंठन उठती, गीलेपन को और बढ़ाती।

अमर का हाथ अब साड़ी के भीतर और साहसी हो गया। उसने उस भीगी हुई पेटी को एक तरफ कर दिया और अपनी उंगलियों से सीधे उसके चूत के बालों को, फिर उसके गीले भगोष्ठ को टटोला। मीरा की जाँघें तुरंत काँप उठीं। उसकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं। "वहाँ… मत…" वह विरोध करने की कोशिश करती रही, पर उसका शरीर तो उसकी उंगली की ओर बढ़ रहा था। अमर ने अपनी मध्यमा उंगली को उसके भगद्वार के चिपचिपे, गर्म मांस पर रख दिया, बिना अंदर घुसे, बस उसे ऊपर-नीचे हल्का सा रगड़ा।

उस रगड़ की लय ने मीरा को पागल कर दिया। उसने अमर के कान को अपने दाँतों से काट लिया, ज्यादा जोर से नहीं, पर उतना ही कि उसमें दर्द का एक झटका दौड़े। अमर ने अपना स्तन चूसना जारी रखा, उसके निप्पल को अपनी जीभ से नचाते हुए। फिर, अचानक, उसने अपनी उस उंगली को, जो चूत के ऊपर नाच रही थी, एक तेज, दबाव भरे धक्के से अंदर घुसा दिया।

मीरा के मुँह से एक तीखी, दबी हुई चीख निकली, जो बारिश की आवाज में खो गई। उसकी आँखें फैल गईं, उसकी उंगलियाँ अमर की पीठ में गड़ गईं। अंदर की गर्मी, तंगी और नमी ने अमर को भी हिला दिया। उसने अपनी उंगली को एक पल के लिए स्थिर रखा, उसे अंदर घुसे रहने दिया, उसकी मुट्ठी उसके बालों से सटी हुई। "कितनी… गर्म है…" उसने काँपती हुई साँसों के बीच कहा।

फिर उसने हिलना शुरू किया। धीरे-धीरे पहले, उंगली को आधी बाहर निकाल कर फिर से अंदर डालते हुए। मीरा का मुँह खुला रह गया, उसकी साँसें हिचकियों में बदल गईं। उसकी आँखें अमर के चेहरे पर जमी हुई थीं, जो अब उसके स्तन से ऊपर उठ आया था और उसे देख रहा था, हर प्रतिक्रिया को चुराते हुए। हर अंदर-बाहर के साथ, मीरा के शरीर में एक नया झटका लगता। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ रही थी, उसकी उंगली को चूसते हुए।

अमर ने अपना अँगूठा ऊपर लगाया और उसके भगशेफ के सख्त होते उभार पर रगड़ना शुरू कर दिया। मीरा की कराह अब लगातार हो गई, एक टूटी हुई लय। "ऐसे… हाँ… बस ऐसे ही," वह बुदबुदाई, उसकी एड़ियाँ जमीन में गड़ गईं, अपने कूल्हों को उसकी उंगली की ओर उठाते हुए। उसने अपने स्तन पर अमर के हाथ को पकड़ लिया और उसे अपने दूसरे स्तन पर ले गई, उसे दबाने के लिए मजबूर किया। अमर ने खुशी से मान लिया, उसके दूसरे निप्पल को अपनी उंगलियों के बीच लेकर मरोड़ा।

उसकी उंगली की गति तेज होने लगी, गहरी होने लगी। मीरा अपने आप को संभाल नहीं पा रही थी। उसकी पलकें झपकना बंद हो गई थीं, उसका शरीर एक तार की तरह तन गया था। वह कगार पर झूल रही थी, उस उँगली के चारों ओर जो उसे भेद रही थी और उस अँगूठे के चक्कर जो उसे पागल कर रहे थे। अमर ने इसे महसूस किया। उसने अपना मुँह फिर से उसके कान के पास लाया। "सात साल का सारा प्यार… आज एक रात में निकाल दूंगा, भाभी," उसने कहा और अपनी उंगली में एक जानलेवा गति भर दी।

अमर की उंगली के उस तेज़, गहरे धक्के ने मीरा के शरीर को एक ऐसी कगार पर पहुँचा दिया जहाँ से वापसी नामुमकिन लग रही थी। उसकी कराहें अब दबी हुई चीखों में बदलने लगीं, हर बार जब अमर की उंगली पूरी तरह अंदर घुसती, उसकी कोमल दीवारों को चीरती हुई। "अरे… ओह… अमर!" उसने उसका नाम फिर पुकारा, इस बार आवाज़ में आत्मसमर्पण का एक स्पष्ट स्वर।

अमर ने अपनी उंगली की गति को और तीव्र कर दिया, साथ ही अपना अंगूठा उसके भगशेफ पर दबाते हुए एक तेज़, गोलाकार रगड़ जारी रखी। मीरा की आँखें लुढ़क गईं, उसकी पलकें तेजी से झपकने लगीं। उसने अमर के कंधे को अपने नाखूनों से इस तरह खरोंचा कि उसकी कमीज के नीचे से लाल रेखाएँ उभर आईं। "रुक… मैं… मैं गिरने वाली हूँ…" वह हाँफी।

"गिर जा, भाभी… मैं संभाले हुए हूँ," अमर ने कहा और अपना दूसरा हाथ उसकी पीठ के नीचे से लगाकर उसे और सहारा दिया। उसने अपना मुँह फिर से उसके स्तन पर लगाया, इस बार दोनों निप्पलों को बारी-बारी से चूसने और दाँतों से हल्का कसने लगा। हर चूस के साथ मीरा की चूत सिकुड़ती, उसकी उंगली को और चूसती।

फिर अमर ने एक और उंगली, तर्जनी, धीरे से उसके भगद्वार के चिपचिपे प्रवेश द्वार पर टिकाई। मीरा ने एक तीव्र सिहरन महसूस की। "नहीं… बस एक ही…" उसने कसमसाया, पर उसकी देह ने विरोध नहीं किया। अमर ने धीरे से दबाव बढ़ाया और दूसरी उंगली भी पहली के साथ, धीरे-धीरे, उसकी तंग गर्मी में समा गई। मीरा का मुँह खुला रह गया, एक लंबी, दम घुटती सी कराह निकली। दो उंगलियों का विस्तार उसे भरा हुआ, चीरा हुआ सा महसूस करा रहा था, पर दर्द में एक अभूतपूर्व आनंद छुपा था।

अमर ने अब अपनी उंगलियों को एक साथ, धीमी गति से अंदर-बाहर करना शुरू किया, हर बार पूरी लंबाई तक। उसकी हथेली उसके बालों और भगोष्ठ से टकराती, एक गीली, चपेट भरी आवाज़ पैदा करती। बारिश की आवाज़ अब दूर होती जा रही थी, बस उन दोनों की साँसों की सिसकारी और शरीरों के चिपचिपे टकराव की आवाज़ गूंज रही थी। मीरा ने अपना सिर अमर के सीने पर पटक दिया, उसकी चूचियाँ अब अमर के होंठों से मुक्त होकर हवा में काँप रही थीं, गुलाबी और सूजी हुई।

"तुम्हारा… तुम्हारा लंड… चाहिए…" मीरा ने अचानक खुद को कहते हुए सुना, उसकी आवाज़ में एक ऐसी जरूरत थी जो सात साल की भूख से कहीं ज्यादा प्रबल थी। यह सुनकर अमर के शरीर में एक झटका सा लहराया। उसने अपनी उंगलियाँ एक अंतिम, गहरी चोट देकर बाहर खींच लीं, जिससे मीरा का शरीर ऐंठकर हवा में लहराया।

अमर ने अपने हाथों से उसकी साड़ी को और खोलना शुरू किया, जल्दी-जल्दी, उसके कमर से लिपटे हुए कपड़े को ढीला किया। मीरा ने उसकी मदद की, अपने नितंबों को हल्का ऊपर उठाते हुए ताकि साड़ी नीचे खिसक सके। कपड़ा उसकी जाँघों पर, फिर घुटनों पर आ गया। अमर ने खुद अपनी धोती की गाँठ खोली, और अपना कड़क, नंगा लंड बाहर आया, उसकी नसें धड़कती हुई, शीशे की तरह चमकता हुआ। मीरा की नज़रें उस पर गड़ गईं, उसके मुँह में पानी भर आया।

वह उसे देखते हुए, अपने घुटनों के बल बैठ गया। उसने मीरा की जाँघों को अपने हाथों से पकड़कर खोला, उसके बीच के उस गीले, काले बालों और गुलाबी भगोष्ठों वाले रहस्य को पूरी तरह देखा, जो अब उसकी उंगलियों के आघात से और भी सूजा हुआ और चमकदार था। "देख रहा हूँ… सात साल का इंतज़ार… यही था," उसने कहा और अपने लंड की गाँठ उसके चूत के गीले प्रवेश द्वार पर टिका दी, बिना अंदर घुसे।

मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं, उसकी सारी देह एक सिहरन भरी प्रतीक्षा में तन गई। उसने अपने कूल्हों को हल्का सा हिलाया, उस कठोरता को अपने अंदर ढूँढते हुए। अमर ने धैर्य नहीं खोया। उसने अपने लंड के सिरे से उसके भगशेफ के आसपास गोल-गोल घेरे बनाए, उसकी चूत की गर्मी से खेलते हुए। "माँग… मुझसे माँग, भाभी," उसने उसे और तड़पाते हुए कहा।

"अंदर… ले आ अंदर… प्लीज…" मीरा की आवाज़ रोने जैसी हो गई, उसकी उंगलियाँ अमर की बाँहों में घुस गईं। यह सुनते ही अमर ने एक लंबी, गहरी साँस भरी और अपने कूल्हों को आगे किया। लंड का मोटा सिरा उसकी तंग दीवारों के प्रतिरोध को चीरता हुआ, धीरे-धीरे, लेकिन निरंतर अंदर समाने लगा। मीरा का मुँह खुला रह गया, एक लंबी, दर्द और आनंद से भरी कराह निकल गई, जब अमर पूरी तरह अंदर घुस गया, उसकी जाँघें उसके कूल्हों से जा टकराईं। दोनों एक पल के लिए जमे रहे, इस पूर्णता के अहसास में डूबे हुए।

अमर के अंदर घुसे रहने का अहसास मीरा के लिए एक ऐसी पूर्णता थी जिसे वह सात साल से भूल चुकी थी। वह जमी हुई सी रह गई, उसकी सारी देह उस तीखी भरावट को अपने भीतर समेटने में व्यस्त थी। अमर ने भी एक गहरी, कंपकंपी भरी साँस छोड़ी, अपना माथा उसके माथे से टिकाए हुए। "कितनी… तंग है…" उसने कराहते हुए कहा।

फिर उसने हिलना शुरू किया। पहला धक्का धीमा, संकोच भरा था, मानो वह इस क्षण को लंबा खींचना चाहता हो। मीरा की आँखें फिर से खुल गईं, उसकी नज़रें अमर के चेहरे पर चिपकी रहीं, जो उसके ऊपर झुका हुआ था और हर प्रतिक्रिया को पढ़ रहा था। दूसरा धक्का थोड़ा गहरा था। मीरा के होंठों से एक हल्की सी सिसकारी निकली, उसकी उँगलियाँ अमर की पीठ पर चलने लगीं, उसकी तनी हुई मांसपेशियों को महसूस करते हुए। "और… और जोर से," वह फुसफुसाई।

अमर ने उसकी बात मान ली। उसने अपने कूल्हों को पीछे खींचा और फिर एक दृढ़, पूरी ताकत के साथ अंदर धकेल दिया। मीरा का शरीर हवा में उछल सा गया, उसकी पीठ चरखे से टकराई, पर उसे कोई दर्द महसूस नहीं हुआ। अब धक्के तेज होने लगे, एक लयबद्ध थपथपाहट में बदलते हुए। अमर का लंड हर बार पूरी लंबाई से अंदर जाता, मीरा की गर्म, गीली तंगी में डूबता, और फिर लगभग पूरा बाहर आकर फिर से वही रास्ता तय करता। हर अंदर-बाहर के साथ मीरा के स्तन हवा में उछलते, उसके निप्पल कड़े होकर काँप रहे थे।

अमर का एक हाथ उसकी गांड के नीचे से सरककर उसकी जाँघ पर आ गया, उसे और ऊपर उठाकर, अपने लंड को और गहराई तक पहुँचने का रास्ता देते हुए। उसका दूसरा हाथ मीरा के मुँह की ओर बढ़ा। उसने अपनी उँगलियाँ उसके होंठों पर रख दीं। मीरा ने तुरंत उन्हें अपने मुँह में ले लिया, चूसना शुरू कर दिया, अपनी जीभ से उनकी नमकीन गंदगी को साफ करते हुए। यह देखकर अमर की आँखों में वासना की एक नई लहर दौड़ गई। उसकी गति और तेज हो गई, उसके कूल्हों की थपथपाहट की आवाज़ अब चिपचिपी और स्पष्ट थी।

"कहो… किसका है यह चूत?" अमर ने हाँफते हुए पूछा, उसकी साँसें मीरा के चेहरे पर गर्म और तेज थीं। मीरा ने उसकी उँगलियाँ मुँह से निकालीं। "तेरा… सिर्फ तेरा, अमर," उसने रोएँदार आवाज़ में कहा और अपनी गर्दन तानकर उसके होंठों को चूम लिया। यह चुंबन हिंसक था, दाँतों का टकराव था, जीभों का उन्माद था।

अमर ने अपना हाथ उसकी जाँघ से हटाकर फिर से उसके स्तन पर लौटाया, दोनों को एक साथ मसलते हुए, उनके भार को अपनी हथेलियों में उछालते हुए। मीरा की कराहें निरंतर हो गईं, हर धक्के के साथ एक नया स्वर निकालतीं। वह कगार के करीब पहुँच रही थी, उसकी चूत तेजी से सिकुड़ रही थी, अमर के लंड को हर बार और जोर से चूसती हुई। "मैं… मैं जा रही हूँ…" वह चेतावनी देती हुई बुदबुदाई।

"रुक… मेरे साथ रुक," अमर ने गुर्राते हुए कहा और अपनी गति को अचानक धीमा कर दिया, बस लंड के सिरे से उसके अंदरूनी सबसे संवेदनशील हिस्से को रगड़ने लगा। मीरा कराह उठी, उसने अमर के बाल खींचे। "नहीं… ऐसे मत तड़पाओ… पूरा कर दो!"

अमर ने उसकी गुहार सुनी। उसने अपनी बाँहें मीरा के नीचे से लपेटीं, उसे पूरी तरह उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया, जबकि उसका लंड अभी भी उसके भीतर गहराई तक घुसा हुआ था। इस नई स्थिति में गहराई और बढ़ गई। मीरा की आँखें फैल गईं, उसने अपनी बाँहें अमर के गले के पास कसकर लपेट लीं। अमर ने अब ऊपर-नीचे उठना शुरू किया, मीरा को अपने ऊपर गिराते हुए, फिर ऊपर खींचते हुए। मीरा का सिर पीछे लुढ़क गया, उसके बाल हवा में लहराए। वह अब खुद को रोक नहीं पा रही थी। उसकी चीखें बेलगाम हो गईं, हर गहरे धक्के के साथ। अमर का सारा शरीर तन गया, उसकी पीठ की मांसपेशियाँ कठोर हो गईं। "अब… अब भाभी… साथ…" वह चीखा और एक अंतिम, गहरे धक्के के साथ, उसने मीरा को अपने भीतर पूरी तरह डुबो दिया। मीरा का शरीर एक जोरदार ऐंठन में काँप उठा, उसकी चूत ने अमर के लंड को ऐसे जकड़ लिया जैसे जान निकल रही हो। उसकी एक लंबी, कंपकंपी भरी कराह निकली और उसके भीतर गर्मी की लहरें फूट पड़ीं। अमर ने भी एक गहरी गुर्राहट के साथ अपना वीर्य उसकी गहराई में उड़ेल दिया, झटके के साथ, एक के बाद एक। दोनों काँपते हुए, पसीने से तर, एक-दूसरे से चिपके हुए, उस अनंत क्षण में डूबे रहे।

उनके शरीरों का कंपन धीरे-धीरे शांत हुआ, पर अंदर की गर्मी अभी भी धधक रही थी। अमर का लंड अब नरम होकर मीरा की चूत से बाहर खिसक गया, एक गर्म, चिपचिपी धारा उसकी जाँघों पर बहती हुई महसूस हुई। मीरा ने अपना सिर अमर के सीने पर टिका दिया, उसकी धड़कनें अभी भी तेज थीं, उसके कानों में गूंज रही थीं। अमर के हाथ उसकी पीठ पर थे, हल्के से सहलाते हुए।

"अब… अब क्या होगा?" मीरा ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक डर था, जो अभी-अभी के उन्माद के बाद सतह पर आ गया था। अमर ने उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फिराईं, उसके गीले अलकों को संवारते हुए। "जो तुम चाहो, भाभी," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में भी एक अनिश्चितता झलक रही थी। बाहर बारिश रुक चुकी थी, सिर्फ फर्श से टपकते पानी की आवाज़ आ रही थी।

मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसके भीतर एक तूफान चल रहा था-शर्म, पश्चाताप, लेकिन उससे भी ज्यादा तीव्र, एक ऐसी तृप्ति जो उसे सात साल में पहली बार मिली थी। उसने अमर को और कसकर पकड़ लिया, मानो वह उसे गायब होने से रोकना चाहती हो। "कोई देख लेगा… कल सुबह…" वह बुदबुदाई।

अमर ने उसका चेहरा अपनी हथेली पर उठाया। अँधेरे में उसकी आँखों की चमक देखी। "तो क्या? मैं तुम्हारा हूँ। तुम मेरी।" उसने कहा और उसके होंठों पर एक कोमल चुंबन दिया, यह चुंबन अभी-अभी के हिंसक जुनून से बिल्कुल भिन्न था। मीरा ने उस चुंबन में एक वादा महसूस किया, या शायद एक भ्रम। उसने जवाब दिया, अपनी जीभ से उसके होंठों को छुआ।

फिर, अचानक, अमर का हाथ फिर से उसके शरीर पर चला गया, लेकिन इस बार उतावला नहीं, बल्कि एक तरह की पूजा भरी मालिश की तरह। उसकी उँगलियाँ मीरा के स्तनों पर चली गईं, जो अब थकान से भारी लटक रहे थे। उसने निप्पलों के चारों ओर धीरे-धीरे घेरे बनाए। "देखो तो… कितने सुंदर हैं," उसने कहा। मीरा ने एक हल्की कराह निकाली, यह स्पर्श अब संवेदनशीलता से भरा था। उसकी चूत में एक हल्की सी ऐंठन फिर से उठी, जैसे उसका शरीर और चाहता हो।

अमर ने इसे महसूस किया। वह मुस्कुराया। "अभी भी भूखी हो?" उसने नटखट अंदाज में पूछा। मीरा ने शर्म से अपना चेहरा छुपा लिया। अमर ने उसे धीरे से पीठ के बल लिटा दिया, जमीन पर पड़ी उसकी साड़ी पर। उसने अपने घुटने टेके और उसकी जाँघों के बीच अपना सिर रख दिया। मीरा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। "क्या कर रहे हो?"

"वो कर रहा हूँ जो सात साल सोचता रहा," अमर ने कहा और अपनी जीभ से उसके भगोष्ठों को, अभी भी सूजे हुए और गीले, एक लंबी, धीमी चाट दी। मीरा का शरीर ऐंठ गया, उसके हाथ जमीन पर पसीने से चिपक गए। अमर ने जानबूझकर धीमी गति से काम लिया। उसने अपनी जीभ का फ्लैट हिस्सा उसकी पूरी चूत पर फिराया, उसके बालों को गीला किया, फिर अपनी नोक से भगशेफ को ढूँढा और उस पर जिद्दी, गोलाकार चक्कर लगाने लगा।

मीरा की साँसें फिर तेज होने लगीं। उसने अपनी एड़ियाँ जमीन पर गड़ा दीं और अपने कूल्हे ऊपर उठा लिए, उसकी जीभ को और अंदर तक पहुँचने दिया। अमर ने उसके प्रवेश द्वार को अपने होंठों से चूसा, फिर जीभ को अंदर घुसाने की कोशिश की। वह तंग था, लेकिन उसकी जीभ पतली और दृढ़ थी। वह धीरे से अंदर घुसी। मीरा चीख उठी, उसकी उँगलियाँ अमर के बालों में कसकर फँस गईं, उसे अपनी ओर दबाए रखा।

अमर ने अपनी जीभ से अंदर एक तेज, लेकिन छोटी गति शुरू की, उसकी कोमल दीवारों को चाटते हुए, उसके अपने स्वाद और अपने वीर्य के मिश्रण को चखते हुए। मीरा का शरीर फिर से उबलने लगा। यह संवेदना भिन्न थी-अधिक केंद्रित, अधिक घुसपैठ करने वाली। उसकी कराहें ऊँची हो गईं। "अरे… ओह… बस… वहीं…" वह हाँफती रही।

अमर ने एक हाथ उठाया और अपनी दो उँगलियाँ फिर से उसकी चूत में घुसा दीं, जीभ के साथ एक साथ। भराव और उस जिद्दी रगड़ ने मीरा को कुछ ही पलों में फिर से कगार पर पहुँचा दिया। उसका शरीर तन गया, उसकी चूत अमर की उँगलियों और जीभ को चूसने लगी। "अमर… मैं गिर रही हूँ… अभी!" वह चिल्लाई।

और फिर वह गिरी। एक लंबी, कंपकंपी भरी ऐंठन ने उसके पेट के निचले हिस्से को जकड़ लिया। उसकी चूत तेजी से सिकुड़ी, अमर की उँगलियों और जीभ को बाहर धकेलती हुई। एक गर्म लहर फिर से बह निकली। मीरा के मुँह से कोई आवाज नहीं निकली, बस एक लंबी, रुक-रुक कर निकलती सिसकारी। उसका शरीर जमीन पर ढेर हो गया, पूरी तरह थक कर चूर।

अमर ने अपना मुँह हटाया और उस पर लेट गया, उसे अपने नीचे दबा लिया। उसने उसके होंठ चूमे, उसके अपने ही स्वाद को साझा करते हुए। "अब सो जाओ, भाभी," उसने फुसफुसाया। मीरा ने आँखें खोलीं। उसने अमर के चेहरे को देखा, जो अब थकान और संतुष्टि से नर्म पड़ गया था। उसने उसकी एक लट को माथे से हटाया। "तुम जाओगे नहीं?" उसने डरते हुए पूछा।

"नहीं। फर्सक तक नहीं," अमर ने कहा और उसे अपने पास घुमा लिया, ताकि उसकी पीठ उसकी छाती से सट जाए। उसने अपनी बाँह उसके नीचे से निकाल कर उसे कसकर पकड़ लिया, उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में समेटा। मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। शरीर की गर्माहट, पसीने की गंध, और भीतर छुपा वह भय-सब कुछ मिलकर एक विचित्र शांति दे रहा था। बाहर, गाँव में मुर्गे की बांग सुनाई देने लगी थी। पहला प्रकाश दहलीज की ओर रेंग रहा था। उसने अमर की बाँह को और कसकर पकड़ लिया। आज रात तो बीत गई। पर कल? कल का डर अभी भी उसकी चूत की गर्मी में, उसकी धड़कनों के साथ, जीवित था।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *