बुजुर्ग की गर्म सांसें और नौकरानी के गीले सपने






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🔥 बुजुर्ग की गर्म सांसें और नौकरानी के गीले सपने

🎭 गाँव के एकांत हवेली में एक ऐसा रहस्य पनप रहा है जिसमें उम्र का फासला सिर्फ एक बहाना है। जब रात की चुप्पी में बूढ़े बाबूजी की आँखें उसकी नौकरानी के उभरे हुए अंगों पर टिक जाती हैं, तो वासना का एक ऐसा खेल शुरू होता है जहाँ छूने की इच्छा और पकड़े जाने का डर एक साथ घुलमिल जाते हैं।

👤 बाबूलाल (६८ वर्ष): कमर झुकी, पर नज़रें चटख। विधुर, जवानी की भूख अभी शांत नहीं हुई। छोटी कमीज से झांकते हुए पेट पर मौजूद सफ़ेद बाल, और हमेशा तैयार रहने वाला एक ख़ास अंग।

मुन्नी (२२ वर्ष): गोरी, घने काले बाल, भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के ब्लाउज में हिलती रहती हैं। मजबूरी में नौकरी, पर बाबूलाल की नज़रों से होने वाली गर्माहट उसे अंदर तक गुदगुदी दे जाती है।

📍 सेटिंग: ठाकुरबाड़ी गाँव की पुरानी हवेली, जहाँ दिन में चहल-पहल और रात में सन्नाटा होता है। बरसात की एक शाम, बिजली चले जाने के बाद मोमबत्तियों की रोशनी में पहली बार उनके हाथ अनजाने में टकराते हैं।

🔥 कहानी शुरू: बरसात की रिमझिम बंद हो चुकी थी, पर हवेली के भीतर नमी अभी भी चिपचिपा सा माहौल बनाए हुए थी। बिजली गुल थी और बाबूलाल कुर्सी पर बैठे, मुन्नी की ओर देख रहे थे, जो मोमबत्ती जलाने के बहाने झुकी हुई थी। उसका ब्लाउज थोड़ा खिसका और बाबूलाल की नज़र उसकी कमर और नीचे खिंचे हुए साड़ी के पल्लू पर अटक गई।

"मुन्नी, पानी ला दो। गला सूख रहा है।"

उसकी आवाज़ में एक कंपन था। मुन्नी ने हाँ कहा और पानी का गिलास लेकर आई। जब उसने गिलास बाबूलाल के हाथ में दिया, उनकी उंगलियाँ उसकी कलाई को छू गईं। एक क्षण के लिए सब थम सा गया। मुन्नी ने आँखें नीची कर लीं, पर उसके होठों पर एक मामूली सी कंपन दौड़ गई।

बाबूलाल ने पानी पिया और गिलास वापस करते हुए कहा, "आज कमर में दर्द है। थोड़ी सी मालिश कर दोगी?"

मुन्नी का दिल ज़ोर से धड़का। यह पहली बार नहीं था, पर आज की रात कुछ अलग थी। हवा में मौजूद नमी उनके बीच की गर्माहट को और बढ़ा रही थी। वह धीरे से उनके पीछे खड़ी हुई और अपनी उंगलियों को उनके कंधों पर रखा। बाबूलाल की आँखें मूंद गईं। उसकी उंगलियों का हल्का दबाव, उनकी त्वचा पर उसकी गर्माहट का अहसास।

"ज़ोर से दबाओ," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।

मुन्नी ने ज़ोर लगाया। उसकी हथेलियाँ उनकी पीठ के घुमावों को महसूस कर रही थीं। तभी बाबूलाल ने अपना हाथ पीछे ले जाकर उसकी कलाई को पकड़ लिया। मुन्नी स्तब्ध रह गई। उनकी पकड़ मज़बूत थी, गर्म।

"तुम्हारे हाथ बहुत नर्म हैं," उन्होंने कहा, उनकी अंगुलियाँ उसकी कलाई पर हल्के से फिरती हुईं।

मुन्नी ने सांस रोक ली। उसकी नज़र बाबूलाल के कान पर पड़ी, जहाँ से सफ़ेद बाल झांक रहे थे। वह अपने अंदर एक गर्म लहर महसूस कर रही थी। बाहर, मेंढक टर्रा रहे थे और दूर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। पर हवेली के इस कमरे में, सिर्फ उनकी सांसों की आवाज़ और मोमबत्ती की लौ का टिमटिमाना था।

बाबूलाल ने धीरे से उसकी कलाई छोड़ी, पर उनकी उंगली उसकी हथेली पर एक लकीर सी खींच गई। मुन्नी ने मालिश जारी रखी, पर अब हर स्पर्श जानबूझकर, हर दबाव एक अनकहा सवाल बन गया। उसकी चूचियाँ कसकर उभरी हुई थीं, उसका शरीर एक अजीब सी गुदगुदी से भर उठा था। बाबूलाल ने आँखें खोलीं और ऊपर मुन्नी की ओर देखा। मोमबत्ती की रोशनी उसके होठों पर नाच रही थी।

"क्या हुआ?" मुन्नी ने धीमे से पूछा।

"कुछ नहीं," बाबूलाल ने कहा, "बस तुम्हारी परछाईं देख रहा था।" उनकी नज़र दीवार पर पड़ रही उसकी छाया पर थी, जहाँ उसके स्तनों का उभार साफ़ दिख रहा था।

मुन्नी ने अपनी सांस रोक ली। उसे लगा जैसे वह छाया के माध्यम से उसे नंगा देख रहे हों। उसने मालिश रोक दी, पर हटी नहीं। बाबूलाल ने अपना हाथ उठाया और हवा में उसकी छाया के उभार को छूने का नाटक किया।

"बाबूजी," मुन्नी की आवाज़ लड़खड़ा गई।

"हाँ?" उनकी आवाज़ में एक नटखट अल्हड़पन था।

कुछ कहने से पहले, दरवाज़े पर दस्तक हुई। दोनों एकदम सचेत हो गए। मुन्नी तेजी से पीछे हटी। बाबूलाल ने गहरी सांस ली। बाहर कोई था, और उनका गुप्त खेल अभी बस शुरू ही हुआ था।

दरवाज़ा खुला तो बाहर बारिश फिर से शुरू हो गई थी, और रामू काका खड़े थे, एक टॉर्च लिए हुए। "बाबूजी, बिजली विभाग वाले कह रहे थे कि अभी एक घंटा लगेगा," उन्होंने कहा और चला गया।

दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर वही गहरा सन्नाटा छा गया। मुन्नी अब भी दीवार से सटी खड़ी थी, उसकी सांसें तेज़ थीं। बाबूलाल ने कुर्सी से मुड़कर उसकी ओर देखा। "आ जाओ यहाँ," उन्होंने कहा, आवाज़ में एक नया, दबा हुआ आग्रह।

मुन्नी धीरे-धीरे चलकर उनके सामने आई, पर इस बार सीधे नहीं, बल्कि थोड़ी तिरछी खड़ी हुई, ताकि उसकी छाया फिर दीवार पर न पड़े। बाबूलाल ने उसकी इस चालाकी पर मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया और उसकी कलाई को फिर से पकड़ लिया, इस बार और नज़दीक खींचते हुए। "डर गई?" उन्होंने पूछा।

"नहीं," मुन्नी ने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी। बाबूलाल की अँगुलियाँ उसकी कलाई से होती हुईं धीरे-धीरे उसकी हथेली तक चली गईं, उसकी उँगलियों के बीच में घुसकर एक अजीब सी गुदगुदी पैदा करती हुईं। "फिर यह कंपन क्या है?" बाबूलाल ने फुसफुसाते हुए पूछा, और अपना दूसरा हाथ उठाकर उसके गाल पर रख दिया। उसकी त्वचा गर्म थी, बारिश की नमी से चमक रही थी।

मुन्नी ने आँखें मूंद लीं। बाबूलाल का अँगूठा उसके होठों के कोने पर आया, हल्के से दबाया। "तुम्हारे होंठ… बहुत गुलाबी हैं आज," उन्होंने कहा। उसकी सांसों की गर्माहट उसके चेहरे को छू रही थी। मुन्नी ने होंठों को दबाया, एक हल्की सी कराह निकलने से रोकते हुए।

तभी बाबूलाल ने अपना हाथ नीचे सरकाया, उसकी गर्दन पर, फिर कोलरबोन पर। उसका ब्लाउज पतला कपड़ा था, और उनकी उँगलियों का गर्म दबाव सीधे उसकी त्वचा तक पहुँच रहा था। वह उसकी चूची के ठीक ऊपर वाले हिस्से पर घूम रही थीं, एक गोलाकार मुद्रा में। मुन्नी ने सिर हिलाया, एक मामूली सी हाँ में, जो सिर्फ उसकी साँसों में ही सुनाई दी।

बाबूलाल ने दूसरे हाथ से उसकी कमर को पकड़ा और उसे और पास खींच लिया। अब उसके घुटने उनकी जांघों से टकरा रहे थे। "मालिश अधूरी रह गई," उन्होंने कहा, और अपना माथा उसके पेट से टिका दिया। मुन्नी ने अपने हाथ, लगभग अनायास ही, उनके सफ़ेद बालों में फिरने शुरू कर दिए। उसकी उँगलियाँ उनकी खोपड़ी के घुमावों में खो गईं।

थोड़ी देर वे इसी तरह खड़े रहे, सिर्फ सांसों और बारिश की आवाज़ के साथ। फिर बाबूलाल ने सिर हिलाया, और अपना चेहरा उसके पेट के निचले हिस्से में दबा दिया, नाभि के पास। मुन्नी का पूरा शरीर झटके से तन गया। उनकी गर्म सांसें उसके साड़ी के पतले कपड़े से रिसकर उसकी त्वचा तक पहुँच रही थीं। उन्होंने अपने होंठों से एक हल्का सा दबाव दिया, बस इतना कि कपड़ा उसकी त्वचा पर दब जाए।

"बाबूजी…" मुन्नी की आवाज़ एक दम घुटी हुई थी।

"हाँ, बोलो," उन्होंने कहा, मुँह दबे होने के कारण आवाज़ धुंधली सी।

"यह… ठीक नहीं है।"

"क्यों?" उन्होंने सिर उठाया, उनकी नज़रें सीधी उसकी आँखों में घुस गईं। "तुम्हारा शरीर कह रहा है कि ठीक है। तुम्हारी सांसें, तुम्हारी धड़कन… सब कह रहा है।" उन्होंने फिर से उसकी कमर पर हाथ फेरा, इस बार नीचे, उसके चूतड़ों के ऊपरी हिस्से पर। कपड़े का खिंचाव महसूस करते हुए उन्होंने हल्का सा दबाया। मुन्नी की आँखें चौंधिया गईं। उसने अपने होंठ काट लिए, एक लहर उसकी पीठ से होती हुई उसकी गांड तक दौड़ गई।

बाबूलाल ने मुस्कुराते हुए उसे थोड़ा और नीचे झुकाया, अब उनके चेहरे के स्तर तक। उनकी नज़रें उसके ब्लाउज के बटनों पर टिक गईं, जहाँ से दोनों चूचियों का उभार साफ़ दिखाई दे रहा था, कपड़े को अंदर से बाहर की ओर धकेल रहा था। उन्होंने एक उँगली उठाई और सबसे ऊपर वाले बटन के चारों ओर चक्कर लगाया, बिना छुए। "गर्मी लग रही है?" उन्होंने पूछा।

मुन्नी ने सिर हिला दिया, हाँ में। उसकी चूचियाँ कड़क हो चुकी थीं, और बटन के नीचे से निप्पल के उभार का आकार उभर रहा था। बाबूलाल ने आखिरकार उस बटन को छुआ, अपनी उँगली से हल्का सा दबाव दिया, जैसे किसी बटन को दबाने का अभ्यास कर रहे हों। मुन्नी ने एक तेज़ सांस भरी। बटन खुलने की आवाज़ नहीं आई, पर उसके मन में वह आवाज़ गूँज उठी। अगला पल क्या होगा, इस इंतज़ार में उसका पूरा शरीर बिजली की तरह काँप रहा था।

बटन पर उँगली का दबाव बढ़ा। बाबूलाल ने अपनी नज़रें उठाकर मुन्नी के चेहरे पर टिका दीं, उसकी हर सूक्ष्म प्रतिक्रिया को पढ़ते हुए। मुन्नी की साँसें छोटी-छोटी और तेज़ हो चली थीं। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो अगले पल का इंतज़ार कर रही हो। बाबूलाल ने अँगूठे और तर्जनी से उस बटन को पकड़ा और एक कोमल, सटीक खिंचाव दिया। धीमी सी 'चट' की आवाज़ हुई और ब्लाउज का वह हिस्सा थोड़ा खुल गया, दोनों चूचियों के बीच की जगह से एक झलक दिखाई दी।

"अब कम गर्मी लगेगी," बाबूलाल ने कहा, उनकी आवाज़ में एक गहरी, गुर्राहट भरी शरारत थी। उन्होंने दूसरे बटन की ओर रुख किया, लेकिन इस बार सीधे उसे नहीं खोला। उनकी उँगली ने खुले हुए भाग के किनारे से अंदर घुसकर, मुन्नी के उभार के निचले हिस्से को, ब्रा के ऊपरी कपड़े से हल्का सा स्पर्श किया। मुन्नी का सारा शरीर एक साथ सिकुड़ गया। एक मद्धम कराह उसके गले से निकली, जिसे रोकने का उसने व्यर्थ प्रयास किया।

बाबूलाल ने उसकी इस कराह को सुना और एक गहरी, संतुष्ट साँस ली। उन्होंने अपना मुँह उसके खुले हुए ब्लाउज के पास ले जाया और गर्म साँस छोड़ी। उस नम, गर्म हवा का स्पर्श मुन्नी के निप्पल पर हुआ, जो ब्रा के अंदर और भी सख्त होकर उभर आए। "तुम्हारा शरीर… बहुत बातें करता है," उन्होंने फुसफुसाया और अपनी जीभ की नोक से, बिना छुए, हवा में एक गोल घेरा बनाया, मानो उसके स्तन के चारों ओर चक्कर लगा रहे हों।

मुन्नी ने अपने हाथ, जो अब तक लटके हुए थे, बाबूलाल के कंधों पर रख दिए, खुद को संभालने के लिए। इस संपर्क ने बाबूलाल को और उत्तेजित कर दिया। उन्होंने अब दूसरा बटन खोल दिया, और फिर तीसरा। ब्लाउज का अगला हिस्सा पूरी तरह से खुल गया, उसकी सफ़ेद, फीते वाली ब्रा का ऊपरी भाग और उसके नीचे भरी हुई चूचियों का आकार साफ़ नज़र आने लगा। बाबूलाल ने ब्लाउज के पल्लू को एक ओर हटा दिया।

"सुंदर," उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा। उनका हाथ उसकी नंगी पीठ पर, ब्रा के फीतों के पास सरक आया। उन्होंने एक फीता पकड़ा और उसे अपनी उँगलियों के बीच रगड़ा। "बहुत कसी हुई है… तकलीफ़ तो नहीं होती?" उन्होंने पूछा, और फीते को हल्का सा खींचा, जिससे मुन्नी का सीना और आगे को उभर आया।

"ना… बाबूजी," मुन्नी ने कहा, पर उसका सिर 'हाँ' में हिल उठा। उसकी नज़रें अब भी बंद थीं, पर उसके होठों पर एक टेढ़ी, अनजानी मुस्कान थी। बाबूलाल ने फीता छोड़ा और अपनी हथेलियों को उसकी कमर से होते हुए, उसके चूतड़ों के गोलाई वाले हिस्से तक ले गए। उन्होंने दोनों हथेलियों से उसे कसकर पकड़ा और अपनी ओर खींचा, उसकी गांड को अपनी जांघों के बीच दबा दिया।

मुन्नी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे बाबूलाल के पैंट के बटन के नीचे एक सख्त उभार का अहसास हुआ। वह उनके और पास आ गई, उसकी जांघें उनकी जांघों से रगड़ खाने लगीं। बाबूलाल ने अपना सिर उठाया और उसके होंठों के पास ले आया। उनकी सांसें अब मिल रही थीं। "एक चुंबन… बस एक," उन्होंने कहा, मानो विनती कर रहे हों, पर उनकी आँखों में आदेश था।

मुन्नी ने अपने होठों को थोड़ा सा खोला, एक मूक अनुमति। बाबूलाल ने तुरंत उस अवसर का लाभ उठाया। उन्होंने उसके निचले होंठ को अपने होंठों के बीच ले लिया, नरमी से दबाया, चूसा। मुन्नी के हाथ उनके कंधों पर कसे गए। फिर वह चुंबन गहरा हुआ, उनकी जीभ ने उसके होठों के बीच की दरार को टटोला और अंदर प्रवेश पा गई। एक लंबी, गीली, गर्म फुर्तीलेपन भरी जीभ-कशी शुरू हो गई। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी, पर कमरे में सिर्फ उनके होंठों की चपचपाहट और अनियमित सांसों की आवाज़ गूंज रही थी।

बाबूलाल का एक हाथ उसकी ब्रा के अंदर सरकने लगा। उनकी उँगलियों ने उसके निप्पल को ढूंढ निकाला – गर्म, कड़क और नम। उन्होंने उसे अपनी उँगलियों के बीच दबोच लिया और हल्के से मरोड़ा। मुन्नी की कराह चुंबन में डूब गई। उसने अपनी जांघों को और खोल दिया, अनजाने में ही उस सख्त उभार पर दबाव बढ़ा दिया। बाबूलाल ने उसे और जोर से अपने पास खींच लिया, उनके शरीर अब पूरी तरह एक दूसरे से चिपके हुए थे, बारिश की नमी और शरीर की गर्मी से भीगे हुए।

बाबूलाल की उँगलियाँ उसके निप्पल को दबोचे हुए एक कोमल, लेकिन दृढ़ घुमाव दे रही थीं। हर मरोड़ के साथ मुन्नी की कमर में एक ऐंठन दौड़ जाती, और वह उनके मुँह में ही एक गहरी कराह भर देती। उनका चुंबन टूटा, और दोनों की सांसें एक-दूसरे के चेहरे पर गर्म और तेज़ चल रही थीं। बाबूलाल ने अपना मुँह थोड़ा हटाया और उसकी गर्दन पर, नीचे की ओर, गीले चुंबन देने शुरू किए। हर चुंबन के साथ उनके दाँतों का हल्का सा दबाव, एक छाप छोड़ने की इच्छा।

उनका हाथ ब्रा के पीछे के हुक की तलाश में सरका। "इस… इसे खोल दो," बाबूलाल ने उसके कान में फुसफुसाया, उनकी जीभ ने उसके कान की लौ को छुआ। मुन्नी काँप उठी। उसने हाथ पीछे ले जाने की कोशिश की, लेकिन शरीर ने आज्ञा नहीं मानी। उसकी उँगलियाँ काँपती हुईं हुक पर पहुँचीं और एक झटके में उसे खोल दिया। ब्रा के कपड़े ढीले पड़ गए और बाबूलाल के हाथ ने तुरंत अवसर पाकर उसे एक तरफ सरका दिया।

उसकी भरी हुई चूचियाँ अब बिल्कुल नंगी थीं, मोमबत्ती की लौ में चमक रही थीं। बाबूलाल ने उन्हें एक क्षण के लिए देखा, फिर अपना मुँह नीचे किया और एक निप्पल को अपने गर्म मुँह में ले लिया। मुन्नी ने एक तीखी साँस भरी और उसने अपनी उँगलियाँ बाबूलाल के बालों में गड़ा दीं। उनकी जीभ ने उसके कड़क निप्पल के चारों ओर तेज़ चक्कर लगाए, फिर उसे चूसना शुरू किया, एक लयबद्ध खिंचाव।

"आह… बाबूजी…" उसकी कराह एक लंबी फुहार बनकर निकली। उसका दूसरा हाथ स्वतः ही अपनी दूसरी चूची पर चला गया, उसे बिना सोचे-समझे मसलने लगा। बाबूलाल ने यह देखा और अपना हाथ उसकी कलाई से पकड़कर उसे वहाँ से हटा दिया। "नहीं… यह मेरा काम है," उन्होंने कहा और दूसरी चूची को अपनी उँगलियों के बीच ले लिया, पहले वाले को अपना मुँह नहीं छोड़ते हुए।

उनकी दूसरी हथेली उसकी पीठ से होती हुई, साड़ी के पल्लू के नीचे चली गई। उन्होंने कपड़े को ऊपर की ओर सरकाया, उसकी जांघों की नंगी त्वचा पर अपनी उँगलियाँ फेरीं। मुन्नी के शरीर में एक हलचल दौड़ गई। बाबूलाल ने उसकी गांड के एक गाल को अपनी हथेली से कसकर दबाया, फिर उसे अलग करते हुए, उसके चूतड़ों के बीच की दरार को अपनी उँगली से ऊपर से नीचे की ओर टटोला।

मुन्नी का सिर पीछे की ओर झटका खा गया। उसने अपनी आँखें खोल दीं और छत की ओर देखने लगी, मानो वहाँ से कोई शक्ति माँग रही हो। बाबूलाल ने अपना मुँह छोड़ा और उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा अपनी ओर घुमा दिया। "मुझे देखो," उन्होंने आदेश दिया। "जब मैं तुम्हें छूता हूँ, तब तुम्हें मुझे देखना है।" उनकी आँखों में एक जंगली, बेकाबू चमक थी।

उन्होंने उसे धीरे से कुर्सी की ओर मोड़ा और उसके कंधों पर हल्का दबाव डाला। मुन्नी समझ गई और वह कुर्सी पर बैठ गई, उसकी साड़ी अब और खुल चुकी थी, जांघों का अधिकांश हिस्सा दिख रहा था। बाबूलाल उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसके दोनों जांघों को अपने हाथों से खोला और बीच में अपना सिर रख दिया। उनकी नज़र सीधी उसकी साड़ी के पेटीकोट पर टिक गई, जहाँ एक गहरा उभार साफ़ दिख रहा था।

"तुम तो पूरी तरह से तैयार हो," बाबूलाल ने कहा, और अपने होंठों से उसके पेटीकोट के हल्के कपड़े को छुआ। गर्म साँसों से कपड़ा तुरंत नम हो गया और उसके अंदर के आकार को और उभार दिया। उन्होंने अपने दाँतों से कपड़े का एक छोर पकड़ा और उसे धीरे-धीरे नीचे की ओर खींचा। मुन्नी ने अपने कूल्हे ऊपर उठाए, सहायता करते हुए। पेटीकोट अब उसकी जांघों पर था, और उसकी चूत पूरी तरह से नंगी होकर, हवा के झोंके और मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी।

बाबूलाल ने एक गहरी, कंपकंपाती साँस ली। "बहुत… बहुत सुंदर," उन्होंने फुसफुसाया। उन्होंने अपने अँगूठे को उसके भग के ऊपरी हिस्से पर रखा, जहाँ से नमी झलक रही थी, और धीरे से दबाया। मुन्नी का पूरा धड़ ऐंठ गया। "शांत रहो," बाबूलाल ने कहा, और उन्होंने अपने अँगूठे को नीचे की ओर सरकाया, उसके भगोष्ठ को अलग करते हुए, उसके गीले, गुलाबी अंदरूनी हिस्से को उजागर किया। उनकी उँगली ने उसके भगद्वार के छोटे से छिद्र को टटोला, फिर वापस आकर उसकी क्लिटोरिस पर आराम से घूमने लगी, एक गोलाकार, अनवरत गति में।

मुन्नी के होंठ काँप रहे थे। उसने अपनी टाँगें और खोल दीं, एक मूक आमंत्रण। बाबूलाल ने अपना सिर और नीचे झुकाया और अपनी जीभ से एक लंबा, सपाट झटका उसकी चूत के ऊपर से नीचे तक दिया। नमकीन, तीखी और बिल्कुल नई स्वाद और गंध ने उनके मुँह को भर दिया। मुन्नी चीख़ उठी, उसकी आवाज़ कमरे में गूँज गई। बाबूलाल ने जीभ से काम जारी रखा, अब वह उसकी क्लिट पर केंद्रित हो गए, तेज़ और हल्के जीभ के झटकों से उसे उत्तेजित करते हुए। उनका एक हाथ उसकी गांड को मसल रहा था, जबकि दूसरा हाथ उसके स्तनों पर, उसके निप्पलों को चुटकी काट रहा था।

मुन्नी का शरीर तनाव से भरा हुआ एक धनुष बन गया था। उसकी सांसें हिचकियों में रुक-रुक कर आ रही थीं। "रुको… मैं… मैं गिर जाऊँगी," उसने हांफते हुए कहा। बाबूलाल ने रुककर ऊपर देखा। "गिर जाओ," उन्होंने कहा, एक नटखट मुस्कान के साथ। "मैं तुम्हें संभाल लूँगा।" और उन्होंने फिर से अपना मुँह गड़ा दिया, इस बार दो उँगलियाँ उसकी चूत के भीतर प्रवेश कराने की कोशिश में।

उनकी उँगली के पोर ने प्रतिरोध महसूस किया, फिर नमी ने रास्ता दिया और एक उँगली उसकी चूत के भीतर धँस गई। मुन्नी की एक लंबी, दबी हुई कराह कमरे में फैल गई। बाबूलाल ने धीरे-धीरे उसे अंदर-बाहर करना शुरू किया, उसकी तंग गर्मी में अपनी उँगली घुमाते हुए। "कितनी गर्म है अंदर…" उन्होंने गुर्राते हुए कहा, और दूसरी उँगली को भी उसी रास्ते में लगा दिया।

मुन्नी के हाथ कुर्सी के हत्थे को जकड़ गए। उसका सिर पीछे की ओर लुढ़का, गर्दन की नसें तनकर उभर आईं। बाबूलाल ने अपनी उँगलियों की गति तेज की, एक लयबद्ध आगे-पीछे, जबकि उनकी जीभ ने फिर से उसकी क्लिट पर ध्यान केंद्रित किया। नमी की आवाज़, हल्की चपचपाहट, उनकी तेज़ सांसों के साथ मिल गई। मुन्नी का शरीर ऐंठने लगा, उसकी एड़ियाँ जमीन में गड़ गईं।

"बस… बस अब नहीं…" वह हांफती रही, पर उसकी हाँफती हुई आवाज़ में इनकार से ज्यादा विनती थी। बाबूलाल ने उँगलियाँ और गहरी डालीं, एक मुड़ी हुई कोण से, उसके भीतर के एक नर्म, उभार वाले स्थान पर जा टिकीं। मुन्नी चीख़ उठी, उसकी टाँगें काँपने लगीं और एक गर्म स्पंदन ने उसकी चूत को थरथरा दिया। बाबूलाल ने अपना मुँह हटाया और उसकी धड़कती हुई क्लिट को अपनी उँगली के ऊपर-नीचे के हल्के दबाव से सहलाते रहे, जब तक कि उसकी कराहें धीमी नहीं पड़ गईं।

वह ऊपर उठा और अपने घुटनों पर खड़ा हो गया, उसकी ओर देखते हुए। मुन्नी की आँखें धुंधली थीं, होठ सूजे हुए। बाबूलाल ने अपने पैंट का बटन खोला, फिर ज़िप। उनका लंड, कड़क और नसों से भरा हुआ, बाहर आ गया। मुन्नी की नज़र उस पर गड़ गई, एक मिश्रित भाव से-डर, जिज्ञासा, और एक गहरी, अन्धकारमय लालसा। बाबूलाल ने उसे कुर्सी से खींचकर खड़ा किया और फिर धीरे से घुटनों के बल बिठा दिया। "देखो," उन्होंने कहा, अपने लंड को हाथ में लेते हुए, "इतनी देर से तरस रहा था तुम्हारे लिए।"

उन्होंने उसका हाथ उठाया और उसे अपने गर्म, नसीले अंग पर रख दिया। मुन्नी की उँगलियाँ स्वतः ही बंद हो गईं, उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस करते हुए। उसने हल्का सा दबाव डाला, और बाबूलाल ने गहरी साँस भरी। "हिलाओ," उन्होंने आदेश दिया। मुन्नी ने धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया, उसकी हथेली ऊपर-नीचे सरकने लगी। बाबूलाल ने आँखें मूंद लीं, उसकी मुट्ठी की नर्म पकड़ का आनंद लेते हुए।

फिर उन्होंने उसका हाथ रोका और उसे उठाकर बिस्तर की ओर ले चले। मुन्नी के कदम लड़खड़ा रहे थे। बिस्तर पर उन्होंने उसे पीठ के बल लिटा दिया और स्वयं उसके ऊपर आ गए, अपने घुटनों को उसकी जाँघों के बीच में रखकर। उनका लंड उसकी गीली चूत के ऊपर टिका, दबाव डालने लगा। मुन्नी ने अपनी टाँगें और फैला दीं, उसकी एड़ियाँ उनकी पीठ पर टिक गईं। बाबूलाल ने अपने हाथ से अपना लंड संभाला और उसकी चूत के छिद्र पर रख दिया। "देखते हैं," उन्होंने फुसफुसाया, "क्या तुम इसे समा सकती हो।"

उन्होंने कूल्हे आगे किए। सिर ने प्रवेश किया, तंग और गर्म। मुन्नी की साँस रुक गई, उसके नाखून बाबूलाल की बाँहों में घुस गए। वह धीरे-धीरे अंदर गए, एक इंच, फिर दूसरा, उसकी आतंरिक नमी और प्रतिरोध को चीरते हुए। मुन्नी का मुँह खुला रह गया, एक दबी हुई चीख फंसी रह गई। जब वह पूरी तरह अंदर समा गए, तो दोनों एक क्षण के लिए स्थिर रहे, सिर्फ एक-दूसरे की धड़कन और साँसों का अहसास करते हुए। फिर बाबूलाल ने चलना शुरू किया-धीमी, गहरी, मापी हुई गति। हर धक्के के साथ मुन्नी का शरीर बिस्तर पर हिलता, उसकी चूचियाँ लहराने लगतीं। बाबूलाल की गति धीरे-धीरे तेज हुई, उनकी जांघें उसकी जांघों से टकराने लगीं, एक गीली, चपचपाहट भरी आवाज उठने लगी।

बाबूलाल की गति और तेज़ हो गई, हर धक्का गहरा और ज़ोरदार। मुन्नी की कराहें अब दबी हुई फुसफुसाहटों में नहीं, बल्कि खुली, तीखी चीखों में बदल रही थीं, जो हर बार उनके पेलने के साथ उठतीं। उसकी निगाहें बाबूलाल के चेहरे पर चिपकी थीं, जहाँ पसीने की बूंदें उनके सफेद भौंहों पर जमा हो रही थीं और उनके होंठ एक तनावपूर्ण मुस्कान में खिंचे हुए थे। "क्या… क्या देख रही है?" बाबूलाल ने हांफते हुए पूछा, उनकी गति एक पल को धीमी हुई।

"आप…" मुन्नी हाँफी, "आपकी आँखें…" उसने कहा, क्योंकि बाबूलाल की पुतलियाँ फैली हुई थीं, एक अजीब सी जंगली चमक से भरी हुई, जो उसके अंदर तक झांक रही थी। बाबूलाल ने एक गहरी सांस ली और फिर से जोर से पेलना शुरू किया, इस बार उसके हाथ उठाकर उसके दोनों स्तनों को कसकर पकड़ लिया, उन्हें अपनी हथेलियों में दबाते हुए, निप्पलों को अंगुलियों के बीच रगड़ते हुए। मुन्नी की पीठ मेहराब की तरह उठी और उसने अपनी एड़ियों को उनकी पीठ पर और गहराई से दबाया, उन्हें अपने भीतर और गहरा खींचते हुए।

बाहर बारिश की आवाज़ मद्धम पड़ गई थी, लेकिन कमरे के अंदर उनके शरीरों के टकराने की आवाज़, चिपचिपी चपचपाहट और गीली सांसों का एक कोलाहल भर गया था। बाबूलाल ने अपना सिर झुकाया और उसके कंधे पर अपने दांत गड़ा दिए, एक दमनकारी चीख को रोकते हुए। दर्द और आनंद की मिली-जुली लहर ने मुन्नी के शरीर में आग लगा दी। उसने अपने हाथ उनकी पीठ पर फेरे, उनके पसीने से तर कपड़े को पकड़ा, उनकी मांसपेशियों के हिलने को महसूस किया।

तभी बाबूलाल ने उसे पलट दिया, उसकी पीठ के बल लिटाकर स्वयं उस पर चढ़ गए। इस नई स्थिति में उनका लंड और गहरा धँसा। मुन्नी ने तकिए को मुट्ठियों में कसकर पकड़ लिया। बाबूलाल ने उसकी बाहों को पकड़कर उसके सिर के ऊपर ले जाकर दबा दिया, उसे पूरी तरह नियंत्रित करते हुए। "अब… अब देखो," वह गुर्राए, और उनकी गति एक लयबद्ध, अथक जोर के साथ तेज और कठोर हो गई। हर धक्के से मुन्नी का शरीर बिस्तर पर आगे खिसकता, उसकी चूचियाँ हवा में उछलतीं। उसकी चूत के भीतर एक गर्म, दबाव भरी ऐंठन बनने लगी, जो हर थपकी के साथ फैलती।

बाबूलाल की सांसें उसके कान पर गर्म और तेज चल रही थीं। "मैं… मैं निकलने वाला हूँ," उन्होंने कर्कश स्वर में कहा। उनकी गति अनियमित हो गई, एक तीव्र, आखिरी जोर की ओर बढ़ते हुए। मुन्नी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उस ऐंठन को अपने भीतर बढ़ते हुए महसूस किया, जो अब एक विस्फोट की कगार पर थी। "अंदर…" उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ एक अर्ध-विह्वल प्रार्थना की तरह, "अंदर निकल दो, बाबूजी।"

यह सुनते ही बाबूलाल का शरीर एक जोरदार झटके से काँपा। उन्होंने गहरा धँसा, एक लंबी, गहरी कराह के साथ, और उसकी चूत की गर्म गहराइयों में गर्म तरल का एक स्पंदनशील स्खलन किया। मुन्नी ने उस क्षण को महसूस किया-एक ज्वार की लहर की तरह गर्मी का प्रवाह-और उसकी अपनी ऐंठन भी टूट गई, उसके नेत्रगोलकों के पीछे रोशनी के फटने जैसा एक सफेद विस्फोट, उसकी चूत बाबूलाल के लंड के चारों ओर सिकुड़ती और धड़कती हुई।

धीरे-धीरे, गति रुकी। भारी सांसें और दिल की धड़कनें ही सुनाई दे रही थीं। बाबूलाल ने अपना सारा वजन उस पर डाल दिया, उनका पसीने से तर शरीर उसके शरीर से चिपका हुआ। मुन्नी ने अपनी बाँहें उनकी पीठ के चारों ओर लपेट लीं, उनके कंधे की खुरदरी त्वचा को अपनी हथेलियों से महसूस किया। कुछ देर तक वे इसी तरह पड़े रहे, उनके बीच का गीला चिपचिपापन धीरे-धीरे ठंडा हो रहा था।

बाबूलाल ने अंततः सिर उठाया और उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में वह जंगली चमक अब शांत हो चुकी थी, उसकी जगह एक गहरी, थकी हुई संतुष्टि ने ले ली थी। उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसके गाल पर बिखरे पसीने से तर बालों को सहलाया। "अब डर लगता है?" उन्होंने धीमे से पूछा।

मुन्नी ने सिर हिलाया, नहीं में। डर तो बहुत पहले ही उसकी देह की गहराइयों में समा चुका था, उसकी जगह एक खालीपन और एक नई तरह की जागृति ने ले ली थी। बाहर बारिश पूरी तरह थम चुकी थी, और मोमबत्ती की लौ अब बुझने के कगार पर, टिमटिमा रही थी। कमरे में उनके शरीरों की गंध और यौनक्रिया की तीखी महक भरी हुई थी। एक लंबी, गहरी चुप्पी के बाद, दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई।

दरवाज़े पर दस्तक ने दोनों को एकदम सचेत कर दिया। बाबूलाल का शरीर मुन्नी के ऊपर से तुरंत हट गया, एक रक्षात्मक चपलता से जो उनकी उम्र के खिलाफ़ लगती थी। मुन्नी ने तकिए से चिपककर अपने नंगे स्तन ढक लिए, उसकी धड़कन अब भी कानों में गूंज रही थी। "कौन?" बाबूलाल की आवाज़ कर्कश, लेकिन आदेश देने वाली थी।

"बाबूजी, मैं हूँ रामू। बिजली आ गई है, पंखा चालू कर दूं?" बाहर से आवाज़ आई।

बाबूलाल ने मुन्नी की ओर देखा, उनकी नज़रों में एक त्वरित चेतावनी। "नहीं, रात गरम नहीं लग रही। सुबह देखेंगे। जाओ सो जाओ," उन्होंने ज़ोर देकर कहा। बाहर कुछ पल की ख़ामोशी रही, फिर पैरों के सरकने की आवाज़ और फिर सन्नाटा।

जैसे ही कदम दूर हुए, कमरे में जमा हुआ तनाव एक सिसकती हुई सांस में बदल गया। मुन्नी ने अपने आप को बिस्तर पर सिकोड़ लिया, उसकी जांघों के बीच से बाबूलाल का वीर्य रिसकर चादर पर गीला निशान छोड़ रहा था। बाबूलाल किनारे बैठ गए, अपनी पैंट ऊपर खींचते हुए। उनकी पीठ पर मुन्नी के नाखूनों के लाल निशान साफ़ दिख रहे थे।

"डर गई?" बाबूलाल ने फिर पूछा, पर इस बार उनकी आवाज़ में कोमलता का एक स्पर्श था।

"नहीं," मुन्नी ने कहा, और यह सच था। डर की जगह एक विचित्र शून्यता ने ले ली थी। उसने चादर को अपने चारों ओर लपेटा और बैठ गई। बाबूलाल ने मोमबत्ती की बुझती लौ को देखा, फिर उठकर स्विच दबाया। एक पल की कर्कश रोशनी ने कमरे को भर दिया, उनके नंगेपन और अव्यवस्था को क्रूरता से उजागर कर दिया। मुन्नी ने आँखें झुका लीं।

बाबूलाल वापस बिस्तर पर आए और उसके पास बैठ गए। उन्होंने चादर के ऊपर से ही उसकी बाँह को सहलाया। "तुम्हारा शरीर… बहुत उदार है," उन्होंने कहा, जैसे कोई तथ्य बता रहे हों।

मुन्नी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी नज़र उनके हाथ पर थी, जो अब झुर्रीदार और धब्बों वाला था, वही हाथ जो कुछ देर पहले उसे तोड़-मरोड़ रहा था। बाबूलाल ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा अपनी ओर घुमाया। "कोई पछतावा नहीं होना चाहिए," उन्होंने दृढ़ता से कहा। "यह तो बस शुरुआत है।"

"शुरुआत?" मुन्नी की आवाज़ एकदम फीकी लगी।

"हाँ। अब तुम मेरी हो। पूरी तरह से।" उनके शब्दों में एक कब्ज़े का भाव था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी कोमलता तैर रही थी। उन्होंने झुककर उसके माथे को चूमा, एक शुद्ध, निश्छल चुंबन। "अब सो जाओ। सुबह सब कुछ पहले जैसा दिखना चाहिए।"

उन्होंने उठकर उसके लिए एक साफ़ चादर निकाली और खुद भी लेट गए, उससे कुछ फासले पर। मुन्नी ने पीठ फेर ली। कमरे में पंखे की घूमती हुई आवाज़ भर गई। उसकी चूत के भीतर अब भी एक गहरी, गर्म ऐंठन थी, और उसकी गांड पर उनकी पकड़ के निशान जल रहे थे। वह अपने शरीर में बसे उस अजनबी के वीर्य को महसूस कर सकती थी, एक गुप्त चिन्ह जो अब हमेशा के लिए उसके भीतर रह जाएगा।

थोड़ी देर बाद, अंधेरे में, बाबूलाल की आवाज़ फिर गूंजी, "कल रात फिर आना। कमर में दर्द है।"

मुन्नी ने आँखें खोल दीं। खिड़की से चाँद की एक पतली किरण अन्दर आ रही थी। उसने जवाब नहीं दिया, बस एक हल्की सी हाँ में सिर हिला दिया, यह जानते हुए कि वह उसे देख नहीं सकते। पर वह जानती थी कि उन्हें पता चल जाएगा। उसकी आँखों से एक आँसू रिसा और तकिए में समा गया। यह दुख का नहीं, बल्कि एक गहरी, उलझी हुई समर्पण का आँसू था। बाहर, रात के जंगली जानवरों की आवाज़ें फिर शुरू हो गईं, और हवेली एक बार फिर अपने रहस्यों में लिपटकर सो गई।


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